1947 बंटवारा: ज्योतिषियों के मुहूर्त और माउंटबेटन के लकी नंबर ने तय की आजादी की तारीख

1947 बंटवारा: ज्योतिषियों के मुहूर्त और माउंटबेटन के लकी नंबर ने तय की आजादी की तारीख

दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और ब्रिटेन की हालत अब पहले की तरह नहीं थी। ब्रिटेन आर्थिक रूप से टूट चुका था। ब्रिटिश सरकार के हालात अब ऐसे नहीं थे कि वह भारत का खर्च उठा सके। अंग्रेज़ लगभग 200 साल से यहां राज करते आ रहे थे। वह भारत को कभी आजादी नहीं देना चाहते थे लेकिन अब ब्रिटेन के लिए भारत को आजादी देना उनकी मजबूरी हो गई थी।

प्रधानमंत्री एटली ने फैसला कर लिया था कि जून 1948 तक अंग्रेज भारत छोड़ देंगे। ब्रिटिश सरकार के लिए भारत का एक-एक दिन का खर्च उठाना अब मुश्किल होता जा रहा था। अब इस परेशानी से पार पाने के लिए भारत के आखिरी वारसराय लॉर्ड माउंटबेटन को भारत भेजने का फैसला किया गया।

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माउंटबेटन को भारत भेजा गया ताकि वह जल्द से जल्द सारी चीज़ो का निपटारा करवा दें। माउंटबेटन को कुछ विशेष पावर देकर भेजा गया था। लेकिन इसके एवज में ब्रिटिश सरकार ने उनसे जल्द से जल्द भारत छोड़ने के टास्क को अंजाम देने को कहा था।

लॉर्ड माउंटबेटन

माउंटबेटन की टीम में चुनिंदा अधिकारी थे। ऐसे लोगों को टीम में रखा गया था जो काफी तेज थे। ये सोचा गया था कि इन सब सुविधाओं के रहते माउंटबेटन को कोई परेशानी नहीं आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। माउंटबेटन सबसे पहले हिन्दुस्तानी नेताओं का भरोसा जीतना चाहते थे। उन्होंने 133 छोटे बड़े नेताओं से बातचीत की। लेकिन अब माउंटबेटन ने उन लोगों का चयन कर लिया था जिनके हाथों वह इस देश को छोड़कर जाना चाहते थे। इऩमें महात्मा गांधी, जिन्ना और नेहरू का नाम था।

माउंटबेटन पहले खुद ही बंटवारे के फैसले का समर्थन नहीं कर रहे थे लेकिन दूसरे नेताओं से बात करने के बाद उन्होंने समझ लिया था कि इस देश में बंटवारा तो होगा लेकिन ये सब जितना शांतिपूर्वक हो उतना अच्छा होगा। बंटवारा होगा इस बात का पुख्ता विश्वास माउंटबेटन को जिन्ना से बात करने के बाद हो गया था।

मोहम्मद अली जिन्ना के साथ माउंटबेटन

माउंटबेटन जानते थे जिन्ना बस बंटवारा चाहते हैं । इसलिए माउंटबेटन की नज़रों में अब जिन्ना की एहमियत गांधी के मुकाबले काफी कम हो गई थी। हालांकि माउंटबेटन को ये पता नहीं था कि जिन्ना उस वक्त दुनिया में कुछ ही दिन के मेहमान थे उन्हें ट्यूबरकलोसिस था। कई इतिहासकारों का मानना है कि अगर ये बात दुनिया के सामने उन दिनों आ गई होती तो शायद इतिहास अलग तरीके से लिखा जाता।

वक्त निकलता जा रहा था। माउंटबेटन एक-एक कर के सभी कामों को निपटा रहे थे। बंटवारे से लेकर रियासतों तक का फैसला करने में माउंटबेटन अहम भूमिका निभा रहे थे। कुछ दिनों के बाद माउंटबेटन को उनके उच्च अधिकारियों की तरफ से बुलावा भेजा गया। माउंटबेटन अधिकारियों के सामने पेश हुए। वह अधिकारियों को अपने काम के बारे में बता रहे थे कि कैसे बंटवारा करवाने का काम चल रहा है और नेताओं से बात की जा रही है…लेकिन ब्रिटिश हुकुमत को किसी और बात की फिक्र थी। उन्होंने सीधे माउंटबेटन से वह तारीख पूछी जब अंग्रेज हमेशा के लिए भारत छोड़ देंगे। उस वक्त तक माउंटबेटन के दिमाग में ऐसी कोई तारीख नहीं थी।

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माउंटबेटन अधिकारियों के सामने ये नहीं दिखाना चाहते थे कि उन्होंने अभी तक इस तारीख के बारे में सोचा नहीं..तो उन्होंने जल्दबाज़ी में कह दिया 15 अगस्त 1947। अंग्रेज़ तारीख सुनते ही खुश हो गए। वह तो सोच रहे थे कि उन्हें भारत का बोझ 1948 तक उठाना पड़ेगा लेकिन उनका ये बोझ पहले ही हट रहा था।

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माउंटबेटन के दिमाग में अचानक ही ये तारीख नहीं आई थी। माउंटबेटन के लिए ये तारीख काफी शुभ थी। ये वही तारीख थी जब जापान ने मित्र देशों के सामने सरेंडर किया था। माउंटबेटन इसी तारीख को भारत के इतिहास में भी लिखना चाहते थे। लेकिन जैसे ही तारीख का ऐलान हुआ एक अलग ही बवाल शुरू हो गया।

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देशभर के ज्योतिषियों ने इस तारीख का विरोध करना शुरू कर दिया। उनके हिसाब से ये दिन अशुभ था। ये दिन कहीं न कहीं हार का प्रतीक थी। इसलिए वह नहीं चाहते थे कि 15 अगस्त को आजादी मिले। जिन्ना औऱ नेहरू दोनों ही इन बातों में यकीन नहीं करते थे। लेकिन अब माउंटबेटन असमंजस की स्थिति में फंस गए थे। उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि वह क्या करें।

जिन्ना और नेहरू चाहते थे जल्द से जल्द फैसला किया जाए। लेकिन अब माउंटबेटन के लिए मुश्किल बढ़ गई थी। वह बंटवारे या आजादी देते वक्त किसी को भी नाराज नहीं करना चाहते थे। यही कारण था कि वह कुछ भी फैसला करने से पहले हिन्दुस्तानी नेताओं से घंटों बातें करते थे। बहुत सोच विचार के बाद फैसला लिया गया। आजादी दी जाएगी लेकिन 14-15 अगस्त की रात को। इस तरह उस रात दो मुल्कों के लोग अपने उज्जवल भविष्य के लिए जग उठे।

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