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अंग्रेजों के खिलाफ खामोश सैनिकों की आवाज बन चुके थे मंगल पांडे…

भारत को आज़ादी मिलने की एक लंबी दास्तां है। अगर इस कहानी को देखा जाए तो पूरी कहानी में कई हीरो और कई विलेन आपको नज़र आएंगे। लेकिन मंगल पांडेय उन लोगों में से थे जिन्होंने भारतीयों को एहसास करवाया कि उन्हें अब गुलामी की जंजीरों को तोड़ना होगा।

ये उन दिनों की बात है जब भारत ब्रिटिश शासन का गुलाम था। यहां की परंपरागत शिक्षा में अंग्रेज़ी हुकुमत का दखल तेजी से बढ़ रहा था। अंग्रेज़ जो कुछ सालों पहले व्यापारी बनकर आए थे अब उन्होंने समाजिक व्यवस्था में भी दखल देना शुरू कर दिया था।

अंग्रेज़ कुछ ऐसे काम भी कर रहे थे जिनसे भारतीयों की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थीं। भारतीय सैनिकों को अंग्रेज़ों ने ऐसे हथियार दिए हुए थे जिनमें जानवरों की चर्बी थी। इतना ही नहीं इन हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए इन्हें मुंह से खोलना पड़ता था। पहले तो भारतीय सैनिक इस बात से अंजान थे लेकिन एक दिन उन्हें इस बात का पता चला।

ये बात जंगल की आग की तरह फैलने लगी। अब ये बात मंगल पांडेय के कानों तक भी पहुंच चुकी थी। मंगल पांडेय सेना के 19वीं रेजीमेंट में सिपाही के पद पर थे। उन्हें जब इस बात का पता चला तो वो आग बबुला हो गए। उन्होंने अंग्रेज़ों से भारतीयों के अपमान का बदला लेने की ठानी।

मंगल पांडेय ने अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत के लिए 29 मार्च का दिन चुना। उस दिन रविवार था। रविवार को अंग्रेज़ अफसर आराम फरमाते थे। मंगल पांडेय ने बैरकपुर के परेड ग्राउंड में ही अपने साथियों के साथ मिलकर विद्रोह छेड़ दिया।

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अंग्रेज़ी हुकुमत को विद्रोह का जब पता चला तो फौरन एक फौज परेड ग्राउंड की तरफ चल पड़ी। फौज का नेतृत्व सार्जेंट मेजर ह्युसन कर रहा था। मेजर ने फौज को आदेश दिया कि मंगल पांडेय को भून कर रख दिया जाए। लेकिन एक भी सैनिक मंगल पांडेय के खिलाफ नहीं गया। किसी भी सैनिक ने उनके उपर गोली नहीं चलाई।

मेजर परेड ग्राउंड में चिल्लाता रहा ‘फायर’ … ’फायर‘ … लेकिन किसी ने भी गोली नहीं चलाई। यहां तक की भारतीय सैनिकों ने अपने हथियार ही छोड़ दिए। आखिर वो सैनिक भी तो हिन्दुस्तानी ही थे। उनकी कई सालों की खामोशी को अब मंगल पांडेय की आवाज़ मिल चुकी थी।

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मेजर ये सब देखकर हैरान हो रहा था। वो कुछ समझ ही पाता कि मंगल पांडेय ने बिना किसी देरी के सार्जेंट मेजर पर गोली चला दी और उसे मौत के घाट उतार दिया।

सार्जेंट के मरने के बाद अंग्रेज़ों ने लेफ्टिनेंट बॉब को वहां भेजा। मंगल पांडेय के गुस्से के सामने वो भी न टिका। मंगल ने उसका भी काम तमाम कर दिया। लेकिन कुछ ही देर में अंग्रेज़ों ने मंगल पांडेय को चारों तरफ से घेर लिया। मंगल पांडेय अंग्रेज़ों के हाथों गिरफ्तार नहीं होना चाहते थे इसलिए उन्होंने खुद को गोली मारना बेहतर समझा।

पांडेय को घायल हालत में अस्पताल पहुंचाया गया, जहां कुछ ही दिनों में वो वापस ठीक हो गए। अंग्रेज़ों के लिए मंगल पांडेय का नाम ही काल बन गया था। अंग्रेज़ कुछ भी कर के उन्हें रास्ते से हटाना चाहते थे। इसलिए अंग्रेजी हुकुमत की तरफ से मंगल पांडेय पर मुकदमा चलाया गया। उन पर विद्रोह और खून का इल्ज़ाम साबित हुआ और 8 अप्रेल को परेड ग्राउंड में फांसी की सज़ा का ऐलान कर दिया गया।

फांसी के लिए अलग तख्त बनाया गया था। अंग्रेज़ चाहते थे कि मंगल पांडेय की मौत से भारतीयों के दिल में खौफ बैठ जाए। वो नहीं चाहते थे कि अब कोई विद्रोह की आवाज़ उठे। इस बात को ध्यान में रख कर भारी सुरक्षा के बीच फांसी देने का फैसला लिया गया। सुबह 5.30 बजे मंगल पांडेय को उसी मैदान में फांसी दी गई जहां से उन्होंने विद्रोह शुरू किया था।

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अंग्रेज़ों के लिए वो बड़ा दिन था। उन्हें लगा कि अब विद्रोहियों की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी गई है। लेकिन मंगल पांडेय की रेजिमेंट में उनके लिए हमदर्दी बढ़ती ही जा रही थी। सैनिकों ने सोच लिया था कि जो विद्रोह शुरू हुआ था अब वो दबेगा नहीं। अंग्रेज़ भी कहीं न कहीं इस बात को समझ गए थे। इसी डर से उन्होंने मंगल पांडेय की रेजिमेंट को ही भंग कर दिया।

रेजिमेंट तो भंग कर दी गई लेकिन आज़ादी की मांग को अंग्रेज़ दबा नहीं पाए। मंगल पांडेय जैसे लोगों की कुर्बानी ही थी कि भारतीयों को एहसास हुआ कि उन्हें ये गुलामी की जंजीरें तोड़नी चाहिए। और फिर शुरू हुई आज़ादी की एक लंबी दास्तां जिसके चलते ही हमें 1947 को आज़ादी मिली।

 

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