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इमरजेंसी: इंदिरा गांधी के वो कौन से फैसले थे जो फिल्म ‘दीवार’ की याद दिलाते हैं?

Surf Excel का विज्ञापन तो हम सभी ने देखा होगा। विज्ञापन में बड़ी सादगी से दावा किया जाता है कि Surf Excel  से किसी भी जिद्दी दाग को मिनटों में हटाया जा सकता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या हर तरीके के दाग को मिटाया जा सकता है? खासकर वो दाग जो लोकतंत्र पर लग चुका हो…..

जब जयप्रकाश के रैली से डरी सरकार

25 जून 1975 दिल्ली के रामलीला मैदान में जनसैलाब उमड़ चुका था। विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं का अंबार लगा था। हर तरफ सरकार की नीतियों के खिलाफ भारी रोष दिखाई दे रहा था। इस दौरान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जयप्रकाश नारायण मंच पर आये और उन्होने सरकार को उखाड़ फेंकने का लोगों से आह्वान किया। जयप्रकाश के शब्द सरकार की नीतियों की कलई खोल रहे थे जिससे अब आम आदमी परेशान हो चुका था। जयप्रकाश नारायण के अलफाज लोगों की आवाज बन रहे थे और इसी बीच मंच से मशहूर कवि दिनकर की ऐतिहासिक पंक्ति नारे में बदल गई ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’। फैसला लिया गया कि कांग्रेस विरोधी ताकतें 29 जून को हड़ताल करेंगी। सरकार के खिलाफ आंदोलन की तैयारी हो चुकी थी लेकिन विपक्ष का29 जून कभी आया ही नहीं….. क्योंकि 25 जून की आधी रात को सरकार ने इमरजेंसी लागू कर दी।

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शुरू हुआ गिरफ्तारियों का दौर

आपातकाल का पता लोगों को 26 जून की सुबह रेडियो लगा। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गांधी ने रेडियो पर लोगों से कहा- ‘भाइयों और बहनों,राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, इससे आतंकित होने की कोई जरूरत नहीं है’। इंदिरा गांधी के संदेश ने सब कुछ बदल कर रख दिया था। देश अचानक से बदल चुका था और देश का कानून भी। उस समय के बंगाल के मुख्यमंत्री शंकर रे की सलाह पर धारा-352 के तहत पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। इसके बाद तो लोकतंत्र किताब के पन्नों का हिस्सा भर बन कर रह गया। देश में गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया। हर विरोध करने वाले को या तो जेल में डाल दिया गया या फिर गोली मार दी गई। सरकार के खिलाफ जिन नेताओं के पीछे भीड़ खड़ी थी उन्हीं नेताओं को रातों रात जेल में डाल दिया गया।

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इमरजेंसी- लोकतंत्र का वो दाग जिसे Surf Excel भी नहीं मिटा पाएगा

अखबार के दफ्तरों की काटी गई बिजली

सरकार को डर था कि कहीं जयप्रकाश की बगावत रामलीला मैदान से निकलकर पूरे देशभर में न फैल जाए इसलिए 25 जून की आधी रात को ही दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। जहां एक तरफ आंदोलन को फैलने से रोका जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर इंदिरा गांधी गांधी के विषेश सलाहकार आर के धवन के कमरे में बैठकर आधी रात को संजय गांधी और ओम मेहता ये तय कर रहे थे कि किसे-किसे गिरफ्तार करना है। 26 जून की सुबह जब इंदिरा गांधी सोने गई तबतक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी जैसे बड़े नेता जेल के अंदर कैद कर दिए गए थे।

खत्म हुआ जीने का अधिकार

धारा-352 लागू करने के बाद सरकार अमर हो चुकी थी। क्योंकि अब चुनाव कब होंगे ये फैसला सरकार के हाथ में था। इंदिरा गांधी को पता था कि आपातकाल के नाम पर अब उनके पास असीमित ताकत है जहां वो कोई भी कानून पास या लागू कर सकती थी। ऐसा हुआ भी 1 लाख से ज्यादा लोगों को मीसा-डीआरआई के तहत जेल में डाल दिया गया। इस दौरान न्यायपालिका महज मजाक बनकर रह गई थी क्योंकि आर्टिकल 19 के तहत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार खत्म हो चुके थे। इस बात को आसानी से ऐसे समझा जा सकता है कि विरोध के नाम पर किसी भी निर्दोष को मारने पर अपील नहीं हो सकती थी क्योंकि आर्टिकल 21 के तहत जीने का आधिकार भी खत्म हो चुका था।

फिल्मों के जलाए गए पोस्टर

इमरजेंसी लगने के बाद अब प्रेस की आजादी भी महज एक दिखावा भर थी जहां सरकार ने सभी संपादकों को क्या छापना है और क्या नहीं इन सब की लंबी फेहरिस्त थमा दी थी। जो मान गए वो बच गए बाकियों को जेल में डाल दिया गया। दमन की इस सुनामी ने बॉलीवुड को भी नहीं छोड़ा। फिल्मकारों,कवियों को सरकार की तारीफ में लिखने को कहा गया। सरकार के फरमान को बहुतों ने मान भी लिया और जो नहीं माने उनके लिए जेल का रास्ता खुला था। लेकिन इस दौर में कुछ ऐसे भी थे जो झुके नहीं। किशोर कुमार ने सरकार का फैसला मानने से इंकार कर दिया जिसके बाद उनके गाने रेडियो पर बजने बंद हो गए। किशोर के घर पर आयकर के छापे मारे गए उन्हें परेशान किया गया। गुलजार की फिल्म आंधी पर सरकार ने रोक लगा दी। अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी को सरकार का विरोध मानकर उसके सारे प्रिंट जला दिए गए।

83 लाख लोगों की नसबंदी करवाई गई

ऐसे में अगर कोई आजाद था तो वो संजय गांधी और उनके साथी बंसीलाल,ओम मेहता और विद्याचरण शुक्ला। संजय गांधी देश के विकास के नाम पर अपने पांच सूत्रिय एजेंडे को आगे बढ़ा रहे थे जिसमे- वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा को खत्म करना, पौधा-रोपण, परिवार नियोजन और जाति एवं उन्मूलन शामिल थे। लेकिन विकास के ये एजेंडे देखते ही देखते अत्याचार में बदल गए जब दिल्ली में तुकर्मान गेट की झुग्गियों को सिर्फ सौंदर्यीकरण के नाम पर साफ कर दिया गया। परिवार नियोजन के नाम पर 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करवा दी गई। इतिहास में ऐसी अमानवीय घटना पहले कभी नहीं हुई थी।

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खत्म हुआ आपातकाल

इंदिरा गांधी ने इस घटना के बाद कहा था कि देश को शॉक ट्रिटमेंट की जरूरत थी। लेकिन असल में ये शॉक ट्रिटमेंट के नाम पर अत्याचार और तानाशाही थी। बगावत के हर एक शोर को शांत करने के बाद इंदिया के सिपे सहालकारों ने उन्हें आश्वासन दिलाया कि अब खतरा टल चुका है। इंदिरा गांधी को ये विश्वास हो चुका था कि अगर चुनाव हुए तो जीत उनकी ही होगी। इसी विश्वास के चलते 19 महीने के इमरजेंसी खत्म हुई और वापस चुनाव हुए। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास ही बन गया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली। लोकतंत्र की आंधी में इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी अपनी सीट तक नहीं बचा पाए। इंदिरा गांधी को जबतक अहसास होता सत्ता जा चुकी थी। लोगों ने संजय गांधी की तानाशाही और इंदिरा गांधी के अहंकार का जवाब दे दिया था। कांग्रेस की सरकार अर्श से फर्श पर आ चुकी थी। लोकतंत्र को दर किनार करने वाली इंदिरा गांधी को लोकतंत्र का फैसला मिल चुका था। लेकिन तब तक देश को काफी नुकसान हो चुका था। आंदोलन के जनक जयप्रकाश की किडनी कैद के दौरान खराब हो चुकी थी।

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जब इंदिरा गांधी और संजय तक को मिली चुनाव में हार

इमरजेंसी को आज कांग्रेस भी अपनी गलती मानती  है लेकिन ऐसा नहीं है कि इमरजेंसी के बाद कांग्रेस ने फिर कोई गलती नहीं की। कांग्रेस की सरकार ने सत्ता में वापसी के बाद 40 से ज्यादा राज्यों में सरकारे भंग की और राज्यपाल शासन लगा दिया। लोगों ने वो दौर भी देखा जब रामदेव के आंदोलन में कांग्रेस ने रात में पुलिस भेज कर लोगों पर लाठियां चलवाईं। इन सब के बीच उस घटना का कोई कैसे भूल सकता है जब देश की बेटी निर्भया के लिए इंडिया गेट पर उमड़ी भीड़ को पुलिस के लाठियों और वाटर केनन का सामना करना पड़ा। यही कारण थे कि 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 44 सीट पर सिमट गई और अब मौजूदा दौर में उसके पास कुछ छोटे राज्य ही बचे हैं।

बीजेपी के लिए सीख है इमरजेंसी

इमरजेंसी एक सीख थी इंदिरा गांधी के लिए, देश के लिए और विपक्ष के लिए। वापस surf excel के प्रचार पर आते हैं। प्रचार में ये भी कहा जाता है कि दाग अच्छे हैं। लोकतंत्र का ये दाग विपक्ष के लिए संजीवनी बन गया लेकिन अब जब वो विपक्ष सत्ता में आ चुका है तो उसे इस दाग से बचना चाहिए। क्योंकि इंदिरा गांधी की भूल को बीजेपी ने भी दोहराया है अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सरकार को भंग करके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी को झुकना पड़ा। इमरजेंसी का दाग फिल्म दीवार की याद दिलाता है जहां विजय के हाथ पर लगा निशान कभी मिट नहीं सका। ऐसे में इमरजेंसी और यह फिल्म दोनों ही बीजेपी के लिए एक सीख है। वर्ना अगर ये दाग लगा तो विजय के हाथ पर लगे निशान की तरह हो जाएगा जिसे surf excel भी नहीं मिटा पाएगा।

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Haripriya Mishra

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I Believe We All Can Find God But It Is Up to The Questions We Ask. God Himself Answers The Toughest Of The Questions.

An Atheist By Profession And A Believer By Heart.

Writer| Journalist| Engineer|
Haripriya Mishra

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