गुजरात राज्यसभा चुनाव: सही, गलत, सच और झूठ के बीच पहली बार लड़ती दिखी कांग्रेस

गुजरात राज्यसभा चुनाव: सही, गलत, सच और झूठ के बीच पहली बार लड़ती दिखी कांग्रेस

महाभारत की लड़ाई में अभिमन्यु को छल से मार देने के बाद युद्ध के सारे नियम खत्म हो चुके थे। जंग में सिर्फ एक नियम ही बचा था और वो था हर हालत में युद्ध को जीतना। ऐसा ही कुछ गुजरात के राज्यसभा चुनाव में भी हुआ। सारे नियम, कानून और उसूल ताक पर रख दिए गए…

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भारतीय राजनीति में तेजी से खत्म हो रही कांग्रेस के लिए गुजरात का राज्यसभा चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन चुका था। चुनाव कई और राज्यों में भी थे लेकिन गुजरात में दांव पर थी अहमद पटेल की साख। अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार और रणनीतिकार के रूप में भी जाने जाते रहे। सबसे बड़ी बात तो ये की अमित शाह के जेल में जाने के पीछे अहमद पटेल का ही हाथ माना गया था। ऐसे में वो अमित शाह जो हर सीट पर जीत के लिए दाव लगा रहे हों वो इस सीट पर कैसे पीछे रह सकते थे?

जीत तय मान कर चल रही कांग्रेस को लगा झटका

दरअसल गुजरात में 3 सीटों पर चुनाव होने थे। 3 में से 1 सीट पर जीत को तय मान कर चल रही कांग्रेस की नींद तब उड़ गई जब कांग्रेस के बड़े नेता शंकरसिंह वाघेला ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इस घटना को 48 घंटे भी नहीं हुए थे कि 6 विधायकों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इस घटना से सकते में आई कांग्रेस को ये समझने में देर नहीं लगी कि इस्तीफा यूं ही नहींं बल्कि पार्टी को तोड़ने की कवायद है, जो अमित शाह की तरफ से की जा रही है।

बीजेपी पर विधायकों की खरीद का लगा आरोप

कांग्रेस की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के बीजेपी पर विधायकों के खरीद फरोख्त का आरोप लगाया गया। कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि बीजेपी विधायकों को कांग्रेस छोड़ने के लिए 10-15 करोड़ रुपये तक दे रही है। लेकिन इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी में हड़कंप जारी था। विधायक तेजी से पार्टी से अलग हो रहे थे और जो थे उनपर विश्वास कम हो रहा था।

उत्तराखंड की तर्ज पर गुजरात में लिया गया एक्शन

कांग्रेस ने अपने विधायकों को उत्तराखंड की तर्ज पर नजरबंद करने का फैसला लिया। उत्तराखंड में विधायकों को कांग्रेस ने राज्य के अंदर ही नजरबंद किया था लेकिन इसबार कांग्रेस ने हालात को देखते हुए अपने विधायकों को राज्य के बाहर बेंगलुरू के एक रिजॉर्ट में नजरबंद किया।

जब उसूल और आर्दश की बलि चढ़ गई

गुजरात का राज्यसभा चुनाव इसलिए भी जाना जाएगा क्योंकि यहां सारे नियमों और उसूलों को ताक पर रख दिया गया। बीजेपी की ओर से कांग्रेस को तोड़ने की हर संभव कोशिश की गई। बेंगलुरू में कांग्रेस विधायकों का जिम्मा संभाल रहे मंत्री पर आयकर विभाग की ओर से छापे मारे गए( बीजेपी ने इन छापों में केंद्र की किसी भी भूमिका को नकार दिया था)। वही कांग्रेस की तरफ से सभी नेताओं को बेंगलुरू में भेज दिया गया वो भी तब जब गुजरात बाढ़ की मार झेल रहा था। यहां कि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को खोज रही थी लेकिन कांग्रेस के विधायक तो अहमद पटेल को जिताने में लगे हुए थे।

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कहां हुई बीजेपी से गलती?

चुनाव के दिन जब विधायक वोट कर रहे थे उसी दौरान अमित शाह बाहर रणनीति बना रहे थे। हर 30 मिनट में समीकरण बदल रहे थे और चुनाव खत्म होते-होते ये बात सामने आने लगी कि अमहद पटेल अपनी सीट नहीं बचा पाए। लेकिन इसी बीच वो गलती हो गई जिसका बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा। कांग्रेस की तरफ से 2 क्रॉस वोटिंग हुई। कांग्रेस ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। दलील दी गई कि इन दो विधायकों ने अपने वोट की नुमाइश की, जो कि आर्टिकल 324 के खिलाफ है। दरअसल आर्टिकल 324 के तहत अगर वोटर अपना वोट पार्टी के एजेंट के अलावा किसी और को बताता है तो वो रद्द हो जाएगा। चुनाव आयोग ने इसी पर कार्रवाई करते हुए कांग्रेस के 2 विधायक भोला भाई गोहिल और राघव भाई पटेल का वोट रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाना शुुरू कर दिया और अहमद पटेल विजयी हो गए।

JDU के एकलौते विधायक ने अहमद पटेल को दिला दी जीत

दरअसल गुजरात में एकलौते JDU विधायक छोटूभाई वासवा पर सबकी निगाहें टिकीं हुई थीं। लेकिन वासवा ने किसी को भी भनक नहीं लगने दी। यहां तक कि JDU के चीफ जनरल सेक्रेटरी केसी त्यागी तो वासवा के BJP को वोट दिने की बात कर रहे थे। लेकिन वासवा ने अहमद पटेल को वोट किया। वासवा का ये फैसला बीजेपी के लिए ताबूत में आखिरी कील गाड़ने जैसा हो गया। ये वही एक वोट साबित हुआ जिसने हार जीत तय कर दी। वासवा ने बाद में कहा कि पार्टी की तरफ से उन्हें कोई निर्देश नहीं दिया गया लेकिन JDU की नाराजगी और वासवा पर कार्रवाई सारी कहानी खुद ही कह रही है….

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गुजरात का चुनाव एक ऐसा चुनाव था जहां अमित शाह और बीजेपी ने सारी ताकत झोंक दी। ये लड़ाई महाभारत की तरह ही थी। जहां 2014 के बाद पहली बार कांग्रेस लड़ते दिखी। कांग्रेस ने ये लड़ाई अपनी सरकार बचाने के लिए उत्तराखंड में भी लड़ी थी। लेकिन गुजरात का चुनाव सबसे अलग रहा। देखना अब ये है कि साख की लड़ाई जीतने के बाद क्या कांग्रेस यही जज्बा गुजरात विधानसभा चुनाव में दिखा पाएगी। या फिर अमित शाह उत्तराखंड की तर्ज पर कांग्रेस को गुजरात में साफ कर देंगे…..

 

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