1947 बंटवारा: आजादी के साथ मिले दंगों का दर्द और हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बहे खून की कहानी

1947 बंटवारा: आजादी के साथ मिले दंगों का दर्द और हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बहे खून की कहानी

साल 1947 में भारत को आजादी तो मिली लेकिन इसकी कीमत अभी चुकानी बाकी थी। अंग्रेज़ों ने हिन्दू और मुस्लमान के बीच जो फूट डाली थी उसने अब तूल पकड़ लिया था। बड़े पैमाने पर हुई हिंसा में लोगों को मौत के घाट उतारा गया। एक तरफ से शरणार्थियों के ट्रेन चलती तो दूसरी तरफ पहुंचते पहुंचते ट्रेन में लाशों के अंबार लगा दिए जाते। औरतों के साथ बलात्कार हुए उन्हें बंधक बना लिया गया। लेकिन ये आग अचानक नहीं लगी थी। आजादी मिलने से दस साल पहले इस हिंसा के बीज बो दिए गए थे।

बात 1937 की है। उन दिनों देश में प्रांतीय चुनाव हुए थे। चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी। चुनाव जीतने के कुछ दिनों के बाद ही मोहम्मद अली जिन्ना के साथ कांग्रेस के संबंध बिगड़ने लगे। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर काम करने से इनकार कर दिया। दरअसल कांग्रेस ये जानती थी कि जिन्ना का समर्थन किया तो आने वाले दिनों में वह कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा बन जाएंगे। ऐसे में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से दूरियां बनानी शुरू कर दीं।

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अंग्रेज़ों के साथ भी कांग्रेस ने समझौता करना शुरू कर दिया था। जिन्ना समझ चुके थे कि राजनीतिक परिदृश्य में बने रहने के लिए उन्हें कुछ बड़ा करना होगा। उन्होंने लगातार 27 महीनों तक कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार किया। जिन्ना ने देश की मुस्लिम आबादी को ये विश्वास दिलाना शुरू कर दिया कि कांग्रेस के राज में मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ेगा। ये वो राजनीतिक घटनाएं रहीं जिसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक दूसरे अलग कर दिया।

आप पढ़ रहे हैं ‘द डेमोक्रेटिक बज़र’ की खास सीराज़ ‘1947 बंटवारा’

ये हालात कभी सुधरे नहीं। दोनों दलों के बीच में तनाव बढ़ता गया और आजादी का साल आ गया। कई रिसर्च पेपरों में ये साक्ष्य मिलते हैं कि बंटवारे के दौरान हुई हिंसा सबसे पहले पंजाब के इलाकों में भड़की थी। स्टोकलहोम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इश्तिफाक अहमद ने इस मामले में पूरा शोध किया। वह लिखते हैं कि बंटवारे के दौरान सबसे पहले हिंसा मार्च 1947 में पंजाब में भड़की थी। पंजाब जो मुस्लिम बहुल इलाका था वहां पर मुस्लमान चुन-चुन कर सिखों और हिन्दुओं को मारने लगे। इसके बाद पूर्वी पंजाब के इलाके जहां पर हिन्दू ज्यादा थे उन्होंने भी मुस्लमानों का नरसंहार किया।

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कई जगहों पर मिलता है कि जो दंगे हुए वह किसी धर्म के कारण नहीं बल्कि उन्हें सांप्रदायिक रंग दिया गया था। ये दंगे धीरे धीरे देश के दूसरे हिस्सों में फैल रहे थे। इलाहाबाद में एक मुस्लिम मिस्री किसी हिन्दू के घर पर काम कर रहा था। साधारण बात पर झगड़ा शुरू हुआ और पूरे शहर में फसाद फैल गया।

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कानपुर में मुस्लिम इक्के वाले और महिला के बीच में किराए को लेकर बहस हुई तो शहर में दंगे हो गए। आज़मगढ़ में कबड्डी के मैच में बहस हुई तो गाड़ियों में आग लगवा दी गई। ये सभी घटनाएं एक एक कर सामने आ रही थीं। इन घटनाओं से लोगों के बीच में ये भय फैलता जा रहा था कि वह अब दूसरे समुदाय के लोगों के साथ सुरक्षित नहीं है

हालांकि जो पंजाब में हो रहा था उसे रोकना मुश्किल होता जा रहा था। पंजाब में बड़े पैमाने पर अापराधिक गैंग काम कर रहे थे। बंटवारे का फायदा उठाकर उन लोगों ने भी हिंसा भड़काने का काम किया। इन लोगों ने जमकर मारपीट बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दिया और अंत में लूट-पाट भी की।

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पंजाब के इलाकों में ये घटनाएं इतनी आम हो गई थी कि कोई भी हमला होता तो इलाके की महिलाएं कुएं में कूद कर अपनी जान दे देती थीं। अमृतसर के म्यूजियम में एक कूआ खासतौर पर उन महिलाओं की याद में बनाया गया है। एक अनुमान के अनुसार अकेले पंजाब में ही पांच से आठ लाख लोगों को मौत के घाट उतारा गया जबकि 10 लाख लोग अपने घरों को छोड़कर चले गए। हालांकि पूरे देश में ये आंकड़ा क्या है ये कहना आसान नहीं है। देखा जाए तो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की और गांव के गांव दहशत से खाली हो गए।

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इसके अलावा पंजाब में उन दिनों कई छोटे बड़े नेता सामने आने लगे थे। ये आम लोगों की बात राष्ट्रीय पार्टियों तक जाने ही नहीं देते थे। ये नेता आम जनता के लिए मसीहा बने हुए थे। इन नेताओं के कहने पर भीड़ हमला करने को तैयार हो जाती थी। इन सब में अहम भूमिका आपराधिक गैंगों की रही। वह पूरा प्लान बनाते और दूसरी तरफ जा रहे लोगों को अपना शिकार बनाते थे।

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पंजाब जहां कभी हिन्दू, मुस्लिम, सिख और दूसरे लोग मिलकर रहते थे। अब वही एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। हुआ वही जिसका डर था। पंजाब के टुकड़े हो गए। न सिर्फ टुकड़े हुए बल्कि लोगों के दिलों में एक दूसरे के लिए मौजूद मोहब्बत की जगह अब नफरत ने ले ली थी।

किसने सोचा था कि सालों गुलामी के बाद जब आजादी नसीब होगी तो उसकी कीमत अपनों के खून से अदा की जाएगी….

 

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