1947 बंटवारा: आजाद भारत की पहली प्रेम कहानी

1947 बंटवारा: आजाद भारत की पहली प्रेम कहानी

बंटवारे की कई कहानियां आपने सुनी होंगी। लोगों का बिछड़ना, लंबा संघर्ष और फिर नई जिंदगी की शुरुआत करना। बंटवारे के पन्नों में ऐसे कई कहानियां मौजूद हैं। एक ऐसी ही कहानी है भगवंत सिंह मैनी और प्रीतम कौर की। बंटवारे से कुछ समय पहले ही दोनों के परिवार मिले थे। दोनों की एक दूसरे से मुलाकात करवाई गई थी। भगवंत सिंह को प्रीतम बहुत पसंद आईं। प्रीतम भी भगवंत सिंह को अपने जीवन साथी के तौर पर देखने लगी थीं। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये पहली मुलाकात आखिरी बन जाएगी।

भगवंत सिंह और प्रीतम कौर

इस बीच हिन्दु और मुस्लमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। हिंसा फैल गई। बंटवारे में सबसे ज्यादा नुकसान जिस इलाके को हुआ था वह पंजाब था। एक प्रांत को दो हिस्सों में बांट दिया गया था। आधे लोगों को तो कुछ दिनों तक यही नहीं समझ आ रहा था कि वह पाकिस्तान के हिस्से में हैं या भारत के हिस्से में। बस भगदड़ मची हुई थी। हर कोई अपनी जान बचा कर भाग रहा था। कहां जाना है  कोई नहीं जानता था। बस एक नया सफर शुरू करना था जहां रास्ता भी अंजान था और मंजिल भी।

इस भीड़ का हिस्सा वह दोनों भी थे जिन्होंने हाल ही में अपनी नई जिंदगी के सपने बुनने शुरू किए थे। लेकिन बंटवारे की आग ने सबकुछ जलाकर राख कर दिया था। भगवंत सिंह के तीन भाई इस हिंसा की भेट चढ़ चुके थे। ऐसे में परिवार ने बिना देरी किए अपना घर छोड़कर नए ठिकाने की खोज में निकलने का फैसला किया।

बंटवारे की घोषणा होते ही बड़ी संख्या में दोनों तरफ के लोग नए ठिकानों की तलाश में जान बचा कर भागने लगे थे

भगवंत सिंह ट्रेन पर सवार हो गए। उनके पास उस वक्त कुछ नहीं था। बस जल्दबाज़ी में एक ब्रीफकेस में कुछ दस्तावेज़ रख लिए थे। उम्मीद थी कि इन कागज़ के टुकड़ों के भरोसे उन्हें भारत में कोई नौकरी मिल जाएगी। पूरे रास्ते भगवंत सिंह के दिमाग में कई बातें चल रही थीं। पीछे बहुत कुछ या कहें कि सबकुछ छूट चुका था। प्रीतम के साथ क्या हुआ होगा ..वो कहां होगी..क्या वो दोबारा कभी उससे मिल पाएंगे… ये बातें सोच कर ही भगवंत के रोंगटे खड़े हो रहे थे। उनकी नज़रें हर चेहरे को गौर से देखती थीं कि शायद वो चेहरा उन्हें दोबारा दिख जाए। लेकिन ऐसा  हुआ नहीं।

ये भी पढ़े- 1947 बंटवारा: कहानी उस अंग्रेज़ की जिसके हिस्से आई सिर्फ बंटवारे की बदनामी

वहीं दूसरी तरफ प्रीतम और उनका परिवार भी पाकिस्तान छोड़कर निकलने की तैयारी में लगा था। प्रीतम ट्रेन में बैठी हुई थीं उनकी गोद में उनका दो साल का भाई था। ये सफर डराने वाला था। चारो तरफ चीख पुकार थी। हर वक्त एक डर सता रहा था कि कहीं कोई भीड़ उन्हें अपना शिकार न बना ले। कुछ घंटों का सफर भी सदियों जैसा लंबा लग रहा था। प्रीतम को कई बार भगवंत का ख्याल आया। लेकिन उन्होंने मान लिया शायद वह पहली और आखिरी मुलाकात थी। प्रीतम के पास एक बैग था उसमें उनकी कीमती जैकट रखी हुई थी।

दोनों परिवार अमृतसर के शरणार्थी कैंपों में पहुंचे। किसी को नहीं पता था कि दोनों परिवार एक ही जगह पर हैं। सब अपने भविष्य को लेकर डरे हुए थे। आगे क्या होना है कोई नहीं जानता था। खाने पीने और रहने के लिए कस्टोडियन डिपार्टमेंट के चक्कर लगाने पड़ रहे थे। डिपार्टमेंट की तरफ से रोज़ खाने पीने के लिए कुछ ट्रक आते थे। खाना लेने के लिए लंबी-लंबी लाइने लगा करती थीं।

अमृतसर समेत भारत-पाकिस्तान के दूसरे सीमा से लगे इलाकों में कैंप लगवाए गए थे

एक बार प्रीतम खाने की कतार में लगी हुई थीं। वह इस बात से बिल्कुल बेखबर थीं कि भगवंत सिंह भी उसी लाइन में खड़े हैं। कहानी फिल्मी लग सकती है लेकिन ये किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा सच था। कुछ ही देर में भगवंत सिंह की नज़र एक लड़की पर पड़ी उन्हें लगा कि ये वही है जिसको उनकी नज़रे काफी लंबे समय से खोज रही थीं। भगवंत उस लड़की के पास गए और लगा शायद ये चमत्कार है। वह प्रीतम ही थीं।

दोनों एक दूसरे को पहचान गए। दोनों परिवार एक बार फिर साथ आ गए थे। वो दौर ऐसा नहीं था कि शादी धूमधाम से की जाए। लेकिन फिर भी  परिवारों ने दोनों की शादी जल्द से जल्द करने का फैसला कर डाला। फिर भी शादी तुरंत नहीं की जा सकती थी। लेकिन उसके बाद भगवंत और प्रीतम कभी अलग नहीं हुए। मुलाकातों का दौर शुरू हो गया और फिर वो दिन भी आ गया। साल 1948 में दोनों परिवारों ने प्रीतम और भगवंत सिंह की शादी करवा दी।

भगवंत जो दस्तावेज़ अपने साथ लाए थे उसने उनके भविष्य की नई कहानी लिखी। दस्तावेज़ों की बदौलत ही उन्हें एक कोर्ट में नौकरी मिल गई थी। दोनों ने शादी के बाद लुधियाना में एक छोटा सा आशियाना बनाया और अपने नए जिंदगी की शुरुआत की।

प्रीतम की जैकट और भगवंत सिंह का ये ब्रीफकेस अमृतसर के म्यूज़ियम में रखा गया है

भगवंत और प्रीतम आज इस दुनिया में नहीं हैं…लेकिन भरोसा है कि वह अब भी जहां होंगे साथ होंगे। उनकी कहानी हमेशा लोगों के बीच रहेगी क्योंकि जो हुआ था वो करिश्मा ही था।  पिछले साल अमृतसर में एक म्यूज़ियम खोला गया है। उसमें बंटवारे से जुड़ी यादों को सहेज कर रखा गया है। इस म्यूज़ियम में ही प्रीतम की जैकट और भगवंत का सूटकेस रखा गया है। ये दोनों चीज़ें हौसले के साथ ही प्यार की इस अनोखी कहानी को भी बयां कर रहे हैं।

Leave a Reply