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सत्यजीत रे की अधूरी फिल्म को देखकर जब बंगाल के मुख्यमंत्री ने कहा था- ‘ये करिश्मा है’

सड़क पर ट्रैफिक और उसी ट्रैफिक के बीच परेशान घूम रहे दो बच्चे। एंतोनिया की नज़रें जहां कुछ ढूंढ रही थीं तो नन्हा ब्रूनो भी उदास था। दोनों अपने पिता पर आई आफत से काफी टूट चुके थे। दोनों बच्चे मिलकर जल्द से जल्द उस साइकिल को ढूंढ निकालना चाहते थे, ये कोई मामूली साइकिल नहीं थी। इस साइकिल को खरीदने के लिए एंतोनिया ने अपने घर की चादर तक गिरवी रख दी थी। साइकिल नहीं मिली तो नन्हे ब्रूनो को हाल ही में जो पोस्टर लगाने की नौकरी मिली है वो भी जा सकती थी… ये ‘बायसाइकिल थीफ’ फिल्म का एक सीन है। इस सीन को देखने के बाद सत्यजीत रे की जिंदगी बदल गई।

सत्यजीत रे ने उन्हीं दिनों बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय का मशहूर उपन्यास ‘पाथेर पंचाली’ पढ़ा था। ये कहानी थी एक गरीब परिवार की। ‘बायसाइकिल थीफ’ देखने के बाद सत्यजीत रे ने ‘पाथेर पंचाली’ पर फिल्म बनाने की सोची। लेकिन उन दिनों उपन्यास पर फिल्म बनाना टेढ़ी खीर थी। सत्यजीत रे ‘पाथेर पंचाली’ बनाने के बारे में सोच ही रहे थे कि उनकी मुलाकात फ्रेंच निर्देशक जेन रेनोयेर से हुई। रेनोयेर उन दिनों कोलकाता में एक फिल्म की शूटिंग के लिए आए हुए थे।

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सत्यजीत रे ने जेन रेनोयेर से मुलाकात की और उन्हें बताया कि वो ‘पाथेर पंचाली’ पर एक फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। रेनोयर को ये बात बेहद पसंद आई, एक बड़े निर्देशक ने जब आइडिया पर मोहर लगा दी तो सत्यजीत रे का आत्मविश्वास बढ़ गया। उन्होंने तुरंत अब इस उपन्यास को फिल्म की शक्ल देने की ठान ली। लेकिन अभी तो कई चुनौतियों का सामना करना था।

सत्यजीत रे ने फिल्म बनाने का तो सोच लिया था लेकिन उनके पास इसकी कोई स्क्रिप्ट नहीं थी। हाथ से तैयार किए हुए कुछ नोट्स और कुछ ड्राइंग पेपर थे जो सत्यजीत रे ने उपन्यास पढ़ते वक्त बनाए थे। इसके बाद दूसरी चुनौती थी पैसे की। पूरी फिल्म बनाने के लिए पैसा कहां से आएगा? एक्टर से लेकर क्रू तक के लोगों को पैसा कहां से दिया जाएगा? उनकी फीस का इंतजाम कहां से किया जाएगा? ये सारे सवाल सत्यजीत के दिमाग में लगातार घूम रहे थे।

कम लागत में फिल्म बनाने के लिए सत्यजीत रे ने ऐसे कलाकारों को चुना जिनकी फीस कम थी। लेकिन यहां भी एक परेशानी थी, इन कलाकारों को सिनेमा में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। यहां तक की कुछ कलाकारों ने किसी नाटक में भी अभिनय नहीं किया था।

खैर इसके बाद काम आगे बढ़ने लगा। तकनीक से जुड़े लोगों की मदद से फिल्म के लिए स्कैच बुक तैयार होने लगी। इस स्कैच बुक में सेट, डायलॉग और सीन ट्रीटमेंट जैसी सारी जरूरी चीज़ों को लिखा गया। अभी तक तो सत्यजीत रे उधारी से फिल्म का खर्च निकाल रहे थे। लेकिन पैसे अब भी कम पड़ रहे थे। ऐसे में उन्होंने अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी को बेचने का फैसला कर लिया। बात अब भी नहीं बनी थी, ऐसे में फिल्म को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के जेवर बेच दिए।

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इतना सब होने के बाद लग रहा था कि शायद अब कोई दिक्कत न आए लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पैसे अब भी कम ही पड़ रहे थे, अंत में आर्थिक स्थिति से परेशान होकर सत्यजीत रे ने फिल्म को एक साल के लिए सस्पेंड कर दिया। सोचा शायद एक साल में पैसा इकट्ठा हो पाए और बाकी का काम भी पूरा हो जाए।

इस बीच सत्यजीत रे की मां के एक दोस्त थे, जो सत्यजीत की सारी मेहनत को देख रहे थे। वो देख रहे थे कि कैसे पैसा इकट्ठा हो रहा है और किस मेहनत से फिल्म को पूरा करने की कोशिश की जा रही है। उनके संपर्क कई बड़े लोगों से भी थे। ऐसे में  सत्यजीत रे की इस फिल्म के लिए उन्होंने बिधन चंद्र रॉय से बात करने का फैसला किया। बिधन चंद्र रॉय उन दिनों पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे।

पहले तो बिधन चंद्र रॉय ने इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई कि कोई लड़का जिसका नाम सत्यजीत रे है, एक उपन्यास पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सत्यजीत रे की मां के उसी दोस्त ने बिधन चंद्र रॉय को बस फिल्म का एक सीन देखने को कहा। उन्होंने कहा कि अगर सीन देखने के बाद भी उन्हें नहीं लगता कि सत्यजीत रे की कोई मदद होनी चाहिए, तो वो उसके लिए फिर कोई मदद नहीं मानेंगे।

बिधन चंद्र रॉय को आखिरकार उनकी बात माननी ही पड़ी। अभी तक जो फिल्म बनकर तैयार हुई थी उसके कुछ दृश्यों को बिधन चंद्र रॉय को दिखाया गया। बिदन चंद्र रॉय को यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसी फिल्म भी हमारे देश में बन सकती है। उन्होंने फौरन होम पब्लिसिटी डिपार्टमेंट में बात कर सत्यजीत रे की इस फिल्म को आर्थिक सहायता देने को कहा।

बाद में भी कुछ पैसे की कमी हुई तो अमेरिका की एक फिल्म संस्था ने ‘पाथेर पंचाली’ के लिए आर्थिक मदद दी। जब ये फिल्म रिलीज़ हुई तो बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गई। कान्स से लेकर हर बड़े अवॉर्ड फंक्शन में ‘पाथेर पंचाली’ की चर्चा हुई। उस दिन सिर्फ इस फिल्म की किस्मत ही नहीं बल्कि सत्यजीत रे की किस्मत ने भी बड़ा मोड़ लिया।

भारतीय सिनेमा में सत्यजीत रे की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, जापान के मशहूर फिल्मकार अकीरो कुरसावा ने एक बार कहा था ‘अगर आपने सत्यजीत रे का सिनेमा नहीं देखा तो इसका मतलब है कि आपने सूरज और चांद देखे बिना जिंदगी गुजार दी।’

सत्यजीत रे अपने आप में एक अलग ही फिल्मी दुनिया थे। फिल्म के विद्य़ार्थियों के लिए सिनेमा एक विषय तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सत्यजीत रे का सिनेमा। जो समाज का बिल्कुल अलग आइना दुनिया को दिखाता है।

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