1947 बंटवारा: कश्मीर पर वो ऐतिहासिक भूल जिनसे आज भी घाटी सुलग रही है

1947 बंटवारा: कश्मीर पर वो ऐतिहासिक भूल जिनसे आज भी घाटी सुलग रही है

भारत आज आजाद है। स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। भारत अब आजाद भारत से आधुनिक भारत बन चुका है। लेकिन क्या कश्मीर के लिए हालात बदले हैं? वहां का मसला सुलझा है? इन सब का जवाब है नहीं। कश्मीर के लिए हालात अाज भी सुधरे नहीं हैं। अतीत के पन्नों को पलट कर देखें तो पता चलेगा कि ऐसी कई गलतियां हुईं जिनकी कीमत कश्मीर ही नहीं पूरा देश चुका रहा है।

बात तब की है जब कश्मीर रियासत थी। वहां पर हरि सिंह नाम के राजा का राज था। जब देश को आजादी मिल रही थी तो राजे-रजवाड़ों को अंग्रेजी हुकुमत की तरफ से एक फरमान पहुंचाया गया। उसमें साफ लिखा था रियासतें चाहें तो भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बन सकती हैं। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहते तो वह आजाद देेश के तौर पर भी रह सकते हैं।

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राजा हरि सिंह ऐसी रियासतों में से एक थे जो खुद को आजाद मुल्क रखना चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि किसी भी सरकार का दखल कश्मीर में हो भले ही वो पाकिस्तान हो या  फिर हिन्दुस्तान। लेकिन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को इस बात पर ऐतराज़ था। वह हरि सिंह को पहले से जानते थे इसलिए उनसे मिलने खुद पहुंचे।

जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराज हरि सिंह

माउंटबेटन ने हरि सिंह से साफ शब्दों में कह दिया’ आप चाहें तो पाकिस्तान में मिल जाएं या भारत का हिस्सा बन जाएं लेकिन आपको आजादी का राग छोड़ना होगा। माउंटबेटन इस बात को बेहतर तरीके से जानते थे कि कश्मीर अगर किसी भी देश में शामिल नहीं हुआ तो उसके लिए हालात काफी बिगड़ जाएंगे।

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माउंटबेटन ने हरि सिंह को यकीन दिलाया कि अगर वह चाहें तो पाकिस्तान में अपनी रियासत को मिला लें भारत के नेताओं को इस बात से कोई ऐतराज नहीं है। अब माउंटबेटन ने हरि सिंह को कश्मीर के मामले में ही एक बैठक में शामिल होने का न्योता दिया। लेकिन हरि सिंह ने आने से इनकार कर दिया। उन्होंने चिट्ठी भेजवा दी इसमें लिखा था कि मेरे पेट में दर्द है इसलिए मुलाकात नहीं कर पाउंगा। ये अतीत की पहली गलती थी। इस घटना के बाद हरि सिंह की छवि दूसरे नेताओं के सामने एक कमजोर नेता की हो गई जो परिस्थितियों से भाग रहा था। इतना ही नहीं इतिहासकारों का कहना है कि अगर हरि सिंह इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आते तो शायद कश्मीर मसले पर कोई हल निकाला जा सकता था।

महाराजा हरि सिंह का जम्मू में मौजूद किला

इसके बाद दूसरी गलती पाकिस्तान की तरफ से हुई। अंग्रेजों के जाते ही पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर की घेराबंदी शुरू कर दी। इन घटनाओं से दिल्ली में मौजूद नेता नेहरू और सरदार पटेल भी चिंतित थे। उन्हें अंदेशा हो गया था कि पाकिस्तान जल्द ही कोई कदम उठाएगा जिसके बाद उसका अगला निशाना भारत होगा।

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कुछ ही दिनों में पाकिस्तान की चाल सबके सामने आ गई। पाकिस्तान की तरफ से कबाइली लड़ाके भेजे गए। एक-एक कर कश्मीर के बड़े हिस्सों पर कबाइली हमले करते चले गए। हरि सिंह अपने किले में  परेशान थे। कबइली लड़ाके अब लूट-पाट और बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे थे। इन कबाइली लड़ाकों के पास बड़ी संख्या में हथियार थे। इनके सामने अब कशमीर की फौज कमजोर  पड़ रही थी। कश्मीर की फौज उस वक्त और कमजोर हो गई जब मुस्लमान फौजी इन लड़ाकों के साथ हो गए।

शेख अब्दुल्ला से कश्मीर पर चर्चा करते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू

हरि सिंह के पास अब समय कम था। लड़ाके अब श्रीनगर से कुछ ही दूर रह गए थे। हिन्दू, मुस्लमान, सिख सभी धर्मों के लोगों को बर्बाद करने पर लड़ाके आमादा थे। हरि सिंह समझ गए थे कि वह अब अकेले इनका सामना नहीं कर पाएंगे। ऐसे में उन्होंने भारतीय सेना की मदद मांगी। भारत की तरफ से फैसला लिया गया कि हरि सिंह रातों-रात जम्मू के लिए रवाना हों। ऐसा ही हुआ। खबरें आ रही थीं कि लड़ाके श्रीनगर पहुंच चुके हैं।

वहीं दिल्ली में नेता फैसला नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें क्या करना है। भारतीय नेता फैसला कर चुके थे कि कश्मीर की मदद करनी है। लेकिन माउंटबेटन ने बिना किसी बात की परवा किए ये साफ कह दिया जब तक हरि सिंह भारत में शामिल होने के लिए दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर नहीं करते भारतीय सेना मदद नहीं करेगी। हरि सिंह ने हस्ताक्षर कर दिए।

कश्मीर को कबाइलियों के चुंगल से छुड़वाने के लिए पहुंची भारत सेना

अगले ही दिन भारतीय सेना कम संसाधनों के बावजूद कश्मीर पहुंच गई। जबकि अंग्रेज कमांडर ऐसा नही चाहते थे। लेकिन उन्हें जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल के आगे झुकना पड़ा। इस सब के साथ ही माउंटबेटन ने एक शर्त रखी कि कश्मीर में सब कुछ ठीक होने के बाद जनमत संग्रह करवाया जाएगा। कई इतिहासकार माउंटबेटन की इस शर्त को गलती बताते हैं।

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लेकिन अब जो भारत की सेना कर रही थी उसने जिन्ना की नींद हराम हो गई थी। उन्हें कश्मीर अपने हाथों से निकलता दिखाई दे रहा था। उन दिनों भारत-पाकिस्तान की सेना के कमांडर इन चीफ अंग्रेज़ अफसर थे। ऐसे में पाकिस्तान अपनी फौज से मदद नहीं मांग सकते थे। क्योंकि अंग्रेजों ने ये मान लिया था कि कश्मीर भारत का हिस्सा है। अब जिन्ना ने ठंडे दिमाग से सोचा और भारत के नेताओं को बातचीत के लिए लाहौर आने का न्योता दिया। माउंटबेटन और नेहरू इस बैठक में जाने को तैयार थे। लेकिन सरदार पटेल ने उन दोनों को ही वहां जाने से मना कर दिया। नेहरू और माउंटबेटन का कहना था कि अगर बैठक से हल निकलता है तो इससे बेहतर कुछ नहीं होगा लेकिन सरदार पटेल नहीं माने और बैठक नहीं हुई।

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काफी हद तक संभव था कि शायद ये मुलाकात इतिहास का रूख बदल देती। ये भारतीय नेताओं की तरफ से हुई एक भूल थी। संभव था कि बात सुलझ जाती या फिर बात और बिगड़ जाती। लेकिन पाकिस्तान कश्मीर में क्या सोच रहा है ये पक्ष खुलकर सामने आता। भारतीय नेताओं ने बुलावे को ठुकरा दिया था। जिन्ना के लिए ये बेइज्जती थी। ऐसे में पाकिस्तान के कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि भारत ने धोखे से कश्मीर पर हमला किया। यहीं से कश्मीर मसले पर बात बिगड़ी चली गई।

वो दिन भी आ गया जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपना सबसे विवादित बयान दे दिया। नेहरू ने रेडियो पर कह दिया कि हम तैयार हैं कि कश्मीर में सब ठीक होने के बाद कश्मीर की जनता जनमत संग्रह कर ये फैसला करेगी कि वह पाकिस्तान में रहेगी या हिन्दुस्तान में।

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लेकिन जिन्ना किसी तरह से कश्मीर पर समझौता करने को तैयार नहीं था। मामला बिगड़ता चला गया कोई पक्ष झुकने को तैयार नहीं था। कुछ दिनों के बाद मामला संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंचा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत और पाकिस्तान का ये मुद्दा दब गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के कई देशों ने मान लिया कि कश्मीर में हुए हमले में पाकिस्तान की भूमिका नहीं थी। ऐसा मानने वालों में ब्रिटेन भी था जो खुद कश्मीर को भारत का हिस्सा मान चुका था। कश्मीर के मामले में हुई इस घटना को एक अंतरराष्ट्रीय गलती मान सकते हैं। अतीत में क्या हुुआ और क्यों हुआ अगर ये दोनों देश ही इस बात पर चर्चा कर उन गलतियों को सुधारने की पहल करें तो कश्मीर में जारी ये खूनी खेल रूक सकता है।

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