भोपाल गैस त्रासदी

भोपाल गैस त्रासदी के 33 साल: एक गलती को छुपाने में गई हजारों की जान !

भारत के दिल में बसा एक शहर…भोपाल। ये शहर कहने को तो शहर था लेकिन दूसरे बड़े शहरों से काफी अलग था। यहां महंगाई कम थी। बिजली पानी काफी सस्ता था। वहीं दूसरी तरफ शहर में रोजगार भी काफी कम था। इन्हीं परिस्थितियों के बीच अमेरिका का एक सपना इस शहर में पलने की कोशिश कर रहा था। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने साठ के दशक में इस शहर में एक कारखाना लगाया था। इस कारखाने में खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों का निर्माण किया जाता था। ताकि किसानों की फसलों को खराब होने से बचाया जा सके।

आमतौर पर इस तरह के कारखाने शहरों के बाहर लगाए जाते हैं। खुद अमेरिका में इस कंपनी के कारखाने शहरों से काफी दूर स्थापित किए जाते थे। लेकिन यहां पर कारखाना जहां लगाया गया था उसके चारों तरफ बस्ती थी। गरीब लोग झुग्गियां डालकर वहां रहते थे। लेकिन सरकार ने इस कारखाने के निर्माण पर कोई ऐतराज़ नहीं जताया। शहर में मंहगाई चरम पर थी औऱ नौकरी के नाम पर कुछ भी नहीं था।

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ऐसे में ये कारखाना बहुत से गरीबों के लिए एक उम्मीद की किरण था। लोगों को लगा था कि ये फैक्ट्री अब उनकी जिंदगी के अंधेरे को दूर करने का काम करेगी। उन्हें क्या पता था कि यही कारखाना उनके जीवन को हमेशा के लिए अंधेरे में ढकेल देगा।

कारखाने में एमआईसी(MIC) नाम की गैस को बड़े-बड़े कंटेनरों में स्टोर किया जाता था। शहर छोटा था और सस्ता भी इसलिए कंपनी की तरफ से फैक्ट्री के संसाधन लिमिटेड ही भेजे जाते थे। निर्धारित संसाधनों में काम पूरा करना पड़ता था। ऐसे में फैक्ट्री के लोकल अधिकारी अपने स्तर पर कई चीज़ों की कटौती कर देते थे। जिस गैस को हमेशा जीरो तापमान से नीचे रखने का आदेश दिया गया था उसे कई बार बिना एसी के ही छोड़ दिया जाता था। इससे तापमान के बढ़ने और कंटेनरों के फटने का खतरा बना रहता था।

सुरक्षा मानकों का भी खास ख्याल नहीं रखा जाता था इसलिए कई छोटे बड़े हादसे अकसर हुआ करते थे। ऐसा ही कुछ 2-3 दिसंबर की रात से कुछ दिन पहले हुआ था। फैक्ट्री के पास मौजूद बस्ती में बहुत से लोग थे जो वहां पर मजदूर से लेकर अलग-अलग पदों पर काम कर रहे थे। ऐसा ही एक व्यक्ति कंटेनरों की देखभाल के लिए रखा हुआ था। उसका काम कंटनेरों की देखभाल करना था। हालांकि उसके पास इस काम की कोई खास ट्रेनिंग नहीं थी।

एक दिन अचानक तापमान बढ़ जाने से कंटेनर से एक बूंद एमआईसी गैस उसके हाथ पर गिर पड़ी। वह दर्द से तड़प उठा। दूसरे मजदूरों के बीच जाकर मदद की गुहार लगाने लगा। लेकिन तब तक उसके हाथ का घाव काफी बढ़ गया था। हाथ में बहुत बड़ा छेद हो गया था जिसमें से लगातार खून निकल रहा था। घाव इतना ज्यादा गहरा था कि लग रहा था कि किसी ने उसके हाथ पर एक साथ कई तेजाब की बोतलें पलट दी हों। मजदूर उसे आनन फानन में अस्पताल लेकर भागे। वहां तक पहुंचते-पहुंचते ही उसका निधन हो गया।

ये राज्य सरकार और कंपनी के लिए पहला संकेत था। संकेत था कि ये फैक्ट्री सुरक्षित नहीं है। कुछ ऐसा है जो यहां के लोगों की जान के लिए खतरनाक है। इस हादसे के बाद बस्ती से लेकर वहां काम करने वाले लोग काफी सदमे में आ गए। एक बूंद से किसी की जान कैसे जा सकती है..ये बात लोगों को समझ नहीं आ रही थी। लेकिन ये सच था। उस बूंद से एक परिवार बर्बाद हो चुका था।

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सरकार और कंपनी पर इस मामले को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा था। नौबत यहां तक आ गई थी कि फैक्ट्री पर ताला लगा दिया जाए। फिर भी जैसे-तैसे मामले को संभाल लिया गया।  बस्ती के उस पुराने आदमी की जगह अब किसी दूसरे ने ले ली थी। हादसे के बाद एक बदलाव ये आया कि अमेरिकी अधिकारी फैक्ट्री देखने के लिए आए। मजदूरों को ये भरोसा दिया गया कि वह सुरक्षित जगह पर काम कर रहे हैं। कर्मचारियों को बताया गया कि उन्हें सूझबूझ से काम करना होगा वर्ना ये फैक्ट्री बंद हो सकती है।

मजदूर नहीं चाहते थे कि किसी भी हालत में ये कारखाना बंद हो, क्योंकि फैक्ट्री में काम करने से पहले उनके घरों में खाना नहीं था। साल 1977 में भारी सूखा पड़ा था। जिसका असर अब तक भोपाल में था। लोगों के पास काम नहीं था। ऐसे में ये फैक्ट्री उनके घरों की आखिरी उम्मीद थी। उनके लिए फैक्ट्री के बंद होने का ख्याल ही डराने वाला था।

हालांकि एक हादसा हो जाने के बाद भी न तो सुरक्षा बढ़ाई गई और न ही किसी और तरह के मानकों का ध्यान रखा गया। फिर वही हुआ जिसका डर था। 2-3 दिसंबर की रात थी। पूरा शहर गुलाबी ठंड की आगोश में था। सर्दी पड़ने लगी थी इसलिए कोहरा भी था। अचानक भोपाल की हवा में कुछ अलग महसूस किया गया। सोते हुए भी लोगों की आंखों में जलन हो रही थी। सांस लेने में परेशानी हो रही थी। सब घबराकर घरों से बाहर निकलने लगे। लेकिन बाहर भी वही आलम था। कुछ ही देर में पता चला कि उसी अमेरिकी कंपनी से गैस लीक हो गई थी।

ये कोई आम गैस नहीं थी। ये जहर था जो भोपाल की हवा में घुल गया था। लोग एक-एक सांस के साथ अपने अंदर जहर खींच रहे थे। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके साथ हो क्या रहा है। एक के बाद एक अस्पतालों में मामले बढ़ने लगे। लोग बेहोशी की हालत में वहां लाए जा रहे थे। किसी को सांस लेने में तकलीफ थी तो कोई चाहकर भी आंखें खोल नहीं पा रहा था। लोगों का सिर चकरा रहा था। एक बेबसी का माहौल था। इन सभी चीज़ों के बीच डॉक्टरों को भी बहुत ज्यादा परेशानी हो रही थी। दो अस्पतालों में मरीज़ों के लिए जगह नहीं थी।

भोपाल गैस त्रासदी के वक्त जो बुजुर्ग थे वो आज इतिहास हो गए हैं। जो जवान थे वो आज भी उस रात को एक बुरे सपने की तरह याद करते हैं। सड़कों पर चारों तरफ लाशें और बेबस लोग आज भी उनकी चीखें सब कुछ याद है। ये ऐसा मंजर था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी शहर का हाल देखकर रो दिए थे। भोपाल गैस त्रासदी के आठ घंटे के बाद शहर को जहरीली गैस से आजाद मान लिया गया था। लेकिन इसका असर आज भी लोगों के बीच देखने को मिलता है। माना जाता है कि शहर में सबसे ज्यादा कैंसर के मामले इस वजह से ही होते हैं। भोपाल गैस त्रासदी को 33 साल हो चुके हैं। लोगों को इंसाफ तो नहीं मिला लेकिन इस शहर से बीमारियां विरासत में मिलीं….

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