17 साल बाद भुवन क्रिकेट के मैदान पर नहीं चांद पर जाएगा

17 साल बाद भुवन क्रिकेट के मैदान पर नहीं चांद पर जाएगा

आमिर खान की फिल्म लगान तो आपको याद होगी। फिल्म का किरदार भुवन भी आपको याद होगा। भुवन किस तरह से एक क्रिकेट टीम बनाता है और उसे अंग्रेज़ों की टीम के खिलाफ खड़ा कर देता है। आपको लग रहा होगा कि यहां अचानक लगान फिल्म की बात क्यों हो रही है। दरअसल भारत को उसको असली भुवन मिल गया है। जिसने जीरो से शुरुआत की और आज देश-दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां उसके साथ खड़ी हैं। ये कहानी है एक इंजीनियर की जिसने सपना देखा था चांद पर जाने का….आमतौर पर हम ऐसे सपने देखते हैं और फिर भूल जाते हैं। लेकिन हमारे इस रीयल भुवन ‘राहुल नारायण’ ने कभी भी अपने सपने को फीका नहीं पड़ने दिया।

अगले साल 2018 में ISRO दो यानों को चांद पर भेजेगा। एक है चंद्रयान 2 जो पहले मिशन चंद्रयान एक से बेहतर माना जा रहा है। दूसरी है टीम इंडस जो हमारे भुवन की टीम है।

ये सब शुरू हुआ साल 2010 में। हमारा रीयल लाइफ भुवन यानि राहुल इंजीनियरिंग पास करने के बाद आईटी सेक्टर में काम कर रहा था। एक दिन एक क्लाइंट से बात करते हुए राहुल को गूगल के एक अजीब से कॉप्टिशन के बारे में पता चला। नाम था गूगल लूनर एक्स प्राइज़.. कॉप्टिशन था चांद पर जाने का।गूगल ने लोगों से चांद पर जाने के लिए आइडियाज़ मांगे थे। जिसका आइडिया पसंद आएगा गूगल उसे मिशन के पूरे पैसे देने तैयार था।

बस फिर क्या था हमारा भुवन लग गया अपने सपनों के पीछे। लेकिन शुरू में जिसने भी राहुल की बात सुनी उसे मज़ाक में उड़ा दिया। काम पर ध्यान दो ..इस तरह की बातें सुनने को मिली लेकिन राहुल का हौसला नहीं टूटा। धीरे-धीरे कॉम्पिटशन में नामांकन की आखिरी डेट नज़दीक आ गई। कॉम्पटिशन के लिए फीस थी 50 हज़ार डॉलर। न टीम थी न आइडिया लेकिन राहुल जानते थे कि कुछ न कुछ जरूर होगा इसलिए उन्होंने बिना टीम के ही फीस भर दी। अब वह इस प्रतियोगिता का हिस्सा तो थे लेकिन अकेले थे। बहुत मुश्किल के बाद दस लोग जुड़े। लेकिन ये सभी लोग ऐसे थे जिन्हें अंतरिक्ष में जाने की तकनीक तो क्या उसकी शब्दावली तक नहीं पता थी। ऐसे में इन लोगों ने फेसबुक और ट्विटर पर पेज बनाया। लगातार कोशिश की जा रही थी कि कोई ऐसा मिले जो इस मामले का अच्छा जानकार हो हालांकि कुछ खास हासिल नहीं हुआ।

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अचानक एक दि्न राहुल को ख्याल आया कि इसरो के पूर्व  चीफ के. कस्तूरीरंगन से मदद मांगी जाए। राहुल फैसला नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें। हिचकते हुए कस्तूरीरंगन को मेल किया। कुछ ही देर में जवाब आ गया। राहुल की टीम के लिए अच्छी खबर थी। पूर्व चीफ उनसे मिलने को तैयार थे। फिर क्या था दस लोगों की टीम पहुंच गई उनके दफ्तर।

दो घंटे तक  कस्तूरीरंगन उन लोगों की बात सुनते रहे। पूरे वक्त वह कुछ नहीं बोले बस उन लोगों को देखते रहे। आखिरी में बोले इसरो के सामने प्रेजेंटेशन दो। इसके बाद कस्तूरीरंगन के कहने पर कुछ वैज्ञानिक भी इन लोगों के प्रोजेक्ट से जुड़ गए। राहुल आज भी इसरो के सामने हुई अपनी प्रेजेंटशन को याद करते हैं तो उस पर हंसते हैं लेकिन शायद ही सोचा होगा कि जो आज वह कर रहे हैं वह दुनिया के सामने एक नज़ीर बनेगा।

टीम इंडस

राहुल की टीम इंडस में अब 20 लोग हो गए थे। जैसे-जैसे कारवां बड़ा तो टीम इंडस ने बेंगलुरू में शिफ्ट होने का फैसला किया। कुछ ही समय में टीम और बड़ी हुई और कुल 100 लोग इस प्रोजेक्ट से जुड़ गए। फिर क्या था बड़ी-बड़ी कंपनियों ने भी इस प्रोजेक्ट में रूचि लेनी शुरू कर दी। अब आलम ये है कि ज़ोमैटो, टीसीएस, सैसकेन, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ गई हैं। गूगल लूनर एक्स प्राइज़ का रिजल्ट इस साल के अंत में आ जाएगा। परिणाम जो भी है इस भुवन की टीम का नाम चांद पर सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा।

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