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छठ महापर्व की इन 7 खूबियों को सुनकर अब आप भी गर्व से कहेंगे- “मैं बिहारी हूं”

छठ एक ऐसा त्यौहार.. जहां बिहार का हर आदमी गर्व से कहता है कि वो ‘बिहारी’ है। इस पर्व के भक्त तो हैं ही साथ ही इसके फैन भी हैं, बिल्कुल वैसे जैसे दक्षिण भारत में रजनीकांत के हैं। आखिर ऐसा क्या है इस त्यौहार में जो इसे बाकी त्योहारों से इसे अलग बनाता हैं, रंगीन बनाता है और जिसके बिना बिहार की कल्पना करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है?

डूबते सूरज की होती है पूजा

एक कहावत है कि उगते सूरज को हर कोई सलाम करता है लेकिन डूबते सूरज को कोई नहीं। छठ दुनिया के उन चुनिंदा त्योहारों में से एक है जहां डूबते सूरज की पूजा की जाती है। जो ये सीख देती है हर चीज़ में कोई न कोई अच्छाई होती है जिसकी हमें कद्र करनी चाहिए।

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ECO FRIENDLY और NATURE FRIENDLY है छठ

छठ दुनिया के उन त्यौहारों में से एक है जिसे आप ECO FRIENDLY कह सकते हैं। ये एक ऐसा त्यौहार है जो लोगों को कुदरत से जोड़ता है। यही कारण है कि छठ में सूरज और जल दोनों की पूजा की जाती है। बिना पानी के ये त्योहार तो हो ही नहीं सकता। इस पर्व में महिलाएं नदी, ताल या समुद्र के पास पानी में खड़े हो कर सूर्य की पूजा करती हैं।

कठिन तपस्या का त्योहार है छठ

छठ पर्व 4 दिन का होता है जिसके लिए साधना, तप और बलिदान की जरुरत होती है। साधना मन की, तपस्या तन की और बलिदान अहं का। ये एक ऐसा पर्व है जहां एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी की मदद करता है। एक आदमी दूसरे आदमी की मदद करता है। जहां ठंड के दिनों में बिना गर्म पानी के नहाना मुश्किल हो जाता है, वहां महिलाएं 2 दिन शाम और भोर में घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य की आराधना करती है। ये तप नहीं है तो क्या है?

पर्व का क्या है सामाजिक असर?

अगर आप छठ के दौरान कभी किसी भी घाट पर गए होंगे तो आपने देखा होगा कि लोग प्रसाद के लिए एक दूसरे के पास जाते हैं और अपनी झोली फैलाते हैं। यहां मांगने वाले को न कोई शर्म आती है और न देने वाले को कोई घमंड होता है। सीधी भाषा में कहें तो यहां मांगने वाला प्यार मांगता है और देने वाला प्यार बांटता है। समाज में समानता का ऐसा बेहतरीन उदाहरण आपको और कहां देखने को मिलेगा? अगर आपने ये नज़ारा नहीं देखा तो इस त्योहार आप भी किसी घाट पर जाइए, शायद आपके भी पास आकर कोई प्रसाद मांगने लगे..

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मिट जाती हैं दूरियां

छठ की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि इसमे न कोई बड़ा होता है और न कोई छोटा। यहां एक IAS OFFICER और एक रिक्शे वाला दोनों गर्व के साथ अपने सर पर गमछा बांधे दौरी उठाते हैं। यहां एक व्यापारी और एक मजदूर की पत्नी दोनों ही पानी में एक बराबर खड़ी होकर पूजा करती हैं। यहां जो घाट पर पहले आकर अपनी ज़मीन खींच लेता है उतना हिस्सा उसका हो जाता है। उसे न कोई वहां से भगा सकता है और न ही उससे कोई छीन सकता है। घाट पर कोई भी अजनबी नहीं होता। यहां तो हर कोई छठ मईया का भक्त होता है। यहां न कोई भेदभाव होता है और न ही कोई कड़वाहट। यहां तो एक गरीब के पास आकर अमीर भी अपनी झोली प्रसाद के लिए फैला देता है।

कला का पर्व है छठ

छठ त्यौहार में कला का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। पानी में खड़ी आनंद गीत गाती महिलाओं को सुनना एक ऐसा अनुभव है जो विदेशी पर्यटकों को भी घाटों पर खीच लाता है। फूहड़ता की दौड़ से अगल छठ के दौरान आपको भोजपूरी संगीत की मिठास सुनने को मिलेगी। पर्व के दौरान हर कलाकार चाहे वो बड़ा हो या छोटा छठ के लिए गीत जरूर गाना चाहता है। 4 दिनों तक महिलाओं के गाए जाने वाले गीत सालों तक याद रहते हैं। ये बिल्कुल वैसा ही होता है जैसा कि राजस्थान में शाम को महिलाओं का एक समूह आनंद गीत गाता है। ये सूफी संगीत का बेहतरीन उदाहरण है।

राजनीति पर क्या है छठ का असर?

छठ एक ऐसा त्योहार है जो पटना से लेकर मुंबई तक की राजनीति को प्रभावित करता है। बिहार या बिहार के लोगों में चुनाव के दौरान कोई भी नेता छठ का ज़िक्र किए बगैर जा ही नहीं सकता। यही कारण है कि इस त्योहार पर आपको घाटों पर विधायकों, सांसदों और मुख्यमंत्री तक के पोस्टर लटके दिखाई दे जाएंगे। मुंबई में एक समय ऐसा भी था जब राज ठाकरे की बिहारियों को शहर से बाहर निकालने की मांग पर जमकर गंडागर्दी की गई थी। गरीब बिहारियों को मारा गया लेकिन जब बात छठ की आई तो मुंबई में किसी की हिम्मत नहीं थी कि इस पर्व को मुंबई में करने से रोक सके।

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तो आप भी मनाइए छठ

छठ अब सिर्फ किसी राज्य के पर्व तक ही सीमित नहीं है, ये देश के अन्य राज्यों में भी मनाया जाने लगा है। विदेशों में तो नदी की जगह Swimming pool का भी इस्तेमाल होता है या फिर बाथिंग टब का। छठ दुनिया में ऐसे फैल रहा है जैसे बाल्टी भर पानी में मुठ्ठी रंग फैल जाता है। अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो पूरी दुनिया को बिहार से जोड़ने वाली धड़कन है छठ…

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