क्या कहती है नरेन्द्र मोदी की मस्जिद यात्रा? क्या बदल गया है हिंदू Poster Boy?

क्या कहती है मोदी की मस्जिद यात्रा? क्या बदल गया है हिंदू Poster Boy?

क्या हिंदू पोस्टर ब्वॉय नरेन्द्र मोदी अब बदल गए हैं? क्या उनकी छवि धर्मनिरपेक्ष नेता की हो गई है? मोदी का गुजरात के सीदी बशिर मस्जिद में जाना कोई रणनीति है या एक नई शुरुआत? मोदी का भारत में पहली मस्जिद यात्रा इतिहास के कई पन्नों को पलट रहा है। सवाल यही है कि… क्या कहती है नरेन्द्र मोदी की मस्जिद यात्रा? क्या बदल गया है हिंदू Poster Boy?

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एक घटना जिसने बदल दी देश की राजनीति

अक्टूबर साल 2001 में नरेन्द्र मोदी गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री बनें लेकिन उनकी राजनीति में मोड़ साल 2002 में आया। 27 फरवरी 2002 में हुए गोधरा कांड के बाद पूरे गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। हिंसा में 1200 लोग से अधिक लोग मारे गए, इनमे से ज्यादातर अल्पसंख्यक थे। गुजरात अब बदल चुका था। मानवाधिकार आयोग से लेकर मीडिया में सिर्फ गुजरात की ही चर्चा थी। किसी का नाम सबकी जुबां पे था तो वो नरेन्द्र दामोदर दास मोदी। इस घटना के बाद से नरेन्द्र मोदी को लेकर देश में 2 धड़ा बंट गया। एक उन्हें खूनी मानता था और दूसरा मसीहा। नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगते रहे कि उन्होने मुख्यमंत्री रहते हुए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। कहा ये भी गया कि उनकी खामोशी ही दंगे का असल कारण थी। 2002 से लेकर 2014 देश के मीडिया चैनलों पर मोदी को लेकर एक ही बहस चलती रही वो थी क्या मोदी दंगों के दोषी हैं या विकास का दूसरा नाम…..

गुजरात में आज भी मोदी की लोकप्रियता किसी जुनून से कम नहीं

‘मौत का सौदागर’ से लेकर ‘इशरत जहां’ तक

अटल बिहारी वाजपेयी का ‘राजधर्म निभाने’ का पाठ हो या सोनिया गांधी का ‘मौत का सौदागर’ कहना, नरेन्द्र मोदी की शख्सियत और ताकत समय के साथ और बढ़ती गई। इशरत जहां एनकाउंटर के बाद मोदी विरोधी गुजरात को मुस्लिमों के लिए जहन्नुम बताने लगे। कांग्रेस की केंद्र सरकार ने एनकाउंटर को फर्जी बताया तो वहीं भाजपा के नेताओं ने इसे मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी। लेकिन इन सबके के बीच मोदी हमेशा गुजरात की बात करते रहे। अपनी बातों में वो हमेशा 6 करोड़ गुजरातियों की बात करते रहे।

आडवाणी की गलती से मोदी ने ली सीख?

जब मुस्लिम टोपी पहनने से मोदी ने मना कर दिया था

मुस्लिम विरोधी छवि के बीच मोदी ने साल 2011 में 72 घंटे का ‘सद्भावना’ व्रत(उपवास)रखा। ये उपवास राज्य में शांति और आपसी सद्भावना के लिए था। लेकिन कार्यक्रम की सुर्खियां एक विवाद ने बटोरी। दरअसल कार्यक्रम में पहुंचे मौलाना हजरत सुफी इमाम शाही सईद मेहंदी हुसैन ने जब स्टेज पर नरेन्द्र मोदी को मुस्लिम टोपी पहनाना चाहा तो मोदी ने उन्हें रोक दिया। इसके बजाए मोदी ने उनसे शॉल पहनाने को कहा। इस घटना को इमाम ने इस्लाम का अपमान बताया। ये बात अलग है कि भाजपा की तरफ से कहा गया कि मोदी धार्मिक राजनीति के खिलाफ है जिस कारण उन्होने मना कर दिया।

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राजनीतिक जानकार बताते हैं कि मोदी ऐसी कोई गलती नहीं करना चाहते थें जैसी लाल कृष्णआडवाणी ने पाकिस्तान में की। दरअसल साल 2005 में आडवाणी पाकिस्तान गए थे। अपने 7 दिन के कार्यक्रम के दौरान वो मोहम्मद अली जिन्ना के मजार पर भी गए। आडवाणी ने जिन्ना को श्रद्धांजलि देने के बाद उन्हें धर्मनिरपेक्ष बता दिया। जानकार बताते हैं कि यहीं से आडवाणी के भाजपा में राजनीतिक पतन की शुरुआत हुई। शायद इस बात को मोदी भी अच्छी तरह से जानते थे जिसके कारण उन्होने टोपी पहनने से मना कर दिया।

शेख़ ज़ायद मस्जिद में मोदी

मस्जिद और मज़ारों पर भी गए मोदी

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि भारत का खाड़ी देशों से कैसा रिश्ता होगा। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने तमाम अटकलों को दूर करते हुए खाड़ी देशों से भारत के रिश्तों को और मजबूत किया।

  • साल 2015 में सऊदी अरब की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द किंगअब्दुल्लाजीज साश’ से नवाजा गया। संयुक्त अरब अमीरात के किंग अब्दुल अजीज शाह उन्हें ये सम्मान दिया।

  • साल 2016 में अबु धाबी के शेख़ ज़ायद मस्जिद में मोदी गए। इस दौरान शेख के साथ ली उनकी सेल्फी काफी मशहूर हुई।

  • साल 2017 में म्यांमार दोरे के दौरान मोदी बहादुर शाह जफर के मजार पर भी गए। मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके योगदान का भी जिक्र किया।

सऊदी अरब ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मोदी को नवाजा था

जिन आडवाणी का राजनीतिक पतन एक बयान से हो गया वहां प्रधानमंत्री मोदी के इन फैसलों के बावजूद भी एक सवाल क्यों नहीं उठे?

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राजनीतिक जानकार बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अपने हर फैसले को रणनीति के तहत लेते हैं। उन फैसलों का अपना एक तर्क होता जिससे सरकार संघ और लोगों को संतुष्ट करती है। साऊदी अरब में मिले सर्वोच्च सम्मान को जहां भाजपा ने देश के गौरव से जोड़ा वहीं आबु धाबी में मस्जिद यात्रा को शेख द्वारा मंदिर बनवाने के ऐलान से कूटनीतिक जीत बताई।

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मुगलों के खिलाफ संघ और भाजपा का खुला विरोध किसी से छुपा नहीं है। राजस्थान में जहां मुगलों के इतिहास को बदला गया वहीं महाराष्ट्र में किताबों से मुगलों के इतिहास को गायब कर दिया गया। ऐसे में मुगलों के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर को पीएम मोदी द्वारा श्रद्धांजलि देना भी एक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। मुगलों के इतिहास को अलग तरह से पेश करने की ये एक नई रणनीति हो सकती है और इसका सही उदाहरण सरदार वल्लभ भाई पटेल हैं जिन्हें भाजपा कांग्रेस गुटबाजी के खिलाफ एक सख्त नेता की तरह पेश करती है।

मोदी की मस्जिदयात्रा के क्या है मायने

भारत में मोदी की मस्जिद यात्रा क्यों है अलग?

सवाल पर वापस आते हैं कि क्या गुजरात में मोदी की मस्जिद यात्रा राजनीतिक रणनीति तो नहीं, तो हां ये संभव है। प्रधानमंत्री मोदी का ये कदम न सिर्फ गुजरात चुनाव को लेकर हो सकता है बल्कि ये 2019 की तैयारी भी हो सकती है। बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी का जनाधार मुस्लिमों में भी काफी बढ़ा था। यूपी चुनावों में भी मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग ने भाजपा को खुल कर वोट किया। एक अनुमान के तहत लोकसभा चुनावों में भाजपा को 5 से 6 फीसदी मुस्लिम वोट मिलता रहा है। इसी जनाधार को अब मोदी सरकार बढ़ाने में लगी है। भाजपा हिदुत्व की राजनीति के साथ मुस्लिमों के खास वर्ग को भी साथ लेकर चल रही है। भाजपा के इस रणनीति को लगातार कमजोर हो रहे विपक्ष से और मजबूती मिल रही है।

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ऐसे में कश्मीर में कट्टरपंथियों पर सख्ती और इजरायल यात्रा पर जा कर जहां एक तरफ मोदी सरकार अपने एजेंडे को बढ़ा रही है वहीं मस्जिद यात्रा और तीन तलाक जैसे मुद्दे पर वो मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग को लुभा भी रही है। ऐसे में ये रणनीति 2019 में कितनी कारगर साबित होगी ये तो समय बताएगा…लेकिन इतना जरूर है कि देश का प्रधानमंत्री हर धार्मिक स्थान पर जाएं तो इससे देश का माहौल और अच्छा ही होता है….

Haripriya Mishra

Haripriya Mishra

I Believe We All Can Find God But It Is Up to The Questions We Ask. God Himself Answers The Toughest Of The Questions.

An Atheist By Profession And A Believer By Heart.

Writer| Journalist| Engineer|
Haripriya Mishra

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