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भीमराव अंबेडकर: दलितों के मसीहा को जब एक ब्राह्मण लड़की ने दी नई जिंदगी

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का नाम आते ही दलित और कानून जैसे शब्द दिमाग में आने लगते हैं। देश के पहले कानून मंत्री भीमराव अंबेडकर को लेकर दलित राजनीति हमेशा से होती आई है, लेकिन बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि बाबा साहेब की मोहब्बत एक ब्राह्मण लड़की थी। देश का कानून बनाने वाले अंबेडकर ने कभी भी प्यार के मामले में समाज के किसी कानून को नहीं माना। दलित जाति से होते हुए भी भीमराव ने एक ऐसी महिला से प्रेम विवाह किया जो ब्राह्मण समाज से थीं। हालांकि भीमराव अंबेडकर की दो पत्नियां थी पहले का नाम रामाबाई अंबेडकर था और दूसरी का सविता अंबेडकर।

भीमराव अंबेडकर की प्रेम कहानी उस समय से शुरू होती है, जब पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दलितों के हक की लड़ाई लड़नी शुरू कर दी थी। बाबा साहेब के परिवार वालों ने बचपन में ही उनकी शादी कर दी थी, उस समय उनकी उम्र महज  14 साल थी और पत्नी रामाबाई की उम्र  9 साल। रामाबाई अंबेडकर उम्र में काफी छोटी थीं लेकिन अपने पति के हर छोटे-बड़े फैसले पर उनका साथ देती थीं। रामाबाई अंबेडकर अपने पति की इच्छाओं को पूरा करने के लिए हर छोटे बड़े बलिदान देती रहीं। हालांकि बाबा साहेब की पहली पत्नी रामाबाई अंबेडकर 29 साल की उम्र में ही उन्हें अकेला छोड़कर चली गईं। रामाबाई काफी बीमार रहा करती थी और इसी बिमारी ने उनकी जान ले ली।

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रामाबाई अंबेडकर की मौत के बाद अंबेडकर खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगे। उन्हें लगा शायद अब वह जिंदगी भर अकेले ही रह जाएंगे। भीमराव इस हादसे से इतना ज्यादा परेशान हो गए थे कि उन्हें नींद आनी बंद हो गई थी, जिसके बाद उन्होनें सोने की दवा लेनी शुरू कर दी थी। इसके चलते धीरे-धीरे अंबेडकर का स्वस्थ्य भी गिरने लगा। पहचान के एक डॉक्टर ने सलाह दी कि उनको इलाज के लिए मुंबई चले जाना चाहिए।

मुंबई पहुंचकर अंबेडकर की मुलाकात शारदा नाम की एक डॉक्टर से हुई। शारदा और भीम राव अंबेडकर रोज मिलने लगे। कहते हैं कि दोनों बहुत जल्द ही एक दूसरे के करीब आ गए। अब वो दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी नहीं थे। अंबेडकर का अकेलापन अब दूर होने लगा था। शारदा एक ब्राह्मण महिला थीं और समाज सुधार के कामों से जुड़ी थीं। इसलिए उन्हें भीमराव से मिलना अच्छा लगने लगा। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि जिससे वो प्यार करती हैं उसकी जाति क्या है।

कहते हैं कि जब अंबेडकर मुंबई छोड़कर चले गए तब भी दोनों एक दूसरे के संपर्क में रहे। भीमराव रोज शारदा को चिट्ठियां लिखा करते थे। अंबेडकर और शारदा जो चिट्ठियां एक दूसरे को लिखते थे वो कम से कम 18-19 पन्नों की होती थीं। इसी तरह की लगभग 40-50 चिट्ठियां अंबेडकर और शारदा ने एक दूसरे को लिखी थीं। इन चिट्ठियों की कुछ कॉपियां आज भी मौजूद हैं। इन चिट्ठियों से ही पता चलता है कि अंबेडकर प्यार से शारदा को सारू कहा करते थे।

साल 1948 में भीमराव ने शारदा से शादी करने का फैसला कर लिया। शादी के फौरन बाद शारदा ने अपना नाम बदलकर सविता अंबेडकर कर लिया। अब उन्हें सविताबाई कहा जाने लगा। उन दिनों समाज के ठेकेदारों के मुंह पर ये प्रेम कहानी एक ज़ोरदारा चाटा थी। लेकिन सविता अंबेडकर को उन लोगों की फिक्र ही नहीं की। सविता, भीमराव की हर छोटी बड़ी जरूरतों का ध्यान रखती थी। उन्होंने अंबेडकर की सेहत को देखते हुए एक खास डाइट चार्ट भी बनाया था। उस चार्ट के हिसाब से ही भीमराव को खाना दिया जाता था।

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शादी के बाद भीमराव का स्वास्थ्य काफी अच्छा रहने लगा था। लेकिन कुछ ही दिनों में डाइबटिज होने के कारण अंबेडकर का स्वास्थ्य फिर गिरने लगा। सविता अंबेडकर ने हर संभव कोशिश की कि वो भीमराव को कुछ भी कर के ठीक कर दें, लेकिन ऐसा हो न सका। साल 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया। साल 2003 में हाई ब्लड प्रेशर और डाइबटिज के कारण सविता अंबेडकर भी दुनिया से विदा हो गईं।

आज समाज को जब फिर से जातियों में बांटने की कोशिशें हो रहीं हैं, तो हमारे लिए ये सविता अंबेडकर और बाबा साहेब की प्रेम कहानी किसी नज़ीर से कम नहीं है। ये एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें दो अलग-अलग जातियों के लोग साथ आए और समाज को बदलने में अहम योगदान दिया।

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