नरसिम्हा राव

जब मनमोहन सिंह से बोले नरसिम्हा राव: ‘कपड़े बदलकर राष्ट्रपति भवन पहुंचो..आपको वित्तमंत्री बनाया जा रहा है’

90 के दशक में भारत में कई बड़े आर्थिक बदलाव हुए। उन बदलावों को संभव बनाने में मनमोहन सिंह की अहम भूमिका रही। मनमोहन सिंह उस वक्त देश के वित्त मंत्री थे। मनमोहन सिंह को मौका देने वाले कोई और नहीं बल्कि पी वी नरसिम्हा राव थे। नरसिम्हा राव गांधी परिवार के बाहर से पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला था।  शनिवार को नरसिम्हा राव की पुण्यतिथि मनाई गई।

नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने की कहानी काफी रोचक है। ये बात उस वक्त की है जब नरसिम्हा राव राजनीतिक जीवन को अलविदा करने की पूरी तैयारी कर चुके थे। राव अपने गृह शहर हैदराबाद जाकर बसने की पूरी तैयारी कर चुके थे। हालांकि उन्होंने इंदिरा और राजीव गांधी की सरकार में अहम मंत्रालयों को संभाला था। लेकिन अब वह राजनीति से दूर रहना चाहते थे। आए दिन उनकी तबीयत खराब रहती थी। नरसिम्हा राव राजनीति से इस हद तक दूर जाना चाहते थे कि उन्होंने तत्कालीन चुनावों में भी हिस्सा नहीं लिया था।

इसी बीच भारतीय राजनीति में अहम घटना घटी। 21 मई 1991 को श्रीपेरंबदूर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। ये उस वक्त की सबसे बड़ी घटना थी। पूरी सरकार हिल गई थी। अब सोनिया गांधी के सामने सरकार और पार्टी की अहम जिम्मेदारी आ चुकी थी। उस वक्त तक सोनिया गांधी कभी भी राजनीति में सक्रिय नहीं रही थीं।

बताते हैं कि राजीव गांधी के निधन के बाद जब शोक सभाओं का दौर खत्म हुआ तो सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधान सचिव रहे पी एन हक्सर को 10 जनपथ बुलाया। सोनिया गांधी ने हक्सर से पूछा कि सरकार और कांग्रेस की कमान किसके हाथों में दी जानी चाहिए। पीएन हक्सर ने साथियों से बातचीत करने के बाद शंकर दयाल शर्मा का नाम लिया। सोनिया गांधी भी इस नाम पर राजी हो गईं।

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जब शंकरदयाल शर्मा को इस बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि पार्टी के इस फैसले से वह बहुत सम्मानित महसूस कर रहे हैं लेकिन वह ये भी जानते हैं कि अब उनका स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा। शंकरदयाल शर्मा ने कहा मैं पीएम पद के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा इसलिए मैं चाहता हूं कि पार्टी किसी और को इस जिम्मेदारी के लिए चुने। सोनिया गांधी और दूसरे नेताओं के सामने फिर से वही सवाल था कि प्रधानमंत्री की कमान किसके हाथों में सौंपी जाए।

दूसरा नाम पीवी नरसिम्हा राव का सुझाया गया। सोनिया गांधी हालांकि इस नाम पर कुछ खास तैयार नहीं थीं। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त देश की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। रुपया काफी कमजोर था, भारत के पास तेल खरीदने के पैसे नहीं बच रहे थे। भारत के पास इतना ही पैसा बचा था जिससे सात दिन का तेल खरीदा जा सके। भारत का सोना विदेशी बैंकों में गिरवी पड़ा हुआ था। ऐसे में सोनिया गांधी चाहती थीं कि एक ऐसा व्यक्ति पीएम बने जो अर्थशास्त्र का जानकार हो और देश को आर्थिक संकट से निकाल सके।

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हालांकि बाद में उन्हें नरसिम्हा राव के नाम पर ही मुहर लगानी पड़ी। लेकिन इसके बाद जो हुआ वो इतिहास बन गया। नरसिम्हा राव कई अहम मंत्रालयों को संभाल चुके थे। लेकिन उन्हें वित्त मंत्रालय संभालने का कोई अनुभव नहीं था। ऐसे में  उन्होंने वित्त मंत्रालय के लिए मनमोहन सिंह का चयन किया। उन दिनों मनमोहन सिंह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की देखभाल कर रहे थे। मनमोहन सिंह कोई राजनेता नहीं थे, वो एक सरकारी अधिकारी थे। हालांकि सभी जानते थे कि वो अर्थशास्त्र के अच्छे जानकार हैं। नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को फोन किया और कहा कि आप दफ्तर में क्या कर रहे हैं….घर जाएं और कपड़े बदलकर फौरन राष्ट्रपति भवन पहुंचे..आपको देश का वित्त मंत्रालय बनाया जा रहा है। मनमोहन सिंह अर्थशास्त्र के बेहतरीन जानकार थे। उन्होंने वैसा ही किया जो उनसे कहा गया।

पद संभालने के तुरंत बाद ही मनमोहन सिंह ने सुधार के लिए बिल तैयार किया और संसद में पेश किया। संसद में बिल पेश करते हुए उन्होंने कहा ‘दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ पहुंचा है’। ये वक्त था आर्थिक सुधारों का। भारत ने खुले बाजार की नीतियों को अपनाया। कुछ ही दिनों के अंदर बदलाव दिखने लगे। भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर हो चुकी थी। विदेशी निवेश आना शुरू हो गया था।

ये नरसिम्हा राव की हिम्मत ही थी कि उन्होंने वित्त मंत्रालय जैसी अहम भूमिका एक नौकरशाह को सौंपी और मिसाल कायम कर दी। आर्थिक सुधारों के लिए जितनी तारीफ मनमोहन सिंह की होनी चाहिए उतनी ही तारीफ नरसिम्हा राव की भी। नरसिम्हा राव की छूट और भरोसे की वजह से ही मनमोहन सिंह इस तरह से काम कर पाए।

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हालांकि नरसिम्हा राव का नाम बाद में हर्षद मेहता घोटाले में भी जुड़ा। पहली बार टीवी पर किसी प्रधानमंत्री के बारे में ये कहा गया था कि उसे एक करोड़ की घूस दी गई। इन सब के बावजूद ये आरोप कभी साबित नहीं हुए। नरसिम्हा राव के राजनीतिक करियर को भारतीय अर्थव्यवस्था में अहम योगदान के तौर पर याद किया जाएगा।

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