सोनिया गांधी

क्या बेटे के प्यार में महाभारत की ‘धृतराष्ट्र’ हो गईं हैं सोनिया गांधी?

ये राहुल गांधी की किस्मत है या बदकिस्मती कि उनका जन्म भारत के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार में हुआ। राहुल की क्षमता को लेकर जहां हमेशा सवाल उठते रहें हैं तो वहीं गांधी परिवार का वारिस होने के कारण उन्हें संरक्षण भी मिलता रहा है। राहुल आज (16 दिंसबर) कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। लेकिन राहुल की इस ताजपोशी में एक उदासी भी है क्योंकि आज सोनिया गांधी राजनीति से संयास ले चुकी हैं। क्या सोनिया गांधी ने राहुल को बचाने के लिए राजनीति से संयास ले लिया? राहुल को उनके किस सफलता का इनाम दिया है सोनिया ने? सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या सोनिया गांधी पुत्र मोह में महाभारत की धृतराष्ट्र बन गईं हैं? इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए हम राहुल के राजनीतिक करियर पर शुरू से अबतक एक नजर डालते हैं….

जब राहुल की ‘कलावती’ को पूरे भारत ने सुना

राहुल गांधी को बतौर नेता लोगों ने पहली बार तब जाना जब 21 जुलाई 2008 को उन्होने संसद में भाषण दिया। मनमोहन सिंह की सरकार परमाणु समझौते को लेकर कटघरे में थी और विपक्ष सरकार को किसान विरोधी बता रहा था। इस दौरान राहुल गांधी लोकसभा में बोलने के लिए खड़े हुए। पीछे की लाइन में खड़े राहुल ने जैसे ही कलावती का नाम लिया सदन में मौजूद नेता उनपर हंसने लगे। लेकिन राहुल ने बड़ी ही सादगी के साथ मुस्कुराते हुए अपना भाषण जारी रखा। विदर्भ में रहने वाली एक विधवा(कलावती) की कहानी को राहुल ने जिस अंदाज में बताया वो आज भी लोगों के जहन में ताजा है। राहुल ने परमाणु बिल का बचाव करते हुए बताया कि कैसे इस बिल से कलावती और देश के तमाम गरीबों की जिंदगी बदल जाएगी। राहुल के भाषण के बाद सरकार ने बिल को बहुमत के साथ पास कराया और सरकार भी बचाई। ये राहुल की राजनीतिक  का पहला दृश्य था। इसके बाद चारों और ये बात उठने लगी कि क्या राहुल अपने पिता राजीव गांधी की तरह ही एक प्रभावशाली नेता साबित होंगे।

विदर्भ की विधवा कलावती पर राहुल ने 21 जुलाई 2008 को ऐतिहासिक भाषण दिया था

2009 के चुनाव में हीरो बन गए राहुल

2009 लोकसभा चुनाव में राहुल ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली। राहुल लोगों से सीधे संवाद करने लगे। गराबों के घर रुकना, उनके साथ बैठकर खाना, ये चीजें राहुल को सबसे अलग बनाने लगी। राहुल की मेहमत 2009 लोकसभा चुनाव के परिणाम में दिखी। 2004 में 9 सीटों से कांग्रेस 2009 में 21 सीटों  पर आ चुकी थी। 23 सीटों के साथ समाजवादी पार्टी पहले, कांग्रेस दूसरे, बसपा- 20 सीटों के साथ तीसरे और भाजपा 10 सीटों के साथ चौथे स्थान पर थी। यूपी में शानदार प्रदर्शन का मौर राहुल के सिर चढ़ा। राहुल तेजी से यूथ आइकन बनते जा रहे थे। राजनीतिक जानकारों से लेकर आम आदमी तक हर किसों को राहुल में भविष्य का प्रधानमंत्री नजर आने लगा।

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जब राहुल पर उठने लगे सवाल

2009 में यूपी से हीरो बने राहुल पर सवाल भी यूपी से ही उठे। 2009 में दूसरे स्थान से लुढ़कर कांग्रेस 2012 यूपी विधानसभा चुनाव में चौथे स्थान पर आ गई। ये वो समय था जब विपक्ष को राहुल के खिलाफ पहला मौका मिला। लेकिन कांग्रेस की तरफ से राहुल का बचाव करते हुए इसे पार्टी का खराब प्रदर्शन बताया गया। ये पहला मौका था जब जवाबदेही के बजाए राहुल नदारद रहे और कांग्रेस उनका समर्थन करती दिखी।

2012 यूपी विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद राहुल पहली बार विपक्ष के निशाने पर आए

जब जिम्मेदारी से बचते दिखे राहुल

मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार पर एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। इस बीच निर्भया गैंगरेप के कारण लोगों का गुस्सा कांग्रेस के खिलाफ बढ़ता जा रहा था। इधर अन्ना हजारे का इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन कांग्रेस की मुश्किलें खड़ा कर रहा था। सबकी निगाहें राहुल पर टिकी थीं लेकिन राहुल इन मुद्दों से दूर रहें। जो राहुल गांधी कलावती की हक की बातें करते थे वो भ्रष्टाचार की सुनामी के बीच भी खामोश रहे। इस बीच दागी उम्मीदवार को बचाने वाले विवादित अध्यादेश के खिलाफ राहुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। राहुल ने अध्यादेश को बकवास बताया और सबके सामने फाड़ के फेंक दिया। लेकिन सवाल ये था कि अगर राहुल इस अध्यादेश के खिलाफ थे तो 3 दिनों तक चुप क्यों रहे? वो भी तब जब कांग्रेस की कोर ग्रुप में इस अध्यादेश पर चर्चा हुई थी। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक ये राहुल का पॉलिटिकल स्टंट था। राहुल की जिस सादगी को लोगों ने 2008 में देखा था वो सादगी गायब हो चुकी थी। शायद यही कारण भी था कि जितना नुकसान कांग्रेस को हुआ उससे कहीं ज्यादा राहुल गांधी की छवि को हुआ।

जब कलावती का राहुल राजनीति का ‘पप्पू’ बन गया

2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे पर हमला किया। नरेन्द्र मोदी ने अपनी हर रैली में राहुल गांधी को शहजादा कहना शुरू कर दिया। इस बीच भाजपा की IT सेल ने राहुल गांधी को सोशल मीडिया पर पप्पू नाम दे दिया। राहुल गांधी पर लाखों चुटकुले बनने लगे और राहुल देखते ही देखते विपक्षी पार्टियों के पप्पू बन गए।

2017 यूपी चुनाव में 2 लड़को की कहानी फ्लाप रही

यूपी से हिरो बने राहुल यूपी में बने जीरो

2014 के बाद से तो जैसे कांग्रेस मुक्त का नारा हकीकत में बदल गया। जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, असम जैसे चुनाव में हार ने कांग्रेस को हाशिए पर ढकेल दिया। भाजपा को यूपी में रोकने के लिए राहुल को कमान दी गई और उनके चाणक्य बने प्रशांत किशोर। वही प्रशांत किशोर जिन्हें 2014 में मोदी और 2015 में नीतीश कुमार को चुनाव जीताने के लिए जाना गया। प्रशांत किशोर इस बार राहुल के साथ थे। भाजपा को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन हुआ। 2 लड़कों के नारे से चुनाव में उतरी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही साफ हो गई। भाजपा न सिर्फ यूपी बल्कि उत्तराखंड में भी भारी बहुमत से जीती। हार इतनी बड़ी थी कि प्रशांत किशोर का पॉलिटिकल करियर वहीं खत्म हो गया। हार के सदमे में डूबे कांग्रेस के नेता एक तरफ जहां राहुल गांधी को बचाने में जुटे थे वहीं अमित शाह ने गोवा और मणिपुर में दूसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद सरकार बना ली।

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राहुल को क्यों मिली गुजरात की कमान?

राहुल को गुजरात चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन पार्टी के अंदर एक गुट ऐसा है जिसका कहना है कि यूपी और उत्तराखंड में भारी हार के बाद भी राहुल को जिम्मेदारी क्यों सौंपी गईं। यही सवाल भाजपा के नेता भी उठाते रहे हैं कि क्या राहुल को गुजरात की कमान यूपी में हार का इनाम है? ऐसे में सवाल जायज भी है कि अगर राहुल जीत के लिए जिम्मेदार होतें हैं तो यूपी और उत्तराखंड में हार का जिम्मेदार क्यों नहीं हुए? क्या राहुल को छूट सिर्फ इसलिए मिली क्योंकि वो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे हैं?

गुजरात चुनाव के दौरान एक अलग अंदाज में दिखे राहुल गांधी

गुजरात चुनाव के परिणाम से पहले राहुल को क्यों बनाया गया अध्यक्ष?

इन चुनावों में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता राहुल के बदले अंदाज की दलील देते रहे। कई चैनलों और अखबारों में राहुल के बदले तेवर को लेकर जिक्र हुआ। गुजरात चुनाव में राहुल को लेकर जो पांच चीजें अगल थी..

  1. इन चुनावों में सोनिया गांधी का प्रत्यक्ष रुप से कोई भी योगदान नहीं था

  2. राहुल के लिए इन चुनावों में प्रियंका ने कोई प्रचार नहीं किया

  3. राहुल को पप्पू नाम से छुटकारा मिला

  4. सोशल मीडिया पर राहुल के खिलाफ चुटकुलों में भारी कमी आई

  5. राहुल सुनियोजित और संगठित तरीके से काम करते दिखे

इन सब के बावजूद भी एक सवाल,  क्या ये जद्दोजहद राहुल को एक कुशल नेता बनाने की थी? राहुल ने जिस चुनाव को अकेले संभाला उसके नतीजे से पहले उन्हें क्यों पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया? क्या हार के डर से सोनिया गांधी ने ये फैसला लिया?

गुजरात चुनाव के परिणाम से पहले राहुल को क्यों बनाया गया पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष

क्या बेटे को बचाने के लिए सोनिया गांधी ने अपना बलिदान दिया?

सोनियां गांधी ने आज राजनीति से संयास का ऐलान कर दिया। एग्जिट पोल की माने तो दोनों राज्यों में कांग्रेस की हार निश्चित है। ऐसे में चुनाव के नतीजों से दो दिन पहले राहुल गांधी की राजनीतिक शख्सियत को घटा ही रही है। सोनिया गांधी और कांग्रेस के सामने कुछ यक्ष प्रश्न हैं….

  1. क्या कांग्रेस में लोकतंत्र दिखावा है?

  2. राहुल के खिलाफ दूसरा उम्मीदवार क्यों नहीं खड़ा हुआ?

  3. राहुल क्या दूसरे नौजवान नेताओं का हक मार रहे हैं?

  4. क्या कांग्रेस में रहना हैं तो राहुल-राहुल कहना है?

    जीत के जिम्मेदार अगर राहुल हैं तो हार का क्यों नहीं?

    जिस गुजरात चुनाव में राहुल को हीरो बताया गया, उसके नतीजों का इतजार क्यों नहीं किया गया?

  5. क्या राहुल को लगातार मिल रही हार का इनाम है अध्यक्ष पद?

राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना सोनिया गांधी की मजबूरी, रणनीति या पुत्र मोह है ये तो वहीं बता सकती हैं। लेकिन इतना जरूर है कि राहुल का राज्याभिषेक महाभारत की उस प्रसंग की याद दिलाता है जहां पुत्र मोह में धृतराष्ट्र युधिष्ठिर की जगह दुर्योधन को हस्तिनापुर का युवराज बना देते हैं। कहानी सबके सामने है कि पुत्र मोह में धृतराष्ट ने न सिर्फ भीष्म, दोर्ण, कृपाचार, कर्ण और अवथाना जैसे योद्धा खोए बल्कि हस्तिनापुर तक खो दिया। भारत की राजनीति में तेजी से गायब हो रही कांग्रेस के लिए सोचना जरूरी है लेकिन सवाल तो यही है कि पार्टी में सोचेगा कौन? खासकर तब जब पुत्र मोह में सोनिया ने खुद का ही बलिदान दे दिया है…..

नोट- यहां राहुल गांधी की दुर्योधन से तुलना नहीं की गई है। ये सिर्फ एक उदाहरण के तौर पर बताया गया है

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