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महाभियोग: कांग्रेस की एक गलती कैसे बना देगी दीपक मिश्रा को ‘अयोध्या राम मंदिर’ का ‘शहीद’?

2019 लोकसभा चुनाव में अब महज एक साल का समय रह गया है। भाजपा का मुकाबला इस बार किसी एक पार्टी से नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष से होगा। मोदी की लोकप्रियता के सामने इस बार विपक्ष की ताकत खड़ी होगी, ऐसे में चुनाव रोचक ही नहीं बल्कि मुश्किल भी होने वाला है। लेकिन क्या इस बीच विपक्ष कोई बड़ी गलती कर रही है? सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग, कहीं उन्हें राम मंदिर का शहीद तो नहीं बना देगा? कहीं इस प्रस्ताव का भाजपा और नरेन्द्र मोदी 2019 में तो फायदा नहीं उठाएंगे ? कांग्रेस समेत 7 पार्टियों का दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाना 2019 के लिए मास्टर स्ट्रोक है या सबसे बड़ी भूल, इस सवाल का जवाब जानने के लिए कुछ पहलुओं को समझना जरूरी है जैसे,

महाभियोग के पीछे क्या है कांग्रेस की रणनीति?

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस के महाभियोग को इन तीन कड़ियों की मदद से समझा जा सकता है,

  • कपिल सिब्बल मामला- 5 दिसंबर 2017, राम मंदिर मामले में सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड का पक्ष रखते हुए कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा था कि, इस केस की सुनवाई को जुलाई 2019 तक के लिए टाल दिया जाए। कपिल सिब्बल ने इसके पीछ दलील दी थी कि इस केस के जरिए एक पार्टी(भाजपा) को इसका राजनीतिक फायदा मिलेगा। हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने खुद कपिल सिब्बल के इस मांग का विरोध किया था। बोर्ड का कहना था कि वो जल्द से जल्द इस मामले में फैसला चाहता है। बोर्ड की तरफ से कहा गया कि कोर्ट में कपिल सिब्बल की मांग उनकी व्यक्तिगत मांग थी। इसके बाद हुई फजीहत के बाद कांग्रेस ने कपिल सिब्बल की इस मांग से दूरी बना ली। कपिल सिब्बल की इस मांग को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने ठुकरा दिया था। यहां ध्यान देना जरूरी है कि कपिल सिब्बल सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील और कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।

  • राम मंदिर का डर- राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट हिंदुओं के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। भाजपा इस फैसले को हिंदुओं की जीत और अपने वादे को पूरा करने के रूप में पेश करेगी। इसके चलते कांग्रेस और अन्य पार्टियां नहीं चाहती कि मंदिर मामले में कोर्ट फैसला सुनाए। लेकिन दीपक मिश्रा खुद इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस समेत 7 पार्टियों के महाभियोग के ये बड़ा पहलू हो सकता है।

  • दीपक मिश्रा हैं निशाने पर- अयोध्या राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा खुद इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं। ऐसे में जानकारों के मुताबिक  महाभियोग को अगर राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू स्वीकार कर लेते हैं, तो दीपक मिश्रा को न्यायिक फैसलों से खुद को अलग करना होगा। यानी दीपक मिश्रा जिन केस की सुनवाई कर रहे हैं, उन्हें सारे केस छोड़ने होंगे जिनमें राम मंदिर केस भी शामिल है। हालांकि दीपक मिश्रा को केस छोड़ने के लिए किसी भी तरह की संवैधानिक बाध्यता नहीं है, ये फैसला नैतिक आधार पर होगा। लेकिन ये भी तय है कि मुख्य न्यायाधीश पर कांग्रेस समेत 7 पार्टियों की तरफ से नैतिकता के आधार पर दबाव बनाया जाएगा। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये महाभियोग राम मंदिर मामले को लेकर लाया गया है? यहां ध्यान देना जरूरी है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने महाभियोग लाने के लिए मना कर दिया था, लेकिन लोया केस के बाद पार्टी ने इसे दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्यसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है।

यहां से हुई शुरुआत

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पद संभालते ही कई पार्टियों और नेताओं के निशाने पर आ गए थे। विपक्ष के नेताओं का कई मंचों पर इशारों ही इशारों में उन्हें संघ(RSS) का और केंद्र सरकार का एजेंट कहना आम बात थी। लेकिन जानकारों के मुताबिक दीपक मिश्रा को लेकर विवाद की असली वजह अयोध्या राम मंदिर मामला है। दरअसल जानकारों के एक वर्ग का मानना है कि दीपक मिश्रा को बतौर मुख्य न्यायाधीश बनाने के पीछे केंद्र की असली मंशा राम मंदिर समेत कई मुद्दे थे, जिनपर अब तक देरी हो रही थी। कपिल सिब्बल की मांग को खारिज करने के बाद दीपक मिश्रा कांग्रेस के निशाने पर आ गए थे। विपक्ष का मुख्य न्यायाधीश को लेकर हमला उस समय बढ़ गया, जब इस साल की शुरुआत में नाराज चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोर्ट में चल रही अनियमिततताओं का जिक्र किया। इन चार जजों में इनमें जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर,जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल थे। जस्टिस कुरियन जोसेफ दीपक मिश्रा के बाद सबसे वरिष्ठ जज हैं।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद देश में दो धड़ा बंट गया। एक जिसका मानना था कि देश कि न्यायपालिका केंद्र के दबाव में काम कर रहा है और दीपक मिश्रा इस एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। वहीं दूसरे तबके का मानना था कि दीपक मिश्रा का राम मंदिर समेत कई मामलों में जल्द फैसला करना विपक्ष को पसंद नहीं आ रहा है, जिसके चलते उनकी छवि को खराब किया जा रहा है।

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विपक्ष के महाभियोग का ये पेंच समझना जरूरी है

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गए महाभियोग में कई आरोप हैं। इनमें कार्यप्रणाली में अनियमितता, 12 जनवरी को 4 जजों की नाराजगी, जमीन धोखाधड़ी और CBI जज बीएच लोया केस शामिल है।

  • कार्यप्रणाली- विपक्ष और इससे पहले 4 जजों का कहना था कि दीपक मिश्रा अपने मन मुताबिक केस का बंटवारा कर रहे हैं। इस सवाल के जवाब में जानकारों का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश को केस का बंटवारा करने का हक है। ऐसे में अगर वो किसी संबिधित केस को अपने पास रखना चाहते हैं तो वो कर सकते हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

  • जज विवाद- 12 जनवरी को 4 जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। इस मामले को बाद में हल करने की कोशिश भी की गई, जहां बाद में फैसला लिया गया कि रोस्टर बनाने का हक मुख्य न्यायाधीश का ही है। हालांकि जजों का विरोध अब भी जारी है।

  • जमीन धोखाधड़ी मामला- दीपक मिश्रा पर आरोप है की साल 1979 में फर्जी काजात के जरिए उन्होंने 2 एकड़ जमीन सरकारी योजना के तहत लीज पर ली थी। साल 1985 में तत्कालीन एडीएम ने उनका आवंटन रद्द कर दिया था। इस बीच दीपक मिश्रा पटना और दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी बने। 10 अक्टूबर 2011 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया और 28 अगस्त 2017 को वो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाए गए। अब जब 2 अक्टूबर को दीपक मिश्रा रिटायर हो रहे हैं तब इस केस की याद महज एक एत्तेफाक है या फिर एक राजनीतिक अवसरवाद। यहां ध्यान देना जरूरी है कि जमीन मामले में एडीएम के आदेश पर 2012 में हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया गया था। 2012 में दीपक मिश्रा ने इस जमीन को वापस लौटा दिया था लेकिन तब तक वो सुप्रीम कोर्ट में जज बन चुके थे।

  • लोया केस- एक जनहित याचिका के तहत लोया केस में एसआईटी जांच की मांग की गई थी, जिसे दीपक मिश्रा की बेंच ने ठुकरा दिया था। कोर्ट की तरफ से बयान में कहा गया था कि याचिका न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए राजनीतिक उद्देश्य से दायर की गई है। दरअसल इस केस में मामले ने तूल पकड़ना तब शुरू किया जब The Caravan की स्पेशल रिपोर्ट में इस केस को लेकर सवाल उठाए गए। इसमें ECG का काम न करना और जज लोया को ऑटोरिक्शा में ले जाने जैसी बाते कहीं गई हैं। मैगजीन की रिपोर्ट को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर तमाम लोगों ने शेयर करना शुरू कर दिया और फिर केस को लेकर न्यायप्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने लगे। लेकिन The Indian Express की रिपोर्ट में  पाया गया कि The Caravan के कई तत्थ गलत हैं। इनमें ECG और ऑटोरिक्शा में ले जाने जैसी बातें शामिल हैं। ऐसे में इस मामले में न तो आरोप लगाने वाले और न ही विपक्ष के पास कोई ठोस सबूत है।

महाभियोग का विकल्प और भविष्य

विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा अध्यक्ष और उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू को सौंप दिया है। वेंकैया नायडू अगर इस प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं, तो विपक्ष के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा, जहां ये अपील खारिज हो जाएगी। अगर वेंकैया नायडू इस प्रस्ताव पर बहुमत के लिए सहमति भी दे दें तो भी ये प्रस्ताव पास नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश को हटाने के लिए जरूरी है कि महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा और लोकसभा में दो तिहाईं बहुमत से पास हो और फिर इसपर राष्ट्रपति की मुहर लगे। विपक्ष के पास दोनों ही सदनों में बहुमत नहीं है। ऐसे में महाभियोग का न तो कोई विकल्प है और न ही कोई भविष्य। कांग्रेस समेत सात पार्टियों का इस प्रस्ताव को लाना महज कुछ और नहीं बल्कि एक राजनीतिक कदम है।

महाभियोग क्यों है भाजपा के लिए संजीवनी?

कुछ जानकारों का मानना है कि महाभियोग प्रस्ताव कांग्रेस समेत 7 पार्टियों की सबसे बड़ी गलती साबित होगी, जहां फायदा केवल भाजपा को होगा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग से भाजपा को कई फायदे हो सकते हैं इनमें,

  • महाभियोग ठुकराये जाने पर- मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को अगर वेंकैया नायडू ठुकरा देते हैं, तो भाजपा इसे न्यायपालिका की जीत बताएगी। जाहिर है कि इसके बाद कांग्रेस समेत सातों पार्टियां वेंकैया नायडू पर भी पक्षपात का आरोप लगाएंगी। इससे दीपक मिश्रा का मुद्दा दब जाएगा और लड़ाई विपक्ष बनाम लोकतंत्र और न्यायपालिका हो जाएगी। भाजपा इस बात को जोर-शोर से उठाएगी कि कांग्रेस उपराष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश का अपमान कर रही है। साथ ही भाजपा अपने वोटरों में ये संदेश भी दिलवाएगी की दीपक मिश्रा को राम मंदिर के बदले इन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही भाजपा ये भी दिखा सकती है कि वो राम मंदिर को लेकर दीपक मिश्रा के समर्थन में है। यानी इस मामले में अगर कांग्रेस विरोध करे या न करे दोनों ही शर्तो पर उसका नुकसान तय है।

  • महाभियोग को मंजूरी मिलने पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को अगर वेंकैया नायडू स्वीकार कर लेते हैं, तो जाहिर है उन पर केस से दूरी बनाने का नैतिक दबाव बनाया जाएगा। इस मामले में भी भाजपा का फायदा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा कांग्रेस समेत सपा, बसपा और अन्य 4 पार्टियों को हिंदू और मंदिर विरोधी बताएगी। दीपक मिश्रा का केस से दूरी बनाना उन्हें शहीद का दर्जा देने जैसा है। भाजपा इस मुद्दे को 2019 में उठा सकती है कि कांग्रेस और अन्य पार्टियों की वजह से राम मंदिर का मामला अटक गया या उसमें देरी हो रही है। ऐसे में राम के नाम पर वोट लेने वाली पार्टी को अगर नाराज हिंदुओं का साथ मिल गया, तो बसपा और सपा का जातिवाद फार्मुला फिर से बेअसर हो जाएगा।

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कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को क्या हो सकता है नुकसान?

  • कांग्रेस की घट रही है विश्वसनीयता- कांग्रेस के अगर पिछले 4 सालों के रवैये को देखा जाए, तो एक गलती लगातार देखने को मिलती है। कांग्रेस का मुद्दों के बजाए व्यक्तियों पर हमला करना उसके लिए घाटे का सौदा रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सदन में हिटलर/तानाशान कहना हो, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पर पक्षपात का आरोप लगाना हो, चुनाव आयोग- ईवीएम पर सवाल खड़े करने हो या फिर सर्जिकल स्ट्राइक को झूठा बताना, कांग्रेस की ये वो गलतियां हैं जिसका फायदा सत्तापक्ष आज भी उठा रहा है। कांग्रेस के इन आरोपों से जहां जनता में विश्वास घटा है, वहीं असल मुद्दे इन हंगामों में दब जाते हैं। ऐसे में महाभियोग भी एक ऐसा ही कदम है, जहां कांग्रेस को फायदे के बदले नुकसान होता ही दिख रहा है।

  • सपा-बसपा को नुकसान- उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दोनों पार्टियों का उदय और अस्तित्व जातिवाद पर निर्भर करता रहा है। 2014 और 2017 में इस जातिवाद राजनीति का काट भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति से किया था। सपा और बसपा अब भाजपा के खिलाफ 2019 में एक साथ लड़ सकती हैं। लेकिन दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव में इन पार्टियों का कांग्रेस को साथ देना उत्तर प्रदेश में इन्हें महंगा पड़ सकता है। अगर राम मंदिर और दीपक मिश्रा के मुद्दे को भाजपा भुनाने में सफल रही, तो जातिवाद की राजनीति में फिर हिंदुत्व का सेंध लग सकता है।

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मनमोहन सिंह से लेकर दीदी तक ने छोड़ा साथ

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने हस्ताक्षर नहीं किया है। हालांकि पार्टी इसे कुछ खास तवज्जों नहीं दे रही है। महाभियोग प्रस्ताव में कांग्रेस समेत जो 7 पार्टियां हैं उनमें सपा, बसपा, माकपा, राकांपा, भाकपा और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीक(IUML) है। जनाधार के मामले में ये पार्टियां लोगों और जमीनी हकीकत से काफी दूर हैं। वहीं विपक्ष की बड़ी पार्टियां तृणमूल कांग्रेस और डीएमके ने महाभियोग नोटिस पर दस्तखत नहीं किए हैं। ऐसे में सवाल ये है कि जिस प्रस्ताव को नेताओं और पार्टियों का समर्थन नहीं है, उसे इतने संवेदनशील और चुनाव से ठीक पहले लाना कहीं कांग्रेस की एक और गलती तो नहीं है?’

एक गलती जिसे कांग्रेस भूल गई

भारत के इतिहास में वी रामास्वामी ऐसे पहले जज थे जिनपर महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। दरअसल वी रामास्वामी पर बतौर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहते सरकारी संसाधनों के दुरूपयोग और अनियमिताओं का आरोप लगा। इसके बाद 1 फरवरी 1991 को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पारित किया। महाभियोग के समर्थन में भाजपा और लेफ्ट समेत कई पार्टियों के सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र दिया। लोकसभा अध्यक्ष रवि राय ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकर कर के एक कमेटी भी बना दी। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के जज पीबी सावंत, बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी देसाई और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस ओ चिनप्पा रेडी शामिल थे। कमेटी ने वी रामास्वामी के खिलाफ कुल 14 आरोपों में से 11 आरोपों को सही पाया।

इसके बाद 10 मई 1993 को वी रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग पर बहस और वोटिंग रखी गई थी। यहां जानना जरूरी है कि वी रामास्वामी के समर्थन में 2 वकिलों को नियुक्त किया गया था, जिनमें कपिल सिब्बल और जे एस खेहर थे(जे एस खेहर बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी बने)। इस मामले में वी रामास्वामी ने खुद पर लगे आरोपों के बदले कहा की वो दक्षिण भारत से आते हैं इसलिए उनके खिलाफ आरोप लगाए जा रहे हैं। ये बात उस समय कही गई थी, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और लोकसभा अध्यक्ष रवि राय दोनों ही दक्षिण भारत से थे। महाभियोग प्रस्ताव पर आधी रात के बाद हुए इस वोटिंग में कांग्रेस ने वॉक आउट कर दिया था। प्रस्ताव के समर्थन में कुल 196 वोट पड़े थे लेकिन दो तिहाई बहुमत न होने के कारण वी रामास्वामी बच गए। कांग्रेस के बारे में आज भी कहा जाता है कि पार्टी के वॉकआउट करने के कारण भ्रष्टाचार में पाए जाने के बाद भी वी रामास्वामी बच गए।

दीपक मिश्रा के बारे में ये भी

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर फैसला राज्यसभा स्पीकर वेंकैया नायडू को लेना हैं। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि दीपक मिश्रा जिन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं उनमें, कठुआ गैगंरेप मामला, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, IPC की धारा 377 को खत्म करने की मांग की याचिका, कावेरी विवाद और आधार की वैधता शामिल है। दीपक मिश्रा को याकुब मेमन मामले की सुनवाई में आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खोलवाने के लिए भी जाना जाता है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव कांग्रेस के लिए कितना सफल और कारगर साबित होगी, ये तो समय बताएगा। लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस समेत 7 पार्टियों की एक गलती दीपक मिश्रा को शहीद बना देगा जिसका फायदा 2019 में सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी को होगा

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