1947 बंटवारा: विभाजन का जख्म जो सिनेमा के सीने पर लगा 

1947 बंटवारा: विभाजन का जख्म जो सिनेमा के सीने पर लगा 

भारत की आजादी और बंटवारे के बारे में तो बहुत लिखा गया। लोगों का एक ठिकाने से दूसरे ठिकानों की तलाश में भटकना और एक बार फिर से नई जिंदगी शुुरू करने की जद्दोजहत करना। लेकिन इन्हीं लोगों में कुछ ऐसे भी थे जो फिल्मी दुनिया के सितारे थे। उन्हें भी फैसला करना था कि अब उन्हें पाकिस्तान जाना है या फिर हिन्दुस्तान में ही रहना है ।

साल 1947 हिन्दी सिनेमा के लिए एक अहम साल माना जाता है। इस साल कई बड़े सितारे पहली बार पर्दे पर उतरे थे। पहली बार राजकपूर और मधुबाला नीलकमल फिल्म में नज़र आने वाले थे।

ये जोड़ी चर्चा में थी। हर कोई इन्हें पर्दे पर देखकर पसंद कर रहा था। लेकिन एक जोड़ी ऐसी भी थी जिसे फिल्मों में लोगों ने पसंद तो किया लेकिन बंटवारे के बाद ये फिर कभी साथ नजर नहीं आए। ये जोड़ी थी दिलीप कुमार और नूरजहां की।

साल 1947 में दिलीप कुमार और नूरजहां की फिल्म जुगनू ने खूब वाहवाही बटोरी

साल 1947 में इन दोनों की फिल्म जुगनू रिलीज़ हुई थी। हर जुबां पर इस फिल्म का नाम था। लोग बड़ी संख्या में सिनेमा घरों में इस जोड़ी को देखने जा रहे थे। लेकिन शायद उन्हें नहीं पता था कि वह आखिरी बार इन दोनों कलाकारों को साथ देख रहे थे।

नूरजहां के सामने जब पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में रहने की बात आई तो उन्होंने साफ कह दिया ‘मैं वहीं जाऊंगी जहां मेरा जन्म हुआ है’।  नूरजहां का जन्म लाहौर के पास कौसर गांव में हुआ था। नूरजहां अपने पति शौकत हुसैन रिजवी के साथ देश छोड़कर पाकिस्तान चली गईं। इसके साथ ही हिन्दी फिल्मों में उनका सफर खत्म हो गया।

नूरजहां की तरह एक और अभिनेत्री ने भी भारत छोड़ने का फैसला किया था। स्वर्णलता एक ऐसी अभिनेत्री रहीं जिन्होंने दोनों ही तरफ पहचान बनाई थी। उन्हें हीर और रत्न फिल्मों के लिए जाना जाता है। हालांकि बड़ी संख्या ऐसे मुस्लमान सितारों की भी थी जिन्होंने भारत में रहने का फैसला किया था। वहीं पाकिस्तान से आने वाले सितारों की भी बड़ी जमात थी। इसमें प्राण, ओमप्रकाश जैसे लोगों का नाम था।

आप पढ़ रहे हैं ‘द डेमोक्रेटिक बज़र’ की साख सीरीज़ ‘1947 बंटवारा’

इस बंटवारे की वजह से भारत ने कई महत्वपूर्ण कलाकारों को भी खो दिया। स्वर्णलता और नूरजहां के अलावा इस सूची में सादत हसन मंटो, शौकत हसन रिजवी, गुलाम हैदर , ख्वाजा खुर्शीद अनवर जैसे लोगों का नाम शामिल था।

पाकिस्तान गए सितारों के लिए सफर आसान नहीं था। पाकिस्तान में सिर्फ लाहौर ही था जहां पर फिल्में बना करती थीं। ये शहर दंगों में पूरी तरह से बर्बाद हो गया था। शहर के दो स्टूडियो पंचोली आर्ट पिक्चर और शौरी पिक्चर पूरी तरह से तोड़ दिए गए थे। पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री को सबकुछ शुरू करना था। कड़ी मेहनत के बाद वहां साल 1948 में ईद के मौके पर फिल्म बनी ‘ याद’। इस फिल्म में दिलीप कुमार के भाई नासीर खान मुख्य भूमिका में थे लोगों ने इस फिल्म  को बिल्कुल पसंद नहीं किया। हिन्दी सिनेमा की वो चमक इस फिल्म से गायब थी तकनीक भी गुजरे जमाने की थी।

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बंटवारे के गम को कभी भरा नहीं जा सकता। लेकिन सिनेमा की दुनिया में जो घाव इसने दिए थे उनका असर आज तक दोनों देशों के सिनेमा पर देखने को मिलता है। बॉलीवुड आज हॉलीवुड की फिल्मों को टक्कर दे रहा है, हर हिन्दुस्तानी सितारे का नाम पाकिस्तान में मशहूर है। जबकि पाकिस्तान का सिनेमा अब भी कई परेशानियों से जूझता नज़र आता है। हालांकि ये भी सच है कि पाकिस्तान के टीवी सीरियल हमसे कई मायनों में बेहतर हैं। अगर बंटवारा नहीं हुआ होता तो आज भारतीय सिनेमा की तस्वीर अलग होती।

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