रानी पद्मावती

जब अलाउद्दीन की एक ‘शर्त’ के सामने झुक गईं रानी पद्मावती!

रानी पद्मावती में अब तक आपने पढ़ा कि दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती की परछाई देखकर ही उनका दीवाना हो जाता है। अलाउद्दीन धोखे से राजा रतन सिंह को बंधक बना लेता है और उन्हें दिल्ली की जेल में बंद कर देता है। अब आगे…..

राजा रतन सिंह के कैद होने के बाद अब पूरे राज्य की कड़ी परीक्षा होने वाली थी। खिलजी ने राजा को आजाद करने के लिए एक शर्त रखी थी। खिलजी ने कहा कि अगर चितौड़गढ़ चाहता है कि राजा रतन सिंह को आजाद कर दिया जाए तो रानी पद्मावती को उसके हवाले करना पड़ेगा।

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अलाउद्दीन ने अपना संदेशा राज्य की एक दासी से भेजवाया। अलाउद्दीन ने दासी को एक साधवी का वेष धारण करने को कहा ताकी रानी पद्मावती उसकी बातों में आसानी से आ सकें। वहीं जब रानी पद्मावती को साधवी का संदेश मिला तो वो और टूट गईं। वो कुछ भी कर के राजा को खिलजी के चंगुल से आजाद करवाना चाहती थीं। रानी महल से निकलने की तैयारी कर ही रही थी कि इस बात की जानकारी राजा रतन सिंह के दोस्तों को भी लगी। रतन सिंह के दोस्त सीधे रानी के पास पहुंचे। उन लोगों ने रानी को समझाना शुरू कर दिया। उन लोगों ने रानी से कहा कि हो सकता है कि ये साधवी अलाउद्दीन की भेजी हुई दासी हो जो आपको बहाने से लेने के लिए यहां आई हो…. लेकिन पद्मावती ने अपना फैसला बदलने से मना कर दिया…

पद्मावती ने साधवी के सामने एक शर्त रखी। रानी ने कहा कि वह खिलजी के साथ दिल्ली जाने को तैयार हैं। लेकिन इस सब से पहले वो एक बार राजा रतन सिंह से अकेली मिलना चाहती हैं। साधवी रानी का संदेश लेकर खिलजी की तरफ रवाना हो गई। खिलजी ने जब रानी पद्मावती की शर्त सुनी तो वो फौरन मान गया। खिलजी के खेमे में खुशियां मनाई जाने लगी। खिलजी की जिद्द अब हकीकत में बदलने जा रही थी।

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रानी पद्मावती अपने छोटे से काफिले के साथ महल से बाहर निकल गईं। रानी का काफिला किले के बाहर आ कर रूका। किले के दूसरी तरफ एक कालकोठरी बनी हुई थी। इसी कालकोठरी में राजा रतन सिंह को बंधक बनाकर रखा गया था। रानी पद्मावती के कदम अब उस कालकोठरी की तरफ बढ़ने लगे।

रानी पद्मावती कालकोठरी के पास पहुंची तो उनके साथ एक सेवक था। उन्होंने सेवक को कालकोठरी के बाहर खड़ा रहने का आदेश दिया और खुद राजा रत्न सिंह से बात करने चली गईं। अलाउद्दीन खिलजी कुछ ही दूरी पर खड़ा होकर ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी। वो जानता था कि कुछ ही देर में रानी पद्मावती उसकी हो जाएगी और चितौड़गढ़ भी उसके कब्जे में आ जाएगा।

उधर राजा रतन सिंह को इन सब चीज़ों पर यकीन नहीं हो रहा था। रानी पद्मावती के आने को राजा रतन सिंह अपनी हार मान रहे थे। लेकिन सामने खड़ी पद्मावती उनके लिए कुछ और ही संदेश लाई थीं। लाचारी में बैठे राजा रतन सिंह रानी की तरफ देख भी नहीं रखे थे….. कि तभी अचानक से महराज शब्द सुनते ही रतन सिंह ने सामने देखा और हैरान हो गए…. दरअसल राजा जिसे रानी पद्मावती समझ रहे थे वो एक लोहार का बच्चा था जो उन्हें आजाद कराने आया था।

रानी पद्मावती

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राजा समझ चुके थे कि ये रानी पद्मावाती की रणनीति है। राजा और वो बच्चा फौरन कालकोठरी के पीछे से भागकर छिपते छुपाते किले के अंदर पहुंच गए। कालकोठरी के बाहर अलाउद्दीन खिलजी के बेचैनी बढ़ रही थी। रानी पद्मावती काफी देर से कालकोठरी के अंदर थीं। कालकोठरी के बाहर जिस सेवक को खड़ा किया था वह भी जा चुका था। आखिर पद्मावती बाहर क्यों नहीं आ रही हैं…. हो क्या रहा है…खिलजी ये जानना चाहता था…वह गुस्से में कालकोठरी की तरफ बढ़ा और अंदर जा कर देखा। अंदर कोई भी नहीं था। खिलजी को समझ आ गया था कि उसके साथ धोखा हुआ है।

खिलजी ने राघव चेतन से रानी पद्मावती की राजनीतिक सूझबूझ के बारे में सुना था लेकिन अब वो इसे देख रहा था। अलाउद्दीन अपने गुस्से को रोक नहीं पा रहा था। उसने कसम खाई कि चाहे कुछ भी हो जाए वो रानी पद्मावती को पा कर रहेगा। खिलजी ने आखिरी जंग का ऐलान कर दिया। अलाउद्दीन की सेना चित्तोड़ पर हमले के लिए निकल पड़ी।

वहीं राजा रतन सिंह को देखकर पद्मावती खुश हो जाती हैं। राजा रतन सिंह का वापस आना चमत्कार से कम नहीं था। रतन सिंह ने रानी पद्मावती और अपने दो साथियों का धन्यवाद किया। राजा जानते थे कि उनकी खुशी ज्यादा समय के लिए नहीं है। राजा जानते थे कि अलाउद्दीन अपने अपमान का बदला जरूर लेगा। इसलिए अब चित्तोड़गढ़ में भी आखिरी जंग की तैयारी होनी शुरू हो गई। कहानी का आखिरी अंक रानी पद्मावती में शुक्रवार को…….

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