महाभारत

क्यों भारतीय मीडिया को ‘संविधान’ की नहीं बल्कि ‘महाभारत’ की जरूरत है

महाभारत के 13वें दिन युद्ध के सारे नियम टूट चुके थे। अभिमन्यु की हत्या के बाद भगवान श्री कृष्ण से लेकर दुर्योधन तक बस युद्ध जीतने के लिए लड़ रहे थे। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में  जब भगवान कृष्ण से लेकर गुरु द्रोणाचार्य तक युध्द के नियम तोड़ चुके थे, वहीं एक व्यक्ति ऐसा भी था जो अपने कर्तव्यों को बिना नियम तोड़े निभा रहा था। लेकिन ये व्यक्ति था कौन?…..

आज, जब आप खबर के लिए टीवी खोलते हैं, तो क्या आपको खबर देखने को मिलती भी हैं? ये सवाल इसलिए क्योंकि न्यूज़ चैनलों में तो अब बस एक ही होड़ मची है, सबसे तेज़ और सबसे पहले। लेकिन अगर सब तेज़ हैं तो धीरे कौन हैं? और अगर सब सच बोल रहे हैं, तो झूठ कौन बोल रहा है? क्योंकि अगर सब सच बोल रहे होते तो मीडिया चैनलों के संपादक एक दूसरे से लड़ नहीं रहे होते और जनता उन्हें झूठा नहीं बताती। संविधान का चौथा स्तंभ माने जाने वाला मीडिया क्या अपनी जिम्मेदारी निभा भी रहा है या महाभारत की तरह यहां भी सारे नियम टूट चुके हैं। भारतीय मीडिया का हाल जानने के लिए हमें हजारों साल पहले जाना होगा, जहां हुई एक जंग में भगवान ने भी नियम तोड़ दिया था।

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भारत के इतिहास में नारद मुनि को पत्रकार के रूप में बताया जाता है, लेकिन धार्मिक किताबों में हुए वर्णन से पता चलता है कि नारद मुनि भी बातों को बदल कर अपने हिसाब से बताते थे, जैसा आज कि मीडिया आपके साथ करती है। ऐसे में पत्रकारिता की असल कहानी और आर्दश उदाहरण महाभारत के युद्ध में देखने को मिलता है।

उदाहरण 1- रिपोर्टिंग और संजय

महाभारत की जंग पांडवों और कौरवों के बीच हुई थी। पांडवों का प्रतीक युधिष्ठिर थे तो वहीं कौरवों का दुर्योधन। दुर्योधन के पिता धृतराष्ट्र अंधे थे, उनकी इच्छा थी कि वो भी युद्ध को देख सके। ऐसे में ऋषि वेदव्यास ने संजय नाम के व्यक्ति को( जो राजा का सार्थी भी था) दिव्य दृष्टि दी। वेद व्यास ने संजय को वरदान दिया कि वो महाभारत के सारे घटना क्रम को महल में ही बैठ कर देख सकेगा और राजा धृतराष्ट्र को पल-पल की जानकारी देगा। इस घटना को आप पत्रकारिता से जोड़ सकते हैं, जहां संजय आपको एक संवादाता की तरह नज़र आएगा जिसका काम युद्ध की सभी घटनाओं को बताना था।

Journalism : The Divine Vision From Mahabharat

उदाहरण 2- पत्रकारिता और संजय

युद्ध की शुरुआत में धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मेरे और पांडवों के लोग क्या कर रहे हैं? संजय समझ जाता है कि राजा सिर्फ दुर्योधन के सेना के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन फिर भी वो कौरवों के साथ पांडवों के सेना के बारे में बताता है। यहीं से गीता का पहला श्लोक भी शुरू होता है।

उदाहरण 3- इतिहास और संजय

घोर युद्ध शुरु होता है, कभी पांडव तो कभी कौरवों में खलबली मचने लगती है। ऐसे में युद्ध के 13वें दिन गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, शकुनी और दुशासन जैसे कई योद्धा अभिमन्यु को छल से घेर कर मार देते हैं। इस हत्या से धृतराष्ट्र घबरा जाता है, वो अर्जुन के डर से संजय से कहता है कि अब युद्ध नहीं रुक सकता। इस पर संजय धृतराष्ट्र को याद दिलाते हुए कहता है कि युद्ध तो उसी समय तय हो गया था, जब पांच गांवों की मांग पर श्रीकृष्ण का भरी सभा में अपमान करने की कोशिश की गई थी। एक राजा को इतना कड़वा कहना वो भी उस दौर में जब लोकतंत्र नहीं राजतंत्र था। इसकी उम्मीद आज के समय में नहीं की जा सकती। क्या आज के समय में कोई भी पत्रकार या संपादक अपने संस्थान या संस्थान के मालिक को ऐसा आइना दिखा सकता है? जवाब है नहीं

 

उदाहरण 4- निडरता और संजय

महाभारत के युद्ध में जब दुर्योधन के सबसे प्रिय भाई दुशासन को भीम मार देते हैं तो धृतराष्ट्र रोते हुए संजय से पूछता है कि हत्या कैसे हुई। संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि भीम ने दुशासन की छाती को अपने हाथों से चीर कर उसका खून पिया। ये सुनते ही धृतराष्ट्र गुस्से में आग बबूला हो जाता है और संजय से कहता है कि उसने ऐसी बात कही कैसे? संजय कहते हैं कि उनका काम युद्ध की घटना को बताना है न कि ये सोचना कि क्या बताना चाहिए और क्या नहीं। एक राजा को उसके बेटे की मौत का ऐसा वर्णन करना मौत को बुलावा था लेकिन संजय बिना डरे अपना कर्तव्य निभाते रहे। क्या आज के समय में पत्रकार या संपादकों में ऐसी हिम्मत बची है? क्या आज का पत्रकार बिना डरे किसी माफिया, उद्योगपति या मंत्री से कड़ा सवाल कर सकता है? क्या आज का संपादक अपने संस्थान के मालिक को सच कह सकता है? इसका जवाब भी है नहीं

उदाहरण 5-  टीआरपी(TRP) और संजय

महाभारत में कर्ण की मौत के बाद धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि उसे युद्ध का परिणाम पता चल गया है अगर संजय चाहे तो वो जा सकता है, इसपर संजय कहता है कि उसका कर्तव्य धृतराष्ट्र को युद्ध की हर घटना के बारे में बताना है। संजय कहता है कि उसका कर्तव्य ही उसका धर्म है, ऐसे में युद्ध का परिणाम कुछ भी हो वो राजा को छोड़ कर नहीं सकता। आज की पत्रकारिता में पत्रकारों और संपादकों से इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती है? चैनल के संपादक और पत्रकार टीआरपी और व्यक्तिगत फायदे के लालच में सबसे पहले पत्रकारिता से ही समझौता करते हैं। वो पत्रकारिता के उन तमाम उसूलों को एक झटके में त्याग देते हैं जिनको सीखने में सालों लगते हैं।

उदाहरण 5-  निष्ठा और संजय

महाभारत में दुर्योधन की मौत के बाद धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि वो उसे राजा न बुलाए। धृतराष्ट्र ये भी कहता है कि अब उसके पास कोई ताकत नहीं लेकिन इसपर भी संजय उसे राजा कहता है। मौजूदा समय में चैनल मालिकों के दुलारे संपादक और संपादकों के दुलारे न्यूज़रुम के दूसरे पत्रकार मौका मिलते ही सबसे पहले अलग हो जाते हैं। चैनल से फायदा लेने वाले पत्रकार चैनल के बूरे वक्त में सबसे पहले अलग हो जाते हैं।

क्यों पत्रकारिता के लिए आदर्श हैं महाभारत के संजय?

संजय ने पूरे महाभारत में एक संवादाता(Reporter) की तरह  Live Reporting की। संजय ने धृतराष्ट्र को हर वो बात बताई जो युद्ध भूमि में घट रही थी। संजय ने बिना पक्षपात के दोनों ही पक्षों के सही और गलत बातों का जिक्र किया। राजा के नाराज़ होने पर भी संजय डरे नहीं। राजा से संजय ने कोई झूठ नहीं बोला। ये जानते हुए कि दुर्योधन की हार पक्की है संजय ने धृतराष्ट्र का साथ नहीं छोड़ा। संजय ने अपने मन की बात धृतराष्ट्र से नहीं कही बल्कि जो सच था वहीं कहा।

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क्या बदल गया है पत्रकारिता में?

पहले अखबार के 25 पन्नों में 24 पन्ने खबर बताते थे। इनमें एक पन्ना संपादकीय होता था जहां संपादक या विशेषज्ञ पूरे शोध(Research) के बाद अपनी राय रखते थे। आज अखबार के पहले पन्ने से लेकर आखिरी पन्ने तक संपादकीय भाषा का इस्तेमाल होता है और खबर कही दब जाती है। वहीं Broadcast Media(टीवी पत्रकारिता) में संपादकीय के नाम पर अब सिर्फ पक्षपात हो रहा है। चैनलों की खबर और बहस के मुद्दे टीआरपी के आधार पर तय हो रहे हैं। लगभग हर चैनल किसी न किसी पार्टी के मुद्दों को खबरों के माध्यम से बढ़ा रहा है। ऐसा नहीं है कि ये पहले नहीं होता था लेकिन अब ये खुलेआम हो रहा है।

क्यो आई ये नौबत?

पत्रकारिता अब खुश करने का नाम बनती जा रही है। चैनल के मालिक अपनी पसंदीदा राजनीतिक पार्टियों को खुश कर रहे हैं। संपादक, मालिक को खुश करने में लगे हैं और चैनल के बाकी पत्रकार संपादक को खुश करने में। ये खुशी टीआरपी के बढ़ने से बढ़ती है और घटने से घट जाती है।

चैनल मालिकों और धृतराष्ट्र में क्या है अंतर?

धृतराष्ट्र पूरे महाभारत में गलत था लेकिन फिर भी उसने संजय को कभी सच बोलने से रोका नहीं। संजय से नाराज़ होने के बावजूद भी धृतराष्ट्र ने संजय को सजा नहीं दी, जबकि आज के चैनल मालिक संपादकों की परख फायदे या नुकसान से करते हैं। चैनल और मालिक की तारीफ करने वाले इंसान ही अब ज्यादातर संपादक बनते हैं। चैनल मालिकों की टीम मीटिंग में न तो अब संजय जैसे लोग हैं और न ही विदूर जैसे मंत्री, ऐसे में सच और गलत की  जगह फायदे और नुकसान ने ले ली है।

क्या होगा पत्रकारिता का?

कलिंग की जंग में जब सम्राट अशोक ने नगर के सभी पुरुषों को मार दिया तो वहां कि महिलाओं ने हथियार उठा लिया और अशोक से लड़ने निकल पड़ी। महिलाओं का ये रूप देखकर अशोक भी घबरा गए और उन्होंने जंग न लड़ने की कसम खा ली और बौद्ध धर्म अपना लिया। ऐसे ही अगर न्यूज चैनल और अखबार खबर की जगह किसी विचारधारा को आगे बढ़ाएंगे तो लोग खुद ही दुसरा रास्ता निकाल लेंगे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सोशल मीडिया है। आज सोशल मीडिया पर लोगों को हर वो खबर मिल जा रही है जिसे चैनलों में दबाने की कोशिश होती है, ये बात अलग है कि सोशल मीडिया पर झूठी ख़बरों का भी एक बड़ा व्यापार चल रहा है।

दुनिया के हर देश में लोग मीडिया से नाराज है, मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं। जो मीडिया गरीब, मजबूरों के लिए बनाई गई थी वो आज अमीरों और नेताओं की कठपुतली बनती जा रही है। ऐसे में संविधान की दुहाई देने वाली भारतीय मीडिया को संविधान की नहीं बल्कि महाभारत पढ़ने की जरुरत है।

नोट- कवर फोटो पर लगाए गए पत्रकारों की तस्वीरे सिर्फ प्रतीक के लिए हैं। हमारा मकसद मुद्दे को लोगों के सामने लाया है ना कि किसी पत्रकार पर सवाल उठाना

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