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घाना के जंगलों में बनी 250 लोगों की टीम, कैसे बनी दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसियों में एक RAW

रामेश्वर नाथ काव के बारे में आप जानते हैं? नहीं, चलिए कोई बात नहीं… इन दिनों Raazi फिल्म काफी चर्चा में है। Raazi को देखने के बाद आप अंदाजा लगा पाएंगे कि कैसे कुछ लोग देश के लिए अपना सबकुछ छोड़ देते हैं। लेकिन Raazi तो सिर्फ एक जासूस की कहानी है। जबकि देश के पहले Super Spy या खुफिया एजेंसी रॉ(RAW) के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव की कहानी तो बहुत कम ही लोग जानते हैं।

देश के लिए सुपर जासूस थे। उन्होंने पूरी दुनिया में जासूसों का एक बड़ा नेटवर्क स्थापित कर रखा था। इस नेटवर्क का संचालन वो खुद ही किया करते थे। आरएन काव के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी जिंदगी को इतनी खुफिया तरीके से जीते थे कि उन्होंने कुछ ही बार अपनी तस्वीर खींचवाई होगी।

रामेश्वर नाथ काव का जन्म 1918 में बनारस में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एमए किया था। इसके बाद वो साल 1939 में इंडियन पुलिस सर्विसेज़ (IPS) में चले गए। भारत को आज़ादी मिले अभी कुछ ही दिन हुए थे। इस बीच आरएन काव ने इंटेलीजेंस ब्यूरो(Intelligence Bureau- IB) के लिए काम करना शुरू कर दिया। ब्यूरो की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने 19वीं शताब्दी में की थी।

1957 में घाना(Ghana) जैसे देशों को भी आज़ादी मिल रही थी। इस बीच कई छोटे-छोटे देश भी अलग देश के तौर पर अस्तित्व में आ रहे थे। ऐसे में जवाहर लाल नेहरू ने महसूस किया कि हमारे देश की सुरक्षा को पुख्ता रखने के लिए हमें एक इंटेलीजेंस एजेंसी की स्थापना करनी चाहिए।

एक ऐसी संस्था की ज़रूरत महसूस की जाने लगी जो लीग से हटकर देश की सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करे। इसी कड़ी में जवाहर लाल नेहरू ने आरएन काव को घाना भेज दिया। आरएन काव को आदेश दिए गए थे कि, वो एक ऐसी संस्था का निर्माण करें जो हर खतरे की पहले ही जानकारी सरकार तक पहुंचा दे।

ऐसे में लगभग एक साल तक आरएन काव घाना में रहे। उन्होंने वहां पर फॉरेन सर्विस रिसर्च ब्यूरो(Foreign Service Research Bureau) की स्थापना की। हालांकि कुछ सालों के बाद भारत का चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हो गया। उस वक्त देश की सुरक्षा से जुड़ी सभी अहम जानकारियों के लिए भारत सरकार पुरानी संस्थाओं पर ही पूरी तरह से निर्भर थी। जबकि ये संस्थाएं अब इतनी प्रभावी नहीं रह गई थीं।

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साल 1968 की शुरुआत हो चुकी थी। उन दिनों प्रधानमंत्री पद पर जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी थीं। ऐसे में उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो(Intelligence Bureau- IB) को दो हिस्सों में बांटने का निर्णय लिया। उन्होंने आरएन काव को खास तौर पर काम दिया कि वो दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों के कार्य शैली का अध्ययन करें। इसके साथ ही उन्हें आदेश दिया गया कि रिसर्च के आधार पर एक रिपोर्ट बनाएं।

भारत का संविधान

ऐसे में जिस संस्था के लिए रामेश्वर नाथ काव काम कर रहे थे, उन्होंने उसका नाम रिसर्च एंड एनालिसिस विंग(Research and Analysis Wing- RAW) रखा। रामेश्वर नाथ काव के साथ 250 लोग उस वक्त रिसर्च पर काम कर रहे थे। रिसर्च पूरी होने के बाद 21 सितंबर 1968 में दो संस्थाओं की स्थापना IB (Intelligence Bureau) और Raw (Research and Analysis Wing) के नाम से हुई।

Raw एक साल के अंदर ही पूरी दुनिया में फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई इलाकों में संस्था के एजेंट खुफिया तौर पर काम करने लगे थे। इन सभी लोगों को रामेश्वर नाथ काव ने खुद ट्रेनिंग दी थी। इसलिए इन लोगों को ‘कावबॉय’ भी कहा जाता था।

इसके बाद Raw ने सबसे अहम काम साल 1971 के दौरान किया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान(बाद में बांग्लादेश) में लोगों को मारना शुरू कर दिया था। अल्पसंख्यक भागकर हिन्दुस्तान में शरण लेने को मजबूर हो रहे थे। आरएन काव ने उस दौरान ही कह दिया था कि पाकिस्तान जल्द ही पूर्वी हिस्से में मिलिट्री ऑपरेशन शुरू करेगा। काव ने जैसा कहा था ठीक वैसा ही हुआ।

ऐसे में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रामेश्वर नाथ काव को जिम्मेदारी दी कि वो एक ऐसा प्लान बनाएं जिससे बांग्लादेश में फंसे लोगों की मदद हो सके। इसके बाद काव ने पूर्वी पाकिस्तान और भारतीय सीमाओं पर अपने एजेंटों को सक्रिय कर दिया। वो हर छोटी बड़ी जानकारी काव तक पहुंचाते थे। इसके बाद आरएन काव के कहने पर पाकिस्तान से आने वाली फ्लाइट्स को भारत के ऊपर से उड़ने के लिए भी प्रतिबंधित कर दिया गया। ऐसे में पाकिस्तान अपनी सेना को विमानों के जरिए पूर्वी पाकिस्तान तक नहीं भेज पा रहा था।

मार्च 1971 में भारत में शरणार्थी संकट पैदा हो चुका था। लोग बड़ी संख्या में सीमा पारकर भारत में आने को मजबूर हो रहे थे। ऐसे में आरएन काव ने अपने नेतृत्व में  पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों को ट्रेनिंग दी ताकि वो सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दें।

लगभग एक लाख नागरिकों की इस सेना को मुक्ति बाहिनी का नाम दिया गया। आठ महीने तक ये लोग पाकिस्तानी सेना से लड़ते रहे। बाद में पाकिस्तानी सेना को इन लोगों के आगे झुकना पड़ा और एक अलग देश बांग्लादेश अस्तित्व में आ गया।

बांग्लादेश की सरकार बन चुकी थी और सत्ता की कमान प्रधानमंत्री शेख मुजिबुर रहमान के हाथों में थी। बांग्लादेश सरकार ये मान चुकी थी कि संकट टल गया है। लेकिन ऐसा नहीं था। आरएन काव को जानकारी मिली की पाकिस्तानी सेना फिर से बांग्लादेश में तख्ता पलट करने की फिराक में है। ऐसे में काव फौरन ढाका के लिए रवाना हो गए। उन्होंने मुजिबुर रहमान से लंबी मुलाकात की। पूरी मुलाकात के दौरान वो मुजिबुर रहमान को ये बात समझाते रहे कि खतरा अभी टला नहीं है।

मुजिबुर रहमान जो सत्ता मिलने से काफी खुश थे वो ये बात किसी तरह से मानने को तैयार ही नहीं हुए। रामेश्वर नाथ काव अपने देश लौट आए लेकिन कुछ हफ्तों बाद वही हुआ जिसका उन्हें डर था। मुजिबुर रहमान के घर पर पाकिस्तानी सेना ने हमला कर दिया और पूरे परिवार के साथ उनकी हत्या कर दी।

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रामेश्वर नाथ काव उन लोगों में से एक थे जो अपने देश के साथ ही सहयोगी देशों की मदद के लिए भी हमेशा आगे रहते थे। आरएन काव, इंदिरा गांधी के बेहद भरोसेमंद व्यक्ति माने जाते थे। इसलिए जब 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आई तब रामेश्वर नाथ काव को इंदिरा गांधी का सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया। आरएन काव इस देश के छोटे-बड़े हर राज़ को जानते थे। उन्हें इस चीज़ का भी एहसास था कि ये बातें किसी के सामने खुलनी नहीं चाहिए इसलिए उन्होंने कभी अपने बारे में कुछ लिखा नहीं। इतना ही नहीं वो लोगों के सामने भी कम ही आते थे और इंटरव्यू देने से भी बचा करते थे।

रामेश्वर नाथ काव- दाईं ओर, Source: BBC

RAW की स्थापना करने वाले, पाकिस्तान को तोड़ने वाले और बांग्लादेश की मदद करने वाले भारत के इस पहले Super Spy रामेश्वर नाथ काव ने साल 2002 में 84 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसे में Raazi फिल्म ऐसे ही जाबाजों की एक कहानी है, तो अब जब आप Raazi फिल्म को देखें तो रामेश्वर नाथ काव को जरूर याद करें।

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