देश का वो राष्ट्रपति जिसने शादी के कार्ड पर लिखवायाः तोहफे लाना मना है!

देश का वो राष्ट्रपति जिसने शादी के कार्ड पर लिखवायाः तोहफे लाना मना है!

26 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति बने। भारत के इतिहास में राजेंद्र प्रसाद ही एक मात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे जिनका कार्यकाल 12 तक साल का रहा।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद गांधी जी की विचारधारा से प्रभावित थे। हमेशा सादगी जिंदगी गुजारने चाहते थे। उनके घर पर एक नौकर था लेकिन वह अपने सारे काम खुद ही करना पसंद करते थे।

उनकी जिंदगी की कई घटनाएं उनके चरित्र के बारे में बताती हैं। एक बार राजेंद्र प्रसाद को जेल जाना पड़ा। कारावास का समय कम नहीं था…उन्हें अपनी जिंदगी के अगले तीन साल जेल में ही गुजारने थे। लेकिन इस दौरान उन्होंने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की। घर से कोई मिलने आता तो वह घर वालों के हाल चाल जानने में लग जाते…जेल में रहते हुए उनकी सबसे बड़ी चिंता थी उनकी पोती…उनकी पोती के पैर में उन दिनों गंभीर चोट लगी थी। घर से कोई भी आता तो पूछताछ शुरू कर देते…पैर अब कैसा है? दवा चल रही है या नहीं? हकीम जी ने क्या कहा…वह हर बात जानना चाहते थे…

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कभी अपने पोते-पोती को भी पता नहीं लगने दिया कि वह राजनीति से जुड़े हुए हैं। जानकार बताते हैं कि प्रसाद की पत्नी राजबंसी देवी अपने घर के बच्चों को सिर्फ ये बताती थी कि ये तुम्हारे दादा हैं…लेकिन आखिर दादा हैं कौन…वह ये बात किसी को बताना ही नहीं चाहती थीं। पति की आदतें अब उनके जीवन का भी हिस्सा बन गई थीं।

डॉ. प्रसाद के जमाने में राष्ट्रपति की सैलेरी 10 हजार तय की गई। लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति ने सैलेरी का महज 50% हिस्सा लेना मंजूर किया। डॉ.राजेंद्र प्रसाद का मानना था कि उनकी ज़रूरतें इतनी नहीं हैं कि 10 हजार सैलेरी ली जाए। रिटायरमेंट के कुछ दिनों पहले उन्होंने अपनी सैलेरी में फिर कटौती की…10 हजार के बजाय अब 2500 रुपये लेना मंजूर किया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद हमेशा घर में बच्चों से घिरे रहना पसंद करते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि घर में खाना तभी खाया जाए जब सारे बच्चे स्कूल से लौट आएं।

राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्हें कई बार बड़े और महंगे तोहफे देने की कोशिश की गई…लेकिन डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने कभी किसी भी तोहफे को कुबूल नहीं किया… हालांकि उन्हें एक शौक था जब भी कोई बड़ी हस्ती भारत आती तो वह उनके ऑटोग्राफ लेकर अपने पास रख लेते।

डॉ. प्रसाद का फैमिली बैकग्राउंड काफी संपन्न रहा। ऐसे में वह उस समय भी कार खरीदने की हैसियत रखते थे। जो उन्होंने खरीदी भी लेकिन लोगों ने इस बात की निंदा करनी शुरू कर दी। राष्ट्रपति की सैलेरी में गाड़ी कैसे आएगी…सैलेरी भी इतनी नहीं है….डॉ.राजेंद्र प्रसाद के कानों तक जैसी ही ये बातें पहुंची तो उन्होंने गाड़ी वापस कर दी…

देश के पहले राष्ट्रपति अपनी खुद्दारी के लिए जाने जाते थे। जब उनकी पोती की शादी हुई तो शादी के कार्ड पर खास तौर से लिखवाया गया था… तोहफे लाना मना है…

डॉ. प्रसाद के घर का एक रिवाज था। जब भी किसी लड़की की शादी होती तो उसे तोहफे में साड़ियां दी जाती थीं… डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बेटियों की जब शादी हुई तो उन्होंने अपने हाथ से तैयार साड़ियां तोहफे में दी। ये एक बेहद खुबसूरत तोहफा था…साड़ियां तैयार करते वक्त शायद ही उन्होंने कभी सोचा होगा कि ये काम उनके करने लायक नहीं है….उनकी ये सादगी ही थी जिसने उन्हें बाकी नेताओं से अलग कर दिया।

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डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब बीमार पड़े तो उन्होंने साफ कह दिया….मैं जहां से दिल्ली आया हूं, वहां फिर वापस जाऊंगा…उनके लफ्जों से साफ था कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने गांव लौंटना चाहते थे जहां उनका मन हमेशा से बसता था…उनकी मर्जी के अनुसार उन्हें बिहार के सदाकत आश्रम ले जाया गया। 28 फरवरी 1963 में उन्होंने पटना में आखिरी सांस ली…इसी के साथ खत्म हुआ डॉ.राजेंद्र प्रसाद का दौर…

 

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