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इमरजेंसी: 43 साल पहलेThe Indian Express ने ऐसा क्या किया था जिसे आज की मीडिया सोच भी नहीं सकती?

हम एक लोकतांत्रिक देश का हिस्सा हैं। भारत देश का संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता देता है। इसके तहत हम अपने विचार दूसरों के सामने रख सकते हैं। समाज में तेजी से बदलाव आ रहा है। ये बदलाव ही है जिसके कारण अब हम अपने विचार सोशल मीडिया या मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाते हैं। लेकिन एक दौर वह भी था जब अखबारों में क्या छपेगा और क्या नहीं ये सरकार तय करती थी। आज से 43 साल पहले भारत के इतिहास में ऐसा काला दिन दर्ज हुआ जिसको आज भी भुलाया नहीं जा सका है।

आपातकाल के दौरान अखबारों के पन्ने

भारत ने भले ही आजादी के लिए कई लड़ाईयां लड़ीं, लेकिन उन पर इतने शोषण और जुल्म शायद ही कभी हुए होंगे जो उन 21 दिनों में हुए। तारीख थी 25 जून 1975…

इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री थीं। सत्ता के खिलाफ विपक्षी दलों में खासा आक्रोश देखने को मिल रहा था। जगह-जगह आंदोलन किए जा रहे थे। इंदिरा हटाओ का जो नारा 1971 में दिया गया था अब 1975 में वह सच होता दिख रहा था। इंदिरा गांधी को खतरा साफ दिखाई दे रहा था कि अब उनकी सत्ता जाने वाली है।

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ऐसे में इंदिरा गांधी ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने न केवल उनकी सत्ता छीनी बल्कि गरीबों और लोगों की नज़रों में भी उन्हें गिरा दिया।  25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। नेताओं को जेल में ठूस दिया गया, लोगों की जबरन नसबंदी करवा दी गई।

वहीं मीडिया पर भी अंकुश लगा दिए गए। मीडिया के लिए खास तौर पर लिखित आदेश जारी किए जाने लगे कि उन्हें क्या छापना है और क्या नहीं। साफ था कि सरकार नहीं चाहती थी कि जुल्म की ये दास्तां लोगों तक पहुंचे। लेकिन कई ऐसे अखबार थे जो इतनी सख्ती के बाद भी सरकार के आगे नहीं झुके। उन्होंने अखबार छापे और विरोध भी दर्ज करवाया।

लोकतंत्र का काला दिनः आज छपे थे अखबारों में खाली पन्ने 
जब इंडियन एक्सप्रैस ने सरकार का किया था विरोध

उस दौरान The Indian Express जैसे अखबार ने खाली पन्ने छापे लेकिन वह सरकार के जुल्मों के आगे झुके नहीं। जब अखबार छापने का वक्त होता तो आधी रात को ही प्रिंटिंग हाउस की बिजली काट दी जाती थी।

जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद मीडिया को लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा स्तंभ बताया था आज उस पर ही अंकुश लगाया जा रहा था।

ये सब 21 मार्च 1977 तक चला। आपातकाल खत्म होने के बाद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी बुरी तरह से चुनाव हारे। हालांकि इंदिरा विरोधी जो दल सत्ता में आया वह बहुत समय तक एकजुट नहीं रह सका और इंदिरा की सत्ता में फिर से वापसी हुई।

जब संपादकों को संबंधित ख़बरें नहीं छापने का दिया गया था आदेश

लेकिन इस दौरान जनता ने एक बहुत बड़ा सबक सत्ता पर काबिज लोगों को सिखाया था जो शायद आज भी एक नजीर है। लोकतंत्र में ‘लोक’ शब्द इतना कमजोर नहीं है जितना इसको सत्ता के लोभ में लोग भूल जाते हैं। इसलिए आपातकाल की इन घटनाओं से आज भी  सरकार और युवाओं को सबक लेना चाहिए। जहां एक तरफ जनता को लोकतंत्र में अपनी असल ताकत को पहचानना चाहिए वहीं सत्तासीन लोगों को भी अपने विशेषाधिकारों की आड़ में कर्तव्यों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। वर्ना जिस देश की जनता नेताओं को अर्श पर बिठा सकती है वही उन्हें फर्श पर भी गिरा सकती है।

(सभी आदेश संपादक नवीन जोशी के सौजन्य से हासिल किए गए हैं)
(सभी आदेश संपादक नवीन जोशी के सौजन्य से हासिल किए गए हैं)

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