चुनाव आयोग

क्या चुनाव आयोग नरेन्द्र मोदी के इशारे पर काम कर रहा है?

क्या चुनाव आयोग नरेन्द्र मोदी के इशारे पर काम कर रहा है? ये सवाल हम नहीं बल्कि कांग्रेस उठा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए गुजरात में चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं कर रही। दरअसल इस साल के अंत में 2 राज्यों में चुनाव होने वाले हैं हिमाचल और गुजरात। चुनाव आयोग ने हिमाचल में होने वाली चुनाव की तारीखों का ऐलान तो कर दिया लेकिन गुजरात बाकी रह गया। इसी को लेकर राहुल गांधी, पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री गुजरात में जब सारी घोषणाएं कर देंगे तब तारीखों का ऐलान होगा?

कांग्रेस के इन आरोपों में मीडिया के कुछ चैनल भी शामिल हो गए हैं। इन मीडिया ग्रुप का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति प्रधानमंत्री मोदी के करीबियों में से एक है और शायद यहीं वजह है कि चुनाव आयोग की तरफ से भाजपा को छूट मिल रही है। ये बात अलग है कि ये आरोप सिर्फ कयासो तक ही सीमित है। ऐसे में फिर से वही सवाल कि क्या चुनाव आयोग प्रधानमंत्री मोदी के लिए काम कर रहा है? इस सवाल के जवाब के लिए हम आपको अगस्त महीने में ले चलते हैं….

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जब एक फैसले ने बदल दिया चुनाव का फैसला

दरअसल 8 अगस्त को गुजरात में राज्यसभा के चुनाव हो रहे थे। 3 सीटों पर हो रहे चुनाव में 2 पर भाजपा की जीत तय हो चुकी थी, मुकाबला एक के लिए जारी था। अमित शाह बाहर रणनीति बना रहे थे। हर 30 मिनट में समीकरण तेजी से बदल रहे थे। ऐसे में चुनाव खत्म होते-होते ये बात सामने आने लगी कि अमहद पटेल अपनी सीट नहीं बचा पाए। कांग्रेस की तरफ से 2 क्रॉस वोटिंग हो चुकी थी। भाजपा में जश्न मनाए जाने लगा कि तभी कांग्रेस ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करा दी।

इसके बाद सभी निगाहें चुनाव आयोग पर जा टिकीं। कांग्रेस ने अपनी शिकायत में कहा कि दो विधायकों ने अपने वोट की नुमाइश की, जो कि आर्टिकल 324 के खिलाफ है। दरअसल आर्टिकल 324 के तहत अगर वोटर अपना वोट पार्टी के एजेंट के अलावा किसी और को बताता है तो वो रद्द हो माना जाता है।

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आयोग की तरफ से भाजपा और कांग्रेस दोनों की दलील सुनी गई और वोटिंग की CCTV की फुटेज भी देखी गई। इस दौरान कई जगह दोबारा वोटिंग के कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन चुनाव आयोग ने कार्रवाई करते हुए कांग्रेस के 2 विधायक भोला भाई गोहिल और राघव भाई पटेल का वोट रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाना शुुरू कर दिया और अहमद पटेल विजयी हो गए। ये वो समय था जब कांग्रेस ने इस फैसले को ऐतिहासिक और लोकतंत्र की जीत बताया था। लेकिन कांग्रेस आज ये भूल गई है कि उस समय भी चुनाव आयोग के अध्यक्ष अचल कुमार ज्योति ही थे जिन्होने बिना झुके कड़ा फैसला सुनाया था। उस समय भी मोदी अचल कुमार ज्योति के करीबियों में से एक थे।

तारीखों के ऐलान पर क्या कहा चुनाव आयोग ने?

चुनाव आयोग ने गुजरात में हो रही देरी का कारण बाढ़ को बताया। आयोग की तरफ से कहा गया कि अगर चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया जाता तो बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत कार्य पर असर पड़ता। बयान में आगे बताया गया कि चुनाव का ऐलान होने पर 26,000 स्टाफ बाढ़ प्रभावित जगहों पर राहत कार्य छोड़कर चुनाव के कामों में लग जाता। आयोग ने आगे कहा कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में काफी हद तक काम पूरा हो चुका है और चुनाव के तारीखों का ऐलान जल्द हो जाएगा। चुनाव आयोग के बयान पर कई मीडिया ग्रुप सवाल उठा रहे हैं कि जब नगर निगम के चुनाव इन हालात में हो सकते है तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं। ऐसे में ये सवाल है कि क्या नगर निगम के चुनाव की तुलना विधानसभा चुनाव से की जा सकती है?….

क्या गंदी राजनीति का शिकार हो रहा है चुनाव आयोग?

  1. यूपी चुनाव में हार के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने EVM और चुनाव आयोग पर सवाल उठाए।

  2. गुजरात राज्यसभा चुनाव में 3 में से 1 सीट पर मिली हार के बाद भाजपा ने  चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाये।

  3. 2009 लोकसभा चुनाव में हार के बाद लाल कृष्ण आडवाणी और भाजपा ने EVM और चुनाव आयोग पर सवाल उठाए।

  4. पंजाब, गोवा और दिल्ली NDMC चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी ने EVM और चुनाव आयोग पर सवाल उठाए।

  5. कांग्रेस गुजरात चुनाव की तारीख को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है।

जब इन राजनीतिक पार्टियों का चुनाव आयोग और चुनाव की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है तो ये चुनाव में उतरती ही क्यों हैं? क्या अपनी हार को छुपाने के लिए चुनाव आयोग पर सवाल उठाना भारत की राजनीति में नया ट्रेंड बनता जा रहा है?

राजनीतिक पार्टियां ये क्यों भूल जाती हैं कि ये चुनाव आयोग की सफलता ही है जिसके कारण भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता हैं। भारत की राजनीति में कई सरकारें आईं और गईं लेकिन चुनाव आयोग वैसा ही रहा। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों से यही अपील है कि अपनी गंदी राजनीति में चुनाव आयोग को न घसीटें क्योकिं भारत में भरोसे का दूसरा नाम है चुनाव आयोग…..

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