गुजरात चुनाव

गुजरात चुनाव: मोदी या राहुल में किसको हुआ कम वोटिंग का नुकसान?

EVM मशीन की खराबी और Bluetooth कनेक्शन की अफवाहों के बीच गुजरात चुनाव का पहला चरण शनिवार को पूरा हो गया। 89 सीटों पर कुल 68 प्रतिशत मतदान हुए जो कि साल 2012 की तुलना में(71.3 प्रतिशत) 3.3 फीसदी कम थे। ऐसे में सवाल ये है कि पहले चरण में हुए कम मतदान का नुकसान किसे हुआ? इस सवाल के जवाब को समझने के लिए कई पहलुओं को जानना जरूरी है। इन्हीं पहलुओं को एक-एक कर के जानते हैं।

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2012 से अबतक क्या बदला?

2012 गुजरात चुनाव में भाजपा को इन सीटों पर भारी बढ़त मिली थी। भाजपा ने 89 सीटों में 67 सीटें अपने नाम की थीं। पहले चरण में सौराष्ट्र और कच्छ की ज्यादातर सीटों पर मुकाबला था। इन सभी सीटों पर पिछली बार की तुलना में कम वोटिंग हुई। कच्छ में 63%, मोरबी में 75, राजकोट में 70%, जामनगर में 65%, भरूच में 71%, नर्मदा में 73%, पोरबंदर में 60%, देवभूमि द्वारका में 63%, गिर सोमनाथ में 70%, अमरेली में 67%, सूरत में 70%, जूनागढ़ में 65%। ये चरण 3 मायनों में खास है।

  1. इन सीटों पर हमेशा से भाजपा का दबदबा रहा है।

  2. इन सीटों पर ज्यादातर पाटीदार और दलित मतदाता हैं।

  3. हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी के कांग्रेस को समर्थन के बाद इन सीटों पर कई अटकलें लगाई जा रही थी।

कम मतदान के क्या हैं मायने?

गुजरात चुनाव के पहले चरण में कम वोटिंग के 2 मायने हो सकते हैं।

  1. ये वो मतदाता हो सकते हैं जो भाजपा को वोट करते आए हैं लेकिन इस चुनाव में उन्होने भाजपा के खिलाफ अपना गुस्सा पोलिंग बूथ में न जाकर दिया। ऐसे में भाजपा जिन सीटों को अपना गढ़ मानती आई है उसपर भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

  2. वो मतदाता जो भाजपा के खिलाफ वोट देना चाहते थे लेकिन कांग्रेस या दूसरी पार्टियों पर कम विश्वास के चलते मतदान नहीं किया। ऐसे में भाजपा को न तो फायदा हुआ और न ही नुकसान।

  3. वो मतदाता जो भाजपा के खिलाफ जा कर कांग्रेस को वोट करना चाहते थे लेकिन मणिशंकर अय्यर के बयान से नाराज होने के कारण मतदान नहीं किया। ऐसे में नुकसान कांग्रेस को होगा।

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कम वोटिंग से किसको नुकसान?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गुजरात चुनाव के पहले चरण में कम वोटिंग का नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं

  1. EVM तो है बहाना– जानकारों के मुताबिक कम मतदान से कांग्रेसी खेमे में हलचल दिख रही है। भाजपा के खिलाफ गुस्से को कांग्रेस पोलिंग बूथ तक नहीं खींच पाई। शायद यही कारण है कि EVM के मुद्दे को कांग्रेस फिर से उठाने लगी है, जो इशारा है कि कांग्रेस के लिए पहला चरण फायदे का सौदा नहीं रहा। दूसरे चरण के चलते कांग्रेस EVM के मुद्दे पर आक्रमक नहीं है लेकिन अगर दूसरा चरण भी उम्मीदों के खिलाफ रहा तो कांग्रेस इसे जोरों पर उठाएगी।

  2. मणिशंकर के बयान से कितना नुकसान– राजनीतिक जानकारों के मुताबिक मणिशंकर अय्यर का प्रधानमंत्री मोदी को नीच कहना पार्टी के खिलाफ गया। प्रधानमंत्री मोदी पर निजी हमला कांग्रेस की सबसे बड़ी चूक साबित हो रही है। गुजरात के लोकल ब्वॉय पर निजी हमले से कुछ मतदाता भाजपा के समर्थन में हो गए, तो कुछ कांग्रेस को वोट करने के बजाए मतदान का बहिष्कार करना बेहतर समझा।

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मतदाताओं के मन की बात

कुछ स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निजी हमले से मतदाताओं का रुख भाजपा को लेकर नरम हुआ है। भाजपा से नाराज चल रहे कई मतदाताओं ने भाजपा के समर्थन में वोट किया। तो वहीं मतदाताओं का एक ऐसा वर्ग जो कांग्रेस को विकल्प मान कर चल रहा था, वो इन बयानों के बाद कांग्रेस से भी नाराज हो गया। ऐसे वर्ग ने किसी भी पार्टी को वोट नहीं दिया। जिसका फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है।

क्या है कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल?

  1. भाजपा की गलती को कांग्रेस ने दोहराया?–  भाजपा ने जो गलती दिल्ली और बिहार चुनाव में किया था वही गलती कांग्रेस ने गुजरात चुनाव में किया। भाजपा ने इन दोनों राज्यों के लोकल ब्वॉय को चुनाव के दौरान टारगेट किया था। भाजपा ने जहां दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल और उनके परिवार पर हमला किया, तो वहीं बिहार में नरेन्द्र मोदी ने नीतीश कुमार के DNA पर सवाल खड़े किए थे। इसका नतीजा ये रहा कि लोगों की सहानुभूती इन दोनों ही नेताओं को मिली। और दोनों ही राज्य में भाजपा का सफाया हो गया।

  2. अपनी ही गलती को कांग्रेस ने फिर दोहराया– कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर नरेन्द्र मोदी को चायवाला से लेकर रैलियों में रावण और बंदर तक कहा। कांग्रेस को अपनी गलती का अहसास तब हुआ जब मणिशंकर अय्यर के बयान को भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसके बाद चुनाव से 2 दिन पहले कांग्रेस ने पार्टी के लिए एक एडवायजरी जारी किया। एडवाजरी में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ टिप्पणी करने वाले नेताओं को पार्टी से बाहर करने तक की चेतावनी दी गई। लेकिन सवाल ये है कि क्या तब तक बहुत देर हो चुकी थी?

पिक्चर अभी बाकी है

दूसरे चरण में जिन सीटों पर चुनाव होने हैं उनमे भाजपा का प्रदर्शन 2012 में उतना अच्छा नहीं था। ऐसे में दोनों पार्टियों की नजर इस चरण पर है। कांग्रेस जहां फूंक-फूंक कर कदम रख रही है तो वहीं भाजपा लगातार रणनीति बदल रही है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या गुजरात की जनता कांग्रेस को दूसरा मौका देगी या मोदी को नीच कहना कांग्रेस को फिर भारी पड़ेगा…

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