ममता बनर्जी की हार क्या हिंदुओं की जीत है?

ममता बनर्जी की हार क्या हिंदुओं की जीत है?

ममता बनर्जी इन दिनों रोहिंग्या मुसलमानों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं। ममता के मुताबिक ‘रोहिंग्या मुसलमानों को आतंकी कहना गलत है। रोहिंग्या आम आदमी हैं, वो परेशान हैं और उन्हें मदद की जरूरत है’। ममता रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से निकालने के सख्त खिलाफ हैं। रोहिंग्याओं पर केंद्र सरकार की नीति को गलत बताने वाली ममता का कहना है कि ‘रोहिंग्याओं को भारत से निकालना संविधान के खिलाफ है। रोहिंग्या के अपने अधिकार हैं और ऐसे में उनके हक को केंद्र कैसे छीन सकती है?’। ऐसे में ममता बनर्जी से सवाल है कि जिस हक के लिए वो रोहिंग्या की लड़ाई लड़ रही है क्या वो अधिकार उनके राज्य में हिंदुओं के पास है?

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ममता बनर्जी के लिए 21 सितंबर का दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता सरकार के मूर्ति विसर्जन पर लगाए एक दिन की रोक को खारिज कर दिया। कोर्ट के फैसले को जहां विपक्ष ममता बनर्जी की हार बता रहा है तो वहीं ममता बनर्जी इसे दिल्ली सरकार की साजिश। सवाल यहीं हैं ममता बनर्जी की हार क्या हिंदुओं की जीत है?

दरअसल 23 अगस्त को ममता बनर्जी ने दुर्गा पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन को लेकर एक नया निर्देश जारी किया था। निर्देश में कहा गया था कि 30 सितंबर की शाम 6 बजे से लेकर 1 अक्टूबर तक दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाएगा। ममता बनर्जी ने इसकी वजह मोहर्रम के जुलूस को बताया था।

ममता सरकार के इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए कहा

  • मूर्ति विसर्जन पहले की तरह रात 12 बजे तक हो सकता है

  • पुलिस ताजिया और प्रतिमा विसर्जन के लिए अलग-अलग रूट तैयार करें

कोर्ट ने मूर्ति विसर्जन के फैसले को रद्द करने के बाद ममता सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हए फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा..

  • दुर्गा पूजा और मुहर्रम को लेकर पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी

  • सरकार लोगों की आस्था में दखल नहीं दे सकती

  • सरकार बलपूर्वक आस्था पर रोक नहीं लगा सकती है

  • सरकार बिना आधार अधिकार का इस्तेमाल कर रही है

  • सरकार 2 समुदाय के बीच दरार क्यों पैदा कर रही है?

  • सरकार हिंदू और मुस्लमान दोनों को साथ रहने दे

  • सरकार ने आखिरी विकल्प का इस्तेमाल सबसे पहले क्यों किया?

  • प्रतिबंध लगाना था तो सभी कार्यक्रम पर क्यों रोक नहीं लगाया गया?

कोर्ट के फैसले के बाद ममता बनर्जी ने इसे भाजपा और केंद्र सरकार की साजिश बताई और कहा कि कोई उनका गला काट दे लेकिन कैसे काम करना है उन्हें कोई न बताए। कोर्ट के फैसले पर ममता के बयानों को उनके पिछले बयानों से जोड़ने पर पता चलता हैं कि ममता सिर्फ मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है… जैसे

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2 समुदाय के लिए 2 अधिकार क्यों?

ममता रोहिंग्या मुसलमानों और बांग्लादेशी शरणार्थियों के हक की वकालत करती हैं। जबकि मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाकर ममता बनर्जी ने संविधान के दिए धार्मिक आजादी और समानता के अधिकारों को खत्म कर दिया। ममता देश में धार्मिक एकता और सद्भाव की बात करती हैं। जबकि हकीकत ये हैं कि ममता सरकार ने कई मौकों पर वोटबैंक की राजनीति के लिए चुप्पी साध ली। इनमें धूलागढ़ और मालदा की हिंसा शामिल है। पश्चिम बंगाल में एक रैली के दौरान शब्बीर अली वारसी नाम के मौलाना ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से निकालने पर लाखों लोगों के कत्लेआम की बात कही लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अधिकार के नाम पर अन्याय क्यों?

मूर्ति विसर्जन पर कलकत्ता होईकोर्ट के फैसले के बाद ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें राज्य में शांति बनाए रखने के लिए कोई भी फैसला लेने का अधिकार है। उन्होने कोर्ट पर ही सवाल खड़े करते हुए पूछा कि अगर त्योहार पर हिंसा हुई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या ममता बनर्जी ने रोहिंग्या मुद्दे पर कभी ये सवाल सोचा? केंद्र सरकार लगातार देश की सुरक्षा को रोहिंग्या से खतरा बता रही है लेकिन ममता तो उन्हें आम आदमी बताने में लगी हुई हैं। ऐसे में केंद्र और राज्य के लिए 2 नियम कैसे हो सकते हैं?

संविधान से बड़ा कोई नहीं

ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें कैसे काम करना है कोई सिखा नहीं सकता। क्या ये ममता बनर्जी का अंहकार नहीं? नरेन्द्र मोदी को हिटलर और तुगलक बताने वाली ममता क्या खुद तालिबानी शासन की तरफ नहीं बढ़ रही? ऐसे में जो ताकत बतौर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मिली है वो संविधान कि देन है। और संविधान के तहत ही ये ताकत वापस ली भी जा सकती है। हाईकोर्ट का फैसला इसका उदाहरण है।

क्या कोर्ट का फैसला दिल्ली सरकार की साजिश है?

ममता बनर्जी ने कोर्ट के फैसले को दिल्ली की साजिश बताई। ऐसे में क्या ये कोर्ट का अपमान नहीं? ये सच है कि इस मामले पर भाजपा राजनीति कर रही है लेकिन भाजपा को ये मौका किसने दिया? क्या भाजपा ने राज्य में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई थी? या भाजपा ने सरकार के फैसले को रद्द किया है।

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क्या ममता सरकार इतनी कमजोर है कि वो राज्य में दो त्योहारों को एक साथ नहीं करा सकती? अगर ऐसा है तो ममता सरकार किस आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों की जिम्मेदारी ले रही थी? क्या ऐसी कमजोर सरकार को इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और अगर ममता सरकार दो त्योहार एक साथ करा सकती है तो मूर्ति विसर्जन पर रोक क्या वोटबैंक की राजनीति नहीं?

ममता बनर्जी की हार क्या हिंदुओं की जीत है?

इसका जवाब है ‘नहीं’। ये जीत संविधान की जीत है जो एकता और न्याय की बात करता है और यहीं संविधान भारत को महान बनाता है…..

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