मोहम्मद अली जिन्ना, हिन्दुस्तान, भारत, मुस्लिम लीग, कायदे आजम

मोहम्मद अली जिन्ना ने जब एक बार पाकिस्तान में कहा था- ‘मैं आज भी हिन्दुस्तानी हूं’

पाकिस्तान बनाने की मांग जिन लोगों ने की थी उनमें मोहम्मद अली जिन्ना का नाम सबसे आगे था। हिन्दुस्तान का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बना दिया गया। जिन्ना की मर्ज़ी से पाकिस्तान तो बन गया लेकिन वो देश कभी पूरी तरह से उन्हें अपना मान ही नहीं पाया। जिन्ना कुछ ही दिनों में पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की नज़रों में चुभने लगे थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि मोहम्मद अली जिन्ना खुद कभी धर्म को आधार बनाकर राजनीति नहीं करते थे ये उनका पहला कदम था जिसकी कीमत उन्होंने खुद चुकाई थी।

जिन्ना 40 साल तक हिन्दुस्तान की आजादी के लिए लड़ते रहे। उन दिनों जिन्ना को अपने देश की मिट्टी पर गर्व था। वह खुद को मुस्लमान कहने से पहले एक हिन्दुस्तानी मानते थे। साल 1896 में जब जिन्ना लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस लौटे तो  ‘द बांबे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन’ नाम के समूह में शामिल हो गए। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और एक बड़े नेता के तौर पर सामने आए।

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राजनीति की सीख जिन्ना को गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नारौजी, फिरोजशाह मेहता से मिली थी। मोहम्मद अली जिन्ना हमेशा से राजनीति में किसी विशेष धर्म का समर्थन करने की बात का विरोध करते थे। यही कारण था कि उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। वह महात्मा गांधी के धर्म को लेकर विचारों से सहमत नहीं थे। वह राजनीति और धर्म को अलग रखना चाहते थे।

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गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर ही उन्होंने 1913 में मुस्लिम लीग में शामिल होने का फैसला किया। गोखले चाहते थे कि जिन्ना के मुस्लिम लीग में जाने से इस पार्टी के लोगों का नज़रिया बदलेगा। जिन्ना के दौर में लीग कांग्रेस के करीब भी आ गई। दोनों पार्टियों ने साथ आकर आजादी के लिए लड़ाई लड़ी।

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मोहम्मद अली जिन्ना के उन दिनों एक बहुत करीबी दोस्त थे सर तेज बहादुर सपरु। सपरू से जिन्ना अकसर कहा करते थे ‘तुम अपने तरफ के पंडितों को खत्म करो मैं मुल्लाओं को खत्म करता हूं, फिर देश में शांति रहेगी’

मोहम्मद अली जिन्ना को इस्लाम धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने कभी नमाज़ नहीं पढ़ी, उन्हें कभी मस्जिद जाते तक नहीं देखा गया। मुस्लिम नेता बनने से पहले उन्हें कभी अचकन और चूड़ीदार पजामा में शायद ही किसी ने देखा होगा। वह हमेशा पश्चिमी कपड़े पहनते थे। उन्होंने जिस महिला से शादी की वह मुस्लमान नहीं थी। मोहम्मद अली जिन्ना के दादा हिन्दू थे। बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया था।

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मोहम्मद अली जिन्ना औऱ कांग्रेस के बीच में मतभेद साल 1937 में पैदा हुए। यही वह घटना थी जिसके कारण आज पाकिस्तान एक अलग देश बना। उन दिनों प्रांतों के चुनाव हो रहे थे। लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस ने मुस्लिम लीग और जिन्ना के साथ सत्ता साझा करने से इनकार कर दिया। वही दिन था जब जिन्ना ने अपने रास्ते अलग कर लिए।

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इसके बावजूद भी जिस पाकिस्तान को जिन्ना ने बनाने का सपना था उस देश में हर अल्पसंख्यक के लिए जगह थी। सिख और पारसी सभी लोगों के लिए वह देश था। जिन्ना ने उन दिनों सिख नेताओं के साथ भी अच्छे संबंध बना लिए थे। लेकिन जब पाकिस्तान बन गया तो उसकी तस्वीर  अलग थी। जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान कुछ और ही था। जाने अनजाने कट्टर मुस्लमान समुदाय के लोग जिन्ना से नफरत करने लगे थे।

जिन्ना ने पाकिस्तान के बनने के बाद खुले शब्दों में अल्पसंख्यकों की वकालत की। लेकिन तीन दिन बाद ही वह उस देश के लिए दुश्मन बन गए। तीन दिन के बाद जिन्ना लाहौर में थे। उन्हें शाही मस्जिद में एक भाषण देना था। मुस्लमानों तक अपनी बात स्पष्टता से पहुंचानी थी। लेकिन जब वह मस्जिद में पहुंचे तो लोगों ने उन्हें सुनने तक से इनकार कर दिया। लोगों ने जिन्ना पर चिल्लाना शुरू कर दिया और फौरन मस्जिद से बाहर जाने को कह दिया।

पाकिस्तान का कायदे आजम अकेला खड़ा था। उसके देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा उसे अपना मानने से इनकार कर रहा था। इन सभी विवादों के चलते कुछ ही समय में उन्होंने मुस्लिम लीग छोड़ने का फैसला कर लिया।

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कायदे आजम होने के नाते उनके पास सेना से जुड़े सारे अधिकार थे। लेकिन फिर भी वह पाकिस्तान में हो रही हिंसा को नहीं रोक पा रहे थे। बंटवारे पर लिखने वाले लेखक जेएन साहनी लिखते हैं कि जिन्ना के एक-एक आदेश को रोक दिया गया। अल्पसंख्यकों को चुन-चुन कर मारा गया। इसमें बड़े हिन्दु नेता भी थे। कायदे आजम एक बड़ी आबादी के लिए कातिले आज़म बन गया।

साहनी लिखते हैं कि जिन्ना पाकिस्तान का बनना एक बड़ी गलती मानते थे। वह किसी भी कीमत अपनी इस गलती को सुधारना चाहते थे लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।  मुस्लिम लीग की साल 1947 दिसंबर में हुई एक बैठक में

मोहम्मद अली जिन्ना ने साफ कहा था कि मैं आज भी खुद को हिन्दुस्तानी मानता हूं। मैं उस दिन का इंतज़ार करूंगा जब मैं अपने वतन लौटूंगा और अपने देश के नागरिकों को भी वहां वापस ले जा सकूंगा। ऐसा नहीं हुआ। साल 1948 में जिन्ना ने इस दुनिया से विदा लिया। लेकिन आज भी पाकिस्तान अपने कायदे आजम के सपनों का पाकिस्तान नहीं बन पाया। अगर ऐसा हुआ होता तो तस्वीर अलग होती।

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