रानी पद्मावती

जौहर करने से पहले रतन सिंह से आखिरी बार क्या बोलीं रानी पद्मावती?

रानी पद्मावती में आपने अबतक पढ़ा कि गोरा और बादल राजा रतन सिंह को अलाउद्दीन के चंगुल से आजाद करा0ते हैं। अलाउद्दीन ये देखकर गुस्से में पागल हो जाता है और चित्तौड़ पर हमला करने निकल पड़ता है। अब आगे…..

मुहणोत नैणसी के प्रसिद्ध काव्य ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में गोरा और बादल के पराक्रम का वर्णन है। गोरा और बादल दोनों चाचा भतीजा थे। रानी पद्मावती ने राजा को आजाद कराने के लिए इन दो योद्धाओं को खिलजी के शिविर में भेजा था। गोरा और बादल रतन सिंह को लेकर तेजी से किले की तरफ बढ़ने लगते हैं। खिलजी की सेना भी उनका पीछा करते हुए महल की तरफ बढ़ती है।

खिलजी की सेना को आते देख गोरा बादल से कहते हैं- ‘तुम राजा को लेकर अंदर चलो…. मैं यहां इनका सामना करता हूं’

‘लेकिन चाचा सा, आप इतनी बड़ी सेना को कैसे संभालोगे?- बादल हैरानी भरी आवाज में सवाल करता है।

‘मेरे साथ देने के लिए ये सिपाही रहेंगे’- गोरा अपने साथ खड़े सिपाहियों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं।

‘हजारों की सेना का आप चुनिंदा लोग कैसे सामना करेंगे’- बादल की बेचैनी बढ़ने लगती है।

‘तुम राजा की रक्षा करो… मैं राज्य की रक्षा कर रहा हूं’

इससे पहले कि बादल कुछ कहता… गोरा ने तेज आवाज में कहा ‘ये मेरा आदेश है’

‘ तुम राजा को लेकर अंदर जाओं.. मैं भी कुछ देर में आता हूं’- ये कहते हुए गोरा के चेहरे का भाव बदल गया।

‘चाचा सा! मौत तो राजपूतों की शान है, आज्ञा दिजीए’ बादल ने गोरा को प्रणाम किया। बादल जानता था कि गोरा अब जीवित अंदर नहीं आएंगे। गोरा और बादल अपनी आखिरी मुलाकात में एक दूसरे को कस कर गले लगता हैं। बादल राजा को लेकर अंदर चला जाता है और गोरा जंग के लिए निकल पड़ते हैं। गोरा खिलजी की सेना पर कहर बनकर गिरने लगते हैं। गोरा की तलवार खिलजी की सेना में हड़कंप मचाने लगती है। गोरा सैनिकों को मारते हुए मैदान के बीचों-बीच पहुंच जाते हैं। लेकिन मेवाड़ की मुठ्ठी भर सेना कब तक युद्ध में टिकती। मेवाड़ के सैनिक एक-एक कर जंग में मरने लगे। खिलजी के सैनिकों ने गोरा को घेर लिया। गोरा पर एक साथ कई तलवारे गिरने लगी और ‘मा काली’ का नाम लेते हुए गोरा ने अपना दम तोड़ दिया।

रानी पद्मावती

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इधर बादल राजा को लेकर महल के अंदर आता है। रानी पद्मावती राजा को देखकर खुश हो जाती हैं लेकिन अगले ही पल उनकी निगाहें गोरा को खोजने लगती हैं। रानी बादल की तरफ देखती हैं और उससे गोरा के बारे में पूछने लगती हैं। बादल रानी पद्मावती को सारी कहानी बताने लगता है। 24 साल का बादल धूल से सन चुका था। लेकिन उसके चेहरे की चमक पर धूल बेअसर साबित हो रही थी। रानी बादल के पास आती है और उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहती हैं- ‘ बेटा… चित्तौड़गढ़ हमेशा तुम्हारा कर्जदार रहेगा’

शाम हो चली , रतन सिंह अकेले बैठे कर कुछ सोच रहे होते हैं, कि तभी एक सैनिक गोरा की मौत की खबर लेकर महल के अंदर आता है। राजा ये समाचार सुनकर बहुत दुखी होतें हैं। गोरा का शरीर महल में लाया जाता है। कहते है कि रानी पद्मावती को जब गोरा की मौत का पता चलता है तो वो दौड़ते हुए राजा के दरबार में पहुंचती हैं। रानी बिना बोले सिर्फ गोरा की तरफ देखती रहती हैं। गोरा का अंतिम संस्कार किया जाता है। उधर अलाउद्दीन की सेना वापस जा चुकी होती है। लेकिन तब तक चित्तौड़ को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है।

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गोरा की मौत के बाद सुरक्षा की कमान बादल ने संभाल ली थी। एक दिन बादल ने देखा कि राजा रतन सिंह काफी देर से महल के बाहर देख रहे हैं। बादल राजा के पास पहुंचा-  ‘महाराज.. क्या सोच रहे हैं आप?’- बादल ने रतन सिंह से पूछा

‘सोच रहा हूं कि चित्तौड़ का क्या होगा’

‘मैं हूं ना महाराज… आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है’ – बादल ने दम भरते हुए रतन सिंह से कहा

‘अलाउद्दीन पागल है… वो वापस बदला लेने जरूर आएगा’- राजा महल के बाहर देखते हुए बोलने लगे

‘जानते हो बादल… जब मैं कैद में था, तो मुझे इस बात कि चिंता थी कि चित्तौड़ का क्या होगा? प्रजा का क्या होगा और यहां कि रानियों का क्या होगा?’- राजा बादल की तरफ घूमे और कहने लगे- ‘कालकोठरी में मौत का डर मेरे दिल में घर कर गया था, मुझे चित्तौड़ की चिंता है’ रतन सिंह ने एक लंबी सांस भरी ‘मैं जानता हूं कि अलाउद्दीन वापस आएगा…. मैं ये भी जानता हूं कि जंग होगी… लेकिन मैं ये नहीं जानता कि हम वो जंग कैसे जितेंगे’

‘महाराज! राजपूतों की तलवार वैसे भी खिलजी के खून की प्यासी है’ बादल की बात सुनकर रतन सिंह मुस्कुराने लगे। उन्होने प्यार से बादल के सर पर हाथ फैरा और अंदर चले गए।

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रानी पद्मावती

इधर अलाउद्दीन चित्तौड़ को कब्जा करने की रणनीति बना रहा था। अलाउद्दीन की सेना चित्तौड़ की तुलना में 15 गुना ज्यादा थी। लेकिन फिर भी खिलजी की सेना किले के अंदर घुसने में नाकाम थी। किले के सातों दरवाजों पर रतन सिंह की सेना को हराना खिलजी के लिए नामुमकिन था। खिलजी की सेना कितनी भी बड़ी क्यों न थी लेकिन उन दरवाजों के पास आते ही उसे सिमटना पड़ता था। जिससे दोनों सेनाएं बराबर हो जाती थी। रतन सिंह की इस रणनीति का काट खिलजी को नहीं मिल रहा था। गुस्से में पागल खिलजी ने अपने ही मंत्रियों को जान से मारना शुरू कर दिया। खिलजी गुस्से में चिल्लाने लगता ‘मार दूंगा.. खत्म कर दूंगा… चित्तौड़ को शमशान बना दूंगा’। खिलजी की इस हरकत से उसके मंत्रियों में दहशत फैलने लगी। खिलजी की सेना में किसी के पास जवाब नहीं था सिवाय राघव चेतन के। राघव चेतन खिलजी के पास पहुंचा। उसने किले के बारे में खिलजी को बताना शुरू किया। उसने खिलजी को ये भी बताया कि वो कितनी भी ताकत लगा ले किले को नहीं भेद सकता। ये सुनकर अलाउद्दीन और गुस्से में आ गया। राघव चेतन ने खिलजी को शांत कराते हुए कहा कि चित्तौड़ के अंदर घुसना नामुमकिन है लेकिन सैनिकों को किले से बाहर निकाला जा सकता है।

राघव चेतन ने अलाउद्दीन को बताया कि अगर बगल के 4 किलों को जीत लिया जाए तो चित्तौड़गढ़ अकेला पड़ जाएगा। बाहर से कोई मदद न मिलने पर सिपाहियों का मनोबल गिरने लगेगा। किले के अंदर भूखमरी छा जाएगी और रतन सिंह को हार माननी पड़ेगी। ऐसे में रतन सिंह को हार मानकर रानी पद्मावती को खिलजी को देनी पड़ेगी। राघव की बात खिलजी को बहुत पसंद आई। उसके राघव की रणनीति को अपनी रणनीति बना लिया।

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अलाउद्दीन की सेना चित्तौड़गढ़ के बगल वाले सभी किलों पर हमला करने लगी। रतन सिंह के सभी हितोषियों को चुन-चुन कर मार दिया गया। अलाउद्दीन की हैवानियत इन जगहों पर ऐसी पड़ी की महिलाओं से लेकर बच्चों तक को मार दिया गया। किले के अंदर आग लगा दी गई। अलाउद्दीन के सेना ने चित्तौड़ को चारों तरफ से घेर लिया।

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अलाउद्दीन के इस हमले से चित्तौड़गढ़ में अफरा-तफरी मचने लगी। ऐसा नहीं कि चित्तौड़ की तरफ से हमला नहीं किया गया। राजपूतों ने खिलजी के सेना पर कई हमले किए लेकिन अनगिनत सेना के सामने सब हमले बेकार साबित हुए। राजा रतन सिंह ने एक सभा बुलाई। हर कोई अपना सुझाव दे रहा था और रतन सिंह उन सुझावों को चुप-चाप सुन रहे थे। कि तभी सभा में बादल खड़ा हुआ और बोलने लगा- ‘महाराज! महल के अंदर खाने की कमी हो गई है, राज्य में भूखमरी छाने लगी है, जरूरी चीजों का अभाव पड़ने लगा है और सेना का मनोबल तेजी से गिर रहा है’- हर कोई बादल की तरफ देखने लगा।

‘महाराज! मौत हमारे सामने खड़ी है… तो क्यों न लड़ के मरा जाए?’ बादल की इस बात पर दरबार में खुसफुसाहट शुरू हो गई।

‘मैं चित्तौड़ के लोगों को मरते नहीं देख सकता’- राजा ने चिंता की मुद्रा में बोला।

‘महाराज! चित्तौड़ का वीर इतिहास मौत से नहीं डरता’- बादल की आवाज भारी हो गई।

‘मैं जानता हूं… लेकिन बच्चे कहां जाएंगे… महिलाओं का क्या होगा?’- रतन सिंह के माथे पर चिंता की लकीरें खीचने लगी..

‘महिलाएं भी जंग लड़ेंगीं’- बादल के बोलने से पहले रानी पद्मावती बोल उठीं।

‘महिलाएं कैसे जंग लड़ेंगी?’- रतन सिंह के सवाल पर सभी लोग रानी पद्मावती की तरफ देखने लगे।

‘महिलाएं जौहर करेंगी’- रानी पद्मावती की बात सुनते ही सभी मंत्री अपने गद्दी से खड़े हो उठे।

‘नहीं!!! ये नहीं हो सकता’- तेज आवाज में बोलते हुए रतन सिंह ने अपने हाथों को अपने पैर पर जोरों से पटका।

‘महाराज! चित्तौड़ का इतिहास गवाह रहा है कि राजपूत महिलाएं साहस और त्याग में पूरुषों से कभी पीछे नहीं रही’- रानी की आवाज बिजली की तरह महल में गूंजने लगी। ‘महाराज!! राजपूतों की वीरता चित्तौड़ की शान है… और राजपूत महिलाओं का त्याग यहां का धर्म’

‘लेकिन इतना बड़ा फैसला क्यों महरानी’- रतन सिंह व्याकुलता के कारण बीच में बोल पड़े…

‘क्योंकि हार निश्चित है’- रानी पद्मावती की बात से दरबार में हड़कंप मच गया। रानी पद्मावती फिर से बोलना शुरू करती हैं- ‘महाराज युद्ध में हमारी हार निश्चित है…. लेकिन हमारी वीरता, इतिहास में जीत मानी जाएगी। राजपूतों की वीरगति चित्तौड़ के इतिहास को अमर कर देगी”। रानी पद्मावती बोलते-बोलते सभा के बीच में आकर खड़ी हो जाती हैं। ‘ मैं इस सभा से पूछना चाहती हूं.. कि क्या आप ये चाहते हैं कि चित्तौड़ की महिलाएं एक सनकी सुल्तान की दासी बनें’। रानी की इस बात से सभा में खलबली मचने लगी। सभा में बैठे योद्धाओं के हाथों ने मयान में रखी तलवार को कसना शुरू कर दिया। रानी पद्मवती की आवाज सभा के अंदर जंग के नगाड़ों की तरह बजने लगी। रानी राजा रतन सिंह की तरफ घूमती हैं और अपने दोनों हाथों को उठा कर कहती है- ‘महराज! मैं आपसे पूछती हूं… कि क्या आप ये चाहते हैं कि चित्तौड़ का इतिहास आपकी पद्मावती को एक वैश्या के रूप में जाने’- ये सुनते ही सभा में बैठे सारे योद्धा अपनी तलवारों को निकालते हुए खड़े हो उठे। पूरे सभा में जय भावानी के नारे गूंजने लगे।

रानी पद्मावती

रानी की लाल आंखों में देखते हुए राजा रतन सिंह ने कहा- ‘महारानी! अगर राज्य की महिलाएं यहीं चाहतीं हैं… तो मां काली की कसम राजपूतों की तलवार खिलजी की सेना पर बिजली बन कर गिरेगी’… ‘ लेकिन उन महिलाओं का क्या जो जोहर न करना चाहें?’- राजा रतन सिंह के सवाल पर बादल तुरंत बोल पड़ा- ‘ महाराज! इस सवाल का जवाब क्यों न चित्तौड़ की महिलाओं से ही लिया जाए?’ बादल के जवाब के बाद सभा में फैसला हुआ कि राज्य के पुरुष जंग में खिलजी की सेना का सामना करेंगे… और महिलाएं अपनी इच्छा से जौहर करेंगी।

राजपूतों की सेना आखिरी जंग के लिए तैयार होने लगी। पुरुषों ने केसरिया रंग का साफा अपने सरों पर पहना। महिलाएं श्रृंगार करने लगीं। युद्ध में उतरने से पहले पूरे चित्तौड़ के अंदर केसरिया रंग की होली खेली गई। केसरिया रंग में रंगे रतन सिंह रानी पद्मावती के पास आते हैं- ‘महारानी! मातृभूमि पुकार रही है…. विदा किजीए’- रतन सिंह मुस्कुराते हुए बोलते हैं। रानी पद्मावती रतन सिंह की आरती उतारती हैं और तिलक लगाते हुए कहती हैं- ‘महराज! अब स्वर्ग में ही मिलन होगा’।

‘ताई सा मेरे लिए क्या है’ बादल रानी पद्मावती का पैर छूते हुए कहता है।

‘मेरे बेटे.. मैं क्या कहूं… अभी तो तेरी जवानी भी नहीं चढ़ी है और तू युद्ध के मैदान में जा रहा है’- पद्मावती बादल के सर पर हाथ फेरते हुए कहती हैं

‘ताई सा वीर बड़ा या छोटा नहीं होता… वीर वीर होता है’-बादल ने मुस्कुराते हुए बोला ‘और ताई सा.. आपका ये बेटा ही अकेला खिलजी के सेना पर भारी है’- बादल की बातें सुनते ही पद्मावती के आंखों से आंसू निकलने लगे। बादल रानी पद्मावती का आशीर्वाद लेकर सेना को बढ़ने के लिए कहता है। रतन सिंह की सेना ‘हर हर महादेव’ का नारा लगाते हुए किले के बाहर निकलती है। वहीं किले के अंदर एक विशाल चिता जलाई जाती है। तालाब के आकार से भी बड़ी चिता की तरफ रानी पद्मावती समेत 1600 महिलाएं बढ़ने लगती हैं।

किले के बाहर खिलजी की सेना पर राजपूत मौत बनकर टूटने लगते हैं। राजपूत योद्धाओं का ये रुप खिलजी ने भी नहीं सोचा था। जंग का मैदान खून से लाल होने लगता है। इधर ‘मां काली’ का नाम लेते हुए एक-एक रानी चिता में कूदना शुरू कर देती हैं। महल की चार दीवारें महिलाओं की चीख से कांपने लगती हैं। उधर जंग के मैदान में रतन सिंह के योद्धा एक-एक करके वीरगति को प्राप्त होने लगते हैं। चित्तौड़ का नजारा ऐसा था कि महल के बाहर सैनिकों की चीख सुनाई दे रही थी तो महल के अंदर महिलाओं की। विनाश का ऐसा तांडव चित्तौड़ ने पहले कभी नहीं देखा था।

मैदान में बादल अभिमन्यु की तरह कई सैनिकों को मारते हुए आगे बढ़ने लगा। वहीं राजा रतन सिंह की तलवार खिलजी की सेना में हाहाकार मचाने लगी। लेकिन लाखों की सेना के बीच बादल और रतन सिंह दोनों फंस गए। खिलजी के सैनिकों ने दोनों का सर धड़ से अलग कर दिया। भीषण युद्ध के बाद जंग का मैदान शांत हो चुका था। खिलजी की सेना राक्षसों की तरह जश्न मनाने लगी।

रानी पद्मावती

खिलजी तेज आवाज में हंसते हुए किले की तरफ बढ़ने लगा। खिलजी की अनगिनत सेना के पैर के कदमों से किले के अंदर कंपन मचने लगा। खिलजी ठहाके लगाते हुए किले के अंदर घुसा लेकिन किले के अंदर फैली खामोशी उसके मन में कई सवाल पैदा करने लगी। किले के अंदर उठते भारी धूंए की तरफ खिलजी बढ़ने लगा। खाली महल किसी खंडहर की तरह लग रहे थे। खिलजी ने चारों तरफ अपनी नजरें घुमाई लेकिन दूर-दूर तक उसे कोई नहीं दिखा। खिलजी महल के पीछे उठ रहे धुंए की तरफ बढ़ने लगा। खिलजी महल के पीछे जैसे ही पहुंचा वहां का नजारा देख कर वो डर गया। राखों और अधजली लाशों को देखकर खिलजी और उसके मंत्री घबरा उठे। खिलजी बुझी चिता के पास तेजी से बढ़ने लगा लेकिन सब खत्म हो चुका था। खिलजी ने सोचा भी नहीं था कि जिस चित्तौड़ को वो शमशान बनाने की बात करता था … वो शमशान इतना भयानक दिखेगा।

खिलजी के बगल में खड़ा राघव चेतन राखों की ढे़र को देखते हुए रोने लगा। राघव सोचने लगा कि उसके एक बदले ने पूरे चित्तौड़ को बर्बाद कर दिया। राजा बनने की चाहत रखने वाला राघव चेतन जमीन पर गिर पड़ा। उधर उलाउद्दीन खिलजी ये समझ नहीं पा रहा थै कि रानियों ने खुद को क्यों जला लिया। अलाउद्दीन पागलों की तरह चिल्लाने लगा। जंग जीतने के बाद भी उसके हाथ कुछ नहीं लगा था। खिलजी ने राघव चेतन से पूछा कि रानियों ने आग में कूद कर जान क्यों दे दी। इसपर राघव चेतन ने कहा…. ‘ये राजपूत महिलाएं हैं.. जिनके बलिदान ने हार को जीत में बदल दिया…….’

कई कहानियों में इस बात का जिक्र मिलता है कि अलाउद्दीन खिलजी मरने से पहले तक अपने मंत्रियों से कहता रहा कि उसे चित्तौड़ की वो चीख आज भी सुनाई देती है। मरने से पहले उसे रोज डरावने सपने आते थे।

नोट- कहानी का कई हिस्सा अलग-अलग कहानियों और कथाओं से प्रेरित है। कई इतिहासकार इसे काल्पनिक बतातें है। लेकिन राजस्थान और चित्तौड़ के लोग रानी पद्मावती को देवी मानते हैं। इनका कहना है कि अलाउद्दीन के किसी भी इतिहासकार में इस बात को लिखने की हिम्मत नहीं थी। डर के कारण इतिहासकारों ने इस सच्चाई को दबा दिया। सच्चाई जो भी हो लेकिन रानी पद्मवती की याद आज भी चित्तौड़ के महलों और यहां कि कथाओं में जीवीत है।

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