तो इसलिए महागठबंधन पर चुप बेठें हैं नीतीश?

तो इसलिए महागठबंधन पर चुप बेठें हैं नीतीश?

दशकों पुरानी दुश्मनी भुलाकर जब नीतीश कुमार और लालू यादव एक दूसरे का हाथ थाम रहे थे तब बिहार की राजनीति तेजी से बदल रही थी। मोदी लहर के सामने बिहार में कोई नाम दिख नहीं रहा था। दिग्गज नेताओं का राजनीतिक करियर दांव पर था और विपक्ष की पार्टियां अपनी आखरी लड़ाई लड़ रही थी। वक्त की मांग को भांपते हुए आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस पहली बार एक साथ आये और बिहार में महागठबंधन की नींव पड़ी। महागंठबंधन को अनैतिक बताया गया। इसके पीछे दलील दी गई की जिन लोहिया ने कांग्रेस के खिलाफ तमाम परेशानियां झेली उन्हीं के शिष्य नीतीश और लालू ने सत्ता के लिए कांग्रेस का दामन थाम लिया। ये गठबंधन विचारधाराओं के हिसाब से भले ही अनैतिक हो लेकिन वजूद की जंग लड़ी रही पार्टियों के लिए ये एक मात्र रास्ता था।

बिहार में महागठबंधन की उम्र कितनी है?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी से करारी शिकस्त झेल कर बिहार में उतरी बीजेपी को तगड़ा झटका लगा। बिहार चुनाव में पार्टी 91 से 53 सीटों पर सिमट गई। झटका सिर्फ बीजेपी के लिए ही था ऐसा नही… चुनाव में लालू की पार्टी का नीतीश की तुलना में 9 सीटें ज्यादा पाना ये नीतीश के लिए भी मुश्किल की घड़ी थी। दरअसल महागठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा लालू को मिला जहां पिछले चुनाव की तुलना में पार्टी ने 22 से 80 सीटों की उछाल मारी। कांग्रेस को भी जबरदस्त बढ़त मिली और पार्टी शून्य से 27 पर आ गई। इन सब के बीच अगर नुकसान किसी को हुआ तो वो थी नीतीश का पार्टी  जेडीयू  जो 115 से 71 सीटों पर आ गई।

गठबंधन के मुखिया नीतीश कुमार ही बने लेकिन ताकत लालू परिवार के हाथों में आ गई। लालू के दोनों बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप राज्य के उप मुख्यमंत्री बनाए गए। नीतीश के लिए ये जीत किसी हार से कम नहीं थी। क्योंकि इसके बाद राज्य में हुए अपराध से नीतीश की साख को बहुत नुकसान था। लेकिन नीतीश कुमार के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं था।

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नीतीश की मजबूरी और महागठबंधन में सत्ता का टकराव जंग हार चुकी बीजेपी के लिए उम्मीद की किरण थी। पार्टी ने अपने हर बयान में नीतीश कुमार के लालू परिवार के सामने दबने की बात कही। नीतीश पर व्यक्तिगत हमले की बजाए उनपर दबने का आरोप लगाया गया।

2015 में महागठबंधन के समीकरण एक बार फिर पलटे जब 2017 में बीजेपी ने यूपी समेत कई राज्यों में अपनी सरकार बनाई। इसके बाद से बीजेपी ने अपनी रणनीति ही बदल दी।पार्टी की तरफ से नीतीश कुमार को रिझाने की कई कोशिशे की जिसका नीतीश कुमार की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिली। बीजेपी और नीतीश में घटती दुश्मनी ने महागठबंधन में खलबली मचानी शुरू कर दी। लेकिन लालू परिवार पर पड़े सीबीआई की रेड ने सब कुछ बदल कर रख दिया।

तेजस्वी को लेकर कमजोर पड़ गए हैं लालू!

सीबीआई की रेड ने आरजेडी की साख को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया। चारा घोटाले में फंसे लालू के लिए सबसे बड़ी तकलीफ ये थी आरोप में उनके बेटे तेजस्वी का नाम शामिल था। इन सब के बीच जहां आरजेडी सीबीआई छापे को लोकतंत्र का काला दिन बता रही थी तो वहीं नीतीश कुमार और उनकी पार्टी चुप थी और शायद यही चुप्पी लालू यादव को खल रही थी।

नीतीश का चुप रहना लालू और महागठबंधन के भविष्य पर सबसे बड़ा सवाल था। बिहार की राजनीति में उथल पुथल के बीच नीतीश कुमार चुप थे। इन सब के बाद नीतीश की पार्टी की तरफ से बयान आया जिसमें स्टेंड साफ कर दिया है कि पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोई भी समझोता नहीं करेगी।

जेडीयू के बयान के बाद आरजेडी ने भी अपनी रुख साफ कर दिया है कि तेजस्वी यादव की तरफ से इस्तीफा नहीं दिया जाएगा। और अगर तेजस्वी ने इस्तीफा दिया तो पार्टी के सभी विधायक एक साथ इस्तीफा दे देंगे लेकिन इन सब के बीच भी आरजेडी जेडीयू का बाहर से समर्थन देगी।

आरजेडी की मजबूरी दरअसल लालू की सबसे बड़ी मजबूरी है कि वो बेटे के इस्तीफे को न तो मंजूर कर सकते है और ना ही नीतीश कुमार का विरोध। 2015 में नीतीश से भी ज्यादा मजबूत हो चुके लालू आज सबसे ज्यादा कमजोर हैं। बीजेपी का नीतीश को समर्थन देने की बात के बाद लालू के पास सिर्फ एक ही चारा है कि वो नीतीश कुमार का समर्थन करें। वहीं लालू के कमजोर होने से नीतीश अब महागठबंधन के बादशाह है। ऐसे में  सत्ता के दांव में बीजेपी से अलग हुए नीतीश क्या लालू का साथ देंगे ये बहुत मुश्किल ही है। बीजेपी का समर्थन मिलने के बाद नीतीश को अब सिर्फ ये तय करना हैं सत्ता के तराजु में भार किसका ज्यादा है………

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Shridhar Mishra

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