कश्मीर

क्या नौजवानों के खून से मिलेगी कश्मीर की सियासत को आजादी?

2014 में जब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए तो एक के बाद एक कई कीर्तिमान बन रहे थे। कश्मीर की आवाम पोलिंग बुथ पर नजर आ रही थी और घाटी में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हो रही थी। अलगाववादी नेताओं की चुनाव के बहिष्कार की अपील को लोगों ने खारिज कर दिया था। कश्मीर में 65 फीसदी से ज्यादा हुई वोटिंग से 25 साल का रिकॉर्ड टूट चुका था। घाटी में पहले, दूसरे और पांचवें राउंड में लोगों ने बंपर वोटिंग की। वोटिंग का नतीजा भी आया..  सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस (NC) को भारी नुकसान हो चुका था। साथ ही NC के साथ चुनाव से कुछ समय पहले साथ आए कांग्रेस को भी। PDP पहली और भाजपा दूसरी सबसे पार्टी बनकर उभरी… लेकिन किसी के पास भी सरकार बनाने का जनादेश नहीं था… और यहीं से कश्मीर की सियासत ने करवट लेनी शुरू कर दी। विचारधाराओं का दो छोर कही जाने वाली पीडीपी और भाजपा एक दूसरे के साथ आईं और जम्मू-कश्मीर को सबका साथ सबका विकास की विचारधारा पर बनी सरकार मिली।

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लेकिन पीडीपी और भाजपा की सरकार को गिराने के लिए अब एक बार फिर से घाटी में सालों पुरानी गंदी राजनीति शुरू हो गई है। आतंकियों को शहीद बताने की कोशिश की जा रही है, पत्थरबाजों को क्रांतिकारी और ऐसा करने वाले कोई और नहीं बल्कि नेशनल कांफ्रेंस के नेता ही हैं… लेकिन सवाल ये है कि सत्ता में रही पार्टी को इस गंदी राजनीति की जरूरत क्यों पड़ी? इसको समझने के लिए 2014 से पहले हुए महबूबा मुफ्ती के चुनावी रैली को समझना जरूरी है।

कश्मीर की आवाम की आवाज बन गई थी महबूबा

घाटी में 2010 में हुए विद्रोह ने आवाम का सत्ताधारी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस से मोहभंग कर दिया था। लोगों की नाराजगी का महबूबा मुफ्ती ने 2014 लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जमकर फायदा उठाया। अपने पिता मुफ्ती सईद से अलग महबूबा मुफ्ती चुनावी रैलियों में कहीं ज्यादा आक्रमक दिखती थी। महबूबा ने रैलियों में खुलकर अफजल गुरू को शहीद का दर्जा दिया। महबूबा का सेना के जुल्मों को लेकर भाषण देना उन्हें नौजवानों के बीच हिरो बनाने जैसा था।

महबूबा ने अपनी चुनावी रैलियों में कश्मीर की आवाम से कई वादे किए  जिनमें…

  1. संविधान की धारा 370 को और मजबूत करना

  2. जेल में गिरफ्तार चरमपंथियों को रिहा करना

  3. कश्मीर में AFSPA को खत्म करना

  4. सैन्यकर्मियों को श्रीनगर में कम करना

महबूबा एक के बाद एक वादे करते जा रही थीं और नेशनल कांफ्रेंस से नाराज आवाम उनपर भरोसा। इसी का नतीजा रहा कि विधानसभा चुनाव में 22.7 वोट शेयर के साथ पीडीपी को 7 सीटों का फायदा हुआ और वो जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।

मोदी के नाम का महबूबा को मिला फायदा

कश्मीर के स्थानीय लोग बताते हैं कि घाटी में भारी मतदान का सबसे बड़ा कारण नरेन्द्र मोदी और भाजपा थी। कश्मीर की आवाम नहीं चाहती थी कि घाटी में भाजपा कम वोटिंग का फायदा उठाते हुए सरकार बना ले। स्थानीय लोगों के मुताबिक मोदी के डर में कश्मीर की आवाम ने अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार की अपील को खारिज कर दिया और जमकर वोटिंग की। लेकिन यही आवाम पीडीपी और बीजेपी के साथ आने से खुद को ठगा महसूस करने लगी।

गठबंधन के ऐजेंडे में कैसे पिछड़ गई महबूबा?

राजनैतिक जानकार बताते हैं कि गठबंधन की सरकार में पहला साल महबूबा मुफ्ती की अलगाववादियों और कथित चरमपंथियों को लेकर उदारवादी नीति रही। यही कारण भी था कि पीडीपी से भाजपा के रिश्तों में आई खटास को लेकर कई बातें सामने आईं। इसी खटास का फायदा फारूख अब्दुल्ला उठाना चाहते थे। फारूख ने ये बयान भी दे डाला था कि ‘भाजपा उनके लिए अछूत नहीं है’।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक फारूख के इस बयान ने महबूबा मुफ्ती की शैली में बदलाव कर दिए। महबूबा को इस बात का आभास था कि भाजपा से गठबंधन के बाद उनके वोटरों में गुस्सा है। ऐसे में महबूबा सरकार तोड़ने का जोखिम नहीं चाहती थी। इसके बाद भाजपा-पीडीपी में एक बीच का रास्ता निकाला गया।

बुरहान की मौत से बदल गई सियासत!

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक बुरहान के एनकाउंटर के बाद कश्मीर की सियासत में भाजपा हावी हो गई। दरअसल बुरहान के एनकाउंटर के बाद महबूबा की चरमपंथियों को लेकर उदारवादी छवि खत्म हो गई। वहीं भाजपा की राष्ट्रवादी छवि मजबूत हुई। बुरहान के एनकाउंटर के बाद हुई अशांति से निपटने के लिए जहां भारी बल का इस्तेमाल किया गया। वहीं केंद्र ने आतंकियों और अलगाववादियों को लेकर सख्त रणनीति अपनाई। कश्मीर में सेना को पूरी छूट दे दी गई। सेना के ऑपरेशन में 2015 से लेकर अबतक 350 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया गया तो वहीं टेरर फंडिंग मामले में गिलानी के बेटे से लेकर कई अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

ऐसे में महबूबा मुफ्ती के पास केंद्र के फैसले को समर्थन देने के अलावा कोई और चारा नहीं रहा। अगर महबूबा मुफ्ती सरकार तोड़ती भी हैं तो चुनाव होने की हालत में उन्हें भारी हार झेलनी पड़ेगी,  जिसका वो खतरा नहीं ले सकती। जबकि राष्ट्रपति शासन लगने पर भाजपा को ही फायदा होगा। पीडीपी के विधायकों पर हो रहे आए दिन हमले बताते हैं कि उसका जनाधार लोगों में कितना कम हो गया है। पीडीपी के विधायक लोगों के बीच जाने की अब हिम्मत भी नहीं कर रहे। ऐसे में अब सरकार के ऊपर भाजपा की पूरी पकड़ बन चुकी है। यही कारण है कि आतंकियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के खिलाफ राज्य और केंद्र सरकार बेहद सख्त रवैया अपना रही है।

महबूबा की कमजोरी बनी उमर अब्दुल्ला की ताकत

उमर अब्दुल्ला ने आतंकी बुरहान की मौत के बाद महबूबा के वोटबैंक को हथियाने की पूरी कोशिश की। बुरहान की मौत के बाद उमर अब्दुल्ला ने कई ट्वीट किए… जिसमें उन्होने कहा..

  1. कश्‍मीर के लिए आने वाला समय मुश्किलों भरा होगा।

  2. कश्‍मीर के असंतुष्‍ट लोगों को कल एक नया नायक मिल गया।

  3. बुरहान बंदूक उठाने वाला न तो पहला और न आखिरी व्‍यक्ति होगा

  4. श्रीनगर में मेरे घर की पास की मस्जिद से कई सालों बाद मैंने आजादी के नारे सुने।

  5. बुरहान की सोशल मीडिया के जरिए आतंकवाद से जोड़ने जो क्षमता थी वह कब्र में जाने के बाद और बढ़ गई है।

कश्मीर के कुछ स्थानीय लोग इस बात से इंकार नहीं करते कि बुरहान की मौत के बाद हुई अशांति को नेशनल कांफ्रेंस से भी बढ़ावा मिला। वही कई राजनैतिक जानकार उमर के इस बायान पर कि ‘कश्मीर में अशांति का कारण पाकिस्तान और चरमपंथी नहीं बल्कि भारत सरकार है’ हैरानी जताते हैं। उमर अब्दुल्ला के इस बयान को राजनीतिक बताते हुए उनसे सवाल करते हैं कि वो 2010 में हुए अशांति में 100 से ज्यादा लोगों की मौत पर चुप क्यों हो जाते हैं?

फारूख का पाकिस्तान यूं ही नहीं है..

मौजूदा समय में फारूख अब्दुल्ला के एक विवादित बयान ने काफी सुर्खियां बटोरी। फारूख ने अपने एक बयान में कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर भारत का कोई हक नहीं है। वहीं इससे पहले उन्होने कश्मीर में शांति के लिए पाकिस्तान से बात करने की वकालत की थी। फारूख ने तो कश्मीर विवाद पर चीन और अमेरिका के मध्यस्थता की बात तक कह दी थी। पाकिस्तान के लिए आई नरमी को कश्मीर की सियासत से ही जोड़ कर देखा जा रहा है।

नेशनल कांफ्रेंस ने पीडीपी की रणनीति को कश्मीर लोकसभा उपचुनाव में अपनाया। फारूख ने अपने रैलियों में….

  1. पत्थरबाजों की वकालत- फारूख ने अपने रैली में कहा थी कि पत्थरबाज अपने मुल्क और कश्मीर के शांति के लिए लड़ रहे हैं

  2. अलगाववादियों के खिलाफ नरम रूख अपनाया

  3. मोदी और भाजपा का अपने रैलियों में जिक्र किया

  4. बुरहान और सेना के जुल्मों को चुनावी मुद्दा बनाया

फारूख के इन प्रयासों का फायदा भी मिला, जहां कम वोटिंग का फायदा नेशनल कांग्रेस को मिला और पार्टी को इस सीट पर जीत मिली।

कश्मीर में सालों से अशांति चली आ रही है और इसके जिम्मेदार यहां के स्थानीय नेता भी माने जाते है। ऐसे में सवाल ये है कि आतंकियों, अलगाववादियों और पाकिस्तान की तरफ दारी से ही क्या कश्मीर की सत्ता मिल सकती है… जवाब जरूरी है क्योंकि इसकी कीमत कश्मीर और सेना के नौजवान अपने खून से चुका रहे हैं…

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