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यूपी लोकसभा उपचुनाव में ऐसा क्या है जो मीडिया ने अब तक आपको बताया नहीं?

उत्तर प्रदेश और बिहार में हुए उप चुनाव का नतीजा आ गया है। एक सीट को छोड़ कर भाजपा की हर जगह हार हुई है। यूपी की दो सबसे बड़ी सीटों पर तो भाजपा का खाता तक नहीं खुला। भाजपा अपने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की लोकसभी सीट नहीं बचा सकी, जिसके चलते गोरखपुर में 29 साल भाजपा का किला ढह गया। क्या इस चुनाव में यही सबसे बड़ा पहलु था या इसके अलावा भी कुछ ऐसा है, जो आपको नहीं बताया गया। जरा सोचिए कि मीडिया ने आपको इस उपचुनाव को लेकर अभी तक क्या बताया है? ‘ये हार योगी और शाह की हार है, इस हार के बाद 2019 के लिए एक नया रास्ता खुल गया है, यूपी की जनता राज्य सरकार के खिलाफ है’।

क्या आपको नहीं लग रहा कि कुछ छूट रहा है, जिसे मीडिया ने आपको नहीं बताया। तो चलिए इस उपचुनाव के नतीजों को लेकर हम आपको कुछ ऐसे पहलु बता रहे हैं, जो मीडिया ने आपको अभी तक बताया ही नहीं है।

क्या उपचुनाव का नतीजा अधूरा है?

गोरखपुर और फूलपुर के चुनावों को राज्य के माहौल से जोड़ कर देखा जा रहा है, लेकिन सवाल ये है कि क्या सच में ये चुनाव राज्य के माहोल को बताते हैं। ऐसा इसलिए,

  1. फूलपुर में इस बार 37.4 फीसदी मतदान हुआ। जबकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां 50.2 फीसदी मतदान हुआ था। यानी 12.8 फीसदी मतदान कम हुआ, ये आंकड़ा किसी भी सीट के लिए बहुत मायने रखता है।

  2. गोरखपुर में इस बार( 11 मार्च) 47.75 फीसदी मतदान हुआ। जबकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां 54.64 फीसदी मतदान हुआ था। यानी 6.89 फीसदी मतदान कम हुआ।

इन आंकड़ों को देखा जाए तो दोनों ही सीटों पर पिछली बार के मुकाबले कम मतदान हुआ। इस कम मतदान का सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को हुआ है, ऐसे में 2019 चुनाव में अगर ये मतदाता जब वापस वोट करेंगे, तब क्या तस्वीर होगी? क्या उस समय इसका फायदा भाजपा को मिलेगा या वोट सपा और बसपा के ही पाले में जाएगा ये कहना मुश्किल है।

देश में एक चुनाव

आखिरी वक्त की रणनीति ने बदल दिया समीकरण?

यूपी उपचुनाव से 10 दिन पहले तक भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा के उम्मीदवार अलग-अलग लड़ रहे थे, लेकिन फिर राज्यसभा को लेकर हुए सांठगांठ में बसपा और सपा साथ आ गई। कम मतदान होने के कारण बसपा और सपा को गठबंधन का फायदा मिला। ऐसे में अगर 2019 में ये गठबंधन होता है और उस वक्त भारी मतदान हुआ, तो क्या इस गठबंधन को फायदा होगा या भाजपा को होगा ये कहना भी मुश्किल है।

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उपचुनाव क्या भाजपा के लिए महज एक परीक्षण था?

उपचुनाव में भले ही योगी, अमित शाह और कैशव प्रसाद मौर्य की साख दाव पर लगी थी, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ये चुनाव भाजपा के लिए महज एक परीक्षण था? ऐसा इसलिए क्योंकि गोरखपुर में पिछले 29 सालों में या तो योगी आदित्यनाथ या उनके गुरू चुनाव में जीतते आ रहे थे। ये दोनों ही गोरखपीठ के महंत हैं, जिसके कारण लोगों का इनसे धार्मिक रूप से भी लगाव रहा है। इस चुनाव में बाहरी(महंत के अलावा) व्यक्ति को सीट दे कर क्या योगी और शाह लोगों का मूड भांप रहे थे। क्या धार्मिक लगाव को लेकर योगी और शाह का ये एक राजनीतिक परीक्षण था  जो कामयाब नहीं हो सका।

BJP

उपचुनाव का क्या 2019 पर पड़ेगा असर?

  1. 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पूरा यूपी भगवा रंग से रंग गया था, लेकिन इसके बाद हुए ग्राम पंचायत में भाजपा को ज्यादातर जगहों पर करारी हार मिली। इसके बाद सवाल उठने लगा कि क्या भाजपा ने ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ खो दी है? लेकिन जब 2017 विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा और भी ज्यादा ताकत से आई और राज्य के अंदर लगभग सभी पार्टियों को खत्म कर दिया।

  2. वहीं अगर गुजरात का उदाहरण लिया जाए, तो यहां भी विधानसभा चुनाव से पहले हुए ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को भारी जीत मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से आदिवासी वोट खिसक गया और भाजपा के पाले में आ गया। ऐसे में सवाल ये है कि क्या भाजपा चुनाव, उपचुनाव और बाकि दूसरे चुनाव में अलग-अलग रणनीति लेकर चलती है।

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उपचुनाव फैसला नहीं, चेतावनी है?

उपचुनाव का नतीजा जैसे-जैसे सामने आने लगा न्यूज चैनल अपनी उसी पुरानी लाइन पर वापस आ गए कि क्या 2019 के लिए एक विकल्प बन गया है, जबकि सच तो ये है कि उपचुनाव और चुनाव का ज्यादातर मामलों में कोई मेंल नहीं होता है। क्योंकि,

  1. उपचुनाव में मुद्दे अलग होते हैं।

  2. उपचुनाव को मतदाता गंभीरता से नहीं लेते, यही कारण रहता है कि मतदान प्रतिशत अक्सर उपचुनाव में कम होता है।

  3. चुनाव पार्टी के आधार पर कम, व्यक्ति के आधार पर ज्यादा होता है।

  4. उपचुनाव का असर राज्य या केंद्र सरकार के समीकरण पर बहुत कम पड़ता है, इसलिए जनता कई बार सरकार को चेतावनी देने के लिए वोट करती है।

  5. उपचुनाव जनता के फैसले के बजाए पार्टियों की जीत तक सिमटा रहता है।

क्या 2019 में होगा गठबंधन?

उपचुनाव में मायावती की पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी ने सपा को समर्थन किया था। ये गठबंधन राज्यसभा सीट को लेकर हुआ था। क्या ये गठबंधन 2019 लोकसभा चुनाव में भी होगा? क्या इस गठबंधन में कांग्रेस भी आएगी? गठबंधन किस शर्त पर होेगा? सीटों का बंटवारा कैसे होगा? ये सारे सवाल हैं जिनका अभी जवाब ढूंढना अभी बाकी है।

मोदी मैजिक है सबसे बड़ा अंतर!

यूपी उपचुनाव में योगी और कैशव प्रसाद मौर्य ने अपनी अपनी ताकत झौंक दी थी। लेकिन क्या इस चुनाव में मोदी मौजिक का न होना हार का कारण बन गया। दरअसल 2014 के बाद से हर जगह जहां भाजपा को जीत मिली है वहां नरेन्द्र मोदी ने बड़ी आक्रमक रैली की है। हाल ही में हुए त्रिपुरा चुनाव में भी नरेन्द्र मोदी ने रैली की थी, जिसके कारण भाजपा ने वामपंथ का किला ढहा दिया था। क्या इस चुनाव में चुनाव मोदी मैजिक या मोदी लहर को भी पार्टी की तरफ से जांचा गया था, जिसका नतीजा पार्टी के खिलाफ गया।

2019 मतलब मोदी?

यूपी उपसभा चुनाव योगी और कैशव प्रसाद मौर्य की साख की लड़ाई थी, जबकि 2019 मोदी की साख की लड़ाई होगी। ध्यान देने वाली बात ये है कि अबतक भाजपा मोदी के नाम पर जीतते आई है। ऐसे में मीडिया की जल्दबाजी 2019 को लेकर गलत तस्वीर पेश कर रही है, जहां नतीजे कुछ भी हो सकते हैं।

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