1947 बंटवारा: कहानी उस अंग्रेज़ की जिसके हिस्से आई सिर्फ बंटवारे की बदनामी

1947 बंटवारा: कहानी उस अंग्रेज़ की जिसके हिस्से आई सिर्फ बंटवारे की बदनामी

साल 1947 में लंबे संघर्ष के बाद भारत को आजादी मिल रही थी। आजादी सिर्फ ऐसे ही नहीं मिल रही थी। एक देश  के दो हिस्से किए जाने थे। ये काम खासतौर से ब्रिटेन के एक वकील को दिया गया था। ये जिम्मेदारी एक ऐसे आदमी को दी गई थी जो कभी हिन्दुस्तान आया ही नहीं था। रेडक्लिफ को पूरे देश का दौरा करना था फिर निर्णय लेना था कि जमीन का कौन  सा टुकड़ा भारत और कौन सा पाकिस्तान के हिस्से में आएगा।

ब्रिटिश सरकार की तरफ से रेडक्लिफ को भारत आने का न्योता दिया गया। रेडक्लिफ के पास उन दिनों कई केस पड़े हुए थे जिन पर वह काम कर रहे थे लेकिन सरकार के आदेश को ठुकराया नहीं जा सकता था। इसलिए उन्होंने फौरन भारत आने की तैयारी की और 8 जुलाई को पानी के जहाज से भारत पहुंचे। पहली बार रेडक्लिफ ने हिन्दुस्तान की जमीं पर कदम रखा था।

सर रेडक्लिफ

नए देश आकर वह कुछ समझ पाते उससे पहले ही उन्हें वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के दफ्तर से बुलावा आ गया। रेडक्लिफ तैयार हुए और हाजिरी लगाने पहुंच गए। दफ्तर की इमारत में बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानी लोग अंग्रेज़ी हुकुमत की चाकरी करते नज़र आ रहे थे। रेडक्लिफ ने एक बार दफ्तर में घूम रहे उन लोगों की तरफ गौर से देखा फिर माउंटबेटन के कमरे की तरफ चले गए।

माउंटबेटन ने रेडक्लिफ का अपने दफ्तर में स्वागत किया। बातें शुरू हुईं और माउंटबेटन ने रेडक्लिफ को भारत बुलाने का मकसद बताया। सर रेडक्लिफ को हिन्दुस्तान के दो हिस्से करने थे। माउंटबेटन ने इस बात के साथ ये भी साफ कर दिया कि ये काम आसान नहीं है, वह खुद इस काम को नहीं कर पाए, इसलिए ये जिम्मेदारी रेडक्लिफ को सौंपी जा रही है।

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माउंटबेटन ने आगे बताया कि रेडक्लिफ को इस काम के एवज़ में 3000 पाउंड दिए जाएंगे। रेडक्लिफ माउंटबेटन की बातें सुनकर मन ही मन काफी उत्साहित महसूस कर रहे थे। उन्हें खुशी इस बात की नहीं थी कि उन्हें इतनी बड़ी राशि दी जाएगी, जबकि उस दौर में ब्रिटिश सरकार की हालत काफी खस्ता थी। लेकिन रेडक्लिफ को इस बात की खुशी थी कि इस काम से वह एक अंतरराष्ट्रीय नेता बन जाएंगे। उनका नाम होगा, उनकी पहचान ब्रिटेन के बाहर भी होगी। उन्हें हमेशा भारत और पाकिस्तान के निर्माता के तौर पर जाना जाएगा। रेडक्लिफ को लगा एक वकील से मशहूर राजनेता बनने का एक यही मौका है। फिर क्या था उन्होंने हामी भर दी। फैसला लिया गया कि जो बॉर्डर बनाया जाएगा उसे रेडक्लिफ लाइन कहा जाएगा।

माउंटबेटन के साथ नेहरू और जिन्ना बंटवारे पर चर्चा करते हुए

अब रेडक्लिफ को आजादी की लड़ाई में सक्रिय लोगों से मुलाकात करनी थी। रेडक्लिफ महात्मा गांधी से मिले। महात्मा गांधी ने रेडक्लिफ को बंटवारा न करवाने की सलाह दी। उन्होंने कहा इससे हिंसा के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन जब रेडक्लिफ जिन्ना और नेहरू से मिले तो उन्हें पता चला कि रेडक्लिफ लाइन को महज एक महीने से भी कम समय में बनाना है। उनके पास 15 अगस्त तक का ही समय था। फिर क्या था रेडक्लिफ ने महात्मा गांधी की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और लग गए अपने काम पर। नेहरू और जिन्ना से मिलने के बाद ये बात साफ हो गई थी कि रेडक्लिफ के पास इतना समय भी नहीं है कि वह उन इलाकों का दौरा कर सकें जहा पर उन्हें बंटवारे की लकीरें खींचनी हैं।

रेडक्लिफ ने बहुत तेज़ी से काम करना शुरू किया। रेडक्लिफ को कुछ नक्शे और पेन दिए गए । ये नक्शे भी वो थे जो दफ्तर की दीवारों पर टंगे रहते थे। उन्होंने नक्शे में दो लकीरें खींच दी।रेडक्लिफ ने पहले जो लकीरें खींची थी उसके हिसाब से लाहौर भारत के हिस्से में आ रहा था। लेकिन अगर ऐसा होता तो पाकिस्तान के हिस्से में कोई महत्वपूर्ण शहर नहीं आता। इसलिए इस बार जो लकीरें खींची उसमें पाकिस्तान के हिस्से में लाहौर दे दिया गया।

सर रेडक्लिफ ने ये दो लकीरें खीच कर एक देश को दो हिस्सों में बांट दिया था

रेडक्लिफ ने कम समय में ही अपना काम पूरा कर दिया था। माउंटबेटन के पास प्रस्ताव  भेजा गया। महात्मा गांधी को जब माउंटबेटन ने प्रस्ताव के बारे में बताया तो उनसे ये बात बर्दाश्त नहीं हुई। जैसे ही उन्होंने बंटवारा शब्द सुना वह उठे और कमरे से बाहर चले गए। लेकिन नेहरू और जिन्ना ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।

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बंटवारे का ऐलान होते ही जो हुआ उसने हमेशा के लिए रेडक्लिफ के जम़ीर पर एक बोझ छोड़ दिया। दोनों तरफ हिंसा का दौर शुरू हो गया। खून बहा मुस्लमान का भी और हिन्दु का भी। नुकसान हुआ था इंसानियत का। रेडक्लिफ इन घटनाओं से इतना आहत हुए कि अगले दिन ही लंदन के लिए रवाना हो गए। एक मुल्क के दो हिस्से करने के लिए उन्हें जो पैसे मिलने वाले थे उसे भी उन्होंने नहीं लिया और लंदन पहुंचते ही रिटायरमेंट ले लिया। कई साल हो गए रेडक्लिफ लाइन के बारे में तो अक्सर सुना जाता है लेकिन वो शख्स अचानक ही कहीं गायब हो गया। न किसी खबर न किसी चर्चा में उसका ज़िक्र होता था।

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मशहूर पत्रकार कुलदीप नैय्यर एक बार उनसे मिलने के लिए लंदन गए। रेडक्लिफ ब्रांड स्ट्रीट के संपन्न अपार्टमेंट में रहते थे। कुलदीप नैय्यर जब उनके घर पहुंचे तो रेडक्लिफ ने खुद दरवाजा खोला। नैय्यर के लिए उन्होंने खुद चाय बनाने के लिए गैस पर रखी। उनके घर पर एक भी नौकर नहीं था वह अपने सारे काम खुद कर रहे थे। कुलदीप नैय्यर लिखते हैं कि रे़डक्लिफ जैसे उनसे नज़रे चुरा रहे थे। वह बंटवारे पर बात ही नहीं करना चाहते थे। लेकिन फिर भी जब ये बात छिड़ी तो सर रेडक्लिफ के आंखों में शर्मिंदगी और चेहरे पर अफसोस साफ दिखाई दे रहा था। उन्हें देखकर साफ लग रहा था कि वो ऐसे आदमी थे जिनके ज़मीर पर अब हज़ारों लोगों की मौत का बोझ था।

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लंदन में ही कुछ सालों के बाद उनका निधन हो गया। लेकिन अखबारों में जो उनके बारे में छपा वह बंटवारे पर ही सवाल खड़ा करने वाला था। रेडक्लिफ के बारे में लिखा गया कि वो एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने दो देशों का निर्माण किया लेकिन सम्मान कभी नहीं कमाया।

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