चर्चिल की भविष्यवाणी, पटेल-जिन्ना की लड़ाई और माउंटबेटन का डर, क्या हुआ उन 60 दिनों में?

चर्चिल की भविष्यवाणी, पटेल-जिन्ना की लड़ाई और माउंटबेटन का डर, क्या हुआ उन 60 दिनों में?

भारत को लंबे संघर्ष के बाद आजादी मिल रही थी। इसलिए इसकी तैयारी भी लगभग 3 महीने पहले से शुरू हो गई थी। इन दिनों सभी की चिंताएं अलग-अलग थीं। बंटवारा शांतिपूर्ण हो जाए इसके लिए कई बैठकें आयोजित की जा रही थीं। जून का महीना चल रहा था। गर्मी अपने चरम पर थी। लेकिन अब इस गर्मी का असर इन बैठकों में भी दिखने लगा था।

जून 1947 के उन्हीं दिनों में एक बैठक का आयोजन किया गया था। इसमें पटेल, जिन्ना, नेहरू, माउंटबेटन समेत सभी बड़े नेता मौजूद थे। ये वो दौर था जब देश के कई हिस्सों में हिंसा भड़क चुकी थी। बैठक शुरू हुई… और अचानक जिन्ना और पटेल आपस में भिड़ गए। इसी दौरान सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जिन्ना से ऊंची आवाज़ में सबके सामने कह दिया कि आप चुप रहें और सिर्फ अपने लोगों के बारे में सोचने का काम करें। माहौल को खराब होता देख माउंटबेटन ने बीच में ही बैठक रोक दी।

आप पढ़ रहे हैं ‘द डेमोक्रेटिक बजर’ की खास सीरीज ‘1947 बंटवारा’

कुछ दिनों के बाद एक बार फिर बैठक बुलाई गई। इस बैठक में भी वही सारे नेता मौजूद थे। लेकिन इस पूरी बैठक में जिन्ना किसी से कुछ भी नहीं बोले। न उन्होंने किसी से सहमति दिखाई और न नाराज़गी। वह शायद पिछली बैठक में हुए अपने अपमान को अब तक भूल नहीं पाए थे। वह बस चुपचाप एक कागज़ में कुछ बनाते रहे। कई बार लोगों की नज़र जिन्ना पर गई कि आखिर वह उस कागज़ पर क्या कर रहे हैं लेकिन किसी की भी पूछने की हिम्मत नहीं थी।

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बैठक खत्म हुई लेकिन जिन्ना अपने साथ लिए कागज वहीं भूल कर चले गए। ये कागज माउंटबेटन के एक सहयोगी ने माउंटबेटन को जाकर दे दिया गया। पर्चे पर जिन्ना ने सत्ता, ताकत जैसे शब्द लिखे हुए थे। इसके साथ ही कोई चित्र बनाने की कोशिश की गई थी जिसे देखने से लग रहा था कि चित्रकार को सत्ता हासिल करने की जल्दी थी। माउंटबेटन समझ चुके थे कि जिन्ना अब बंटवारा होने में कोई देरी नहीं चाहते, वह जल्द से जल्द सत्ता हथियाना चाहते हैं।

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ये अंदाजा सही भी था क्योंकि उन दिनों जब दूसरे नेता इस बात की कोशिश कर रहे थे कि देश में हिंसा न भड़के औऱ शांति से बंटवारा हो जाए उस दौर में भी जिन्ना को अपने सीगार के पैकेट की फिक्र सता रही थी। इस बात को लेकर जिन्ना ने युनूस नाम के एक आदमी को चिट्ठी भी लिखी थी। उन्होंने लिखा था ‘ मेरा सीगार का पैकेट नहीं मिल रहा है, वह कहीं गायब हो चुका है उसका पता लगाओ।’ इन बातों के सामने आने पर ही माउंटबेटन ने मान लिया था कि जिन्ना को अब इस देश से कोई मतलब नहीं है। अब माउंटबेटन इस कोशिश में लगे थे कि किसी तरह की कोई हिंसा न हो।

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लेकिन माउंटबेटन का डर सच साबित हो गया। दोनों देशों का बंटवारा हो पाता उससे पहले ही हिंसा भड़क गई। मांउटबेटन गांधी के पास पहुंचे। उन्होंने कहा कि मैं फौज की मदद से पंजाब को संभाल लूंगा लेकिन बंगाल के लिए मुझे आपकी मदद चाहिए। दोनों राज्यों में हालात बिगड़ते जा रहे थे इसलिए गांधी ने माउंटबेटन की बात को समझते हुए फौरन कोलकाता जाने का फैसला किया। गांधी का माउंटबेटन बहुत आदर करते थे। ये व्यक्तिगत रिश्ता था।

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इसी बीच जिन्ना ने भारत छोड़ने की तैयारी कर ली थी। जिन्ना ने वो कपड़े पहने थे जो वह आमतौर पर नहीं पहनते थे। चूड़ीदार और शेरवानी। उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने के लिए बहुत कम लोग आए थे। हवाई जहाज पर चढ़ने के बाद जिन्ना ने पलटकर एक बार दिल्ली को देखा और पास खड़े एक व्यक्ति से कहा ये आखिरी बार है जब मैं दिल्ली को देख रहा हूं। पूरी फ्लाइट में जिन्ना किसी से कुछ नहीं बोले बस अखबार के पन्ने पलटते रहे।

दूसरी तरफ गांधी जी हिंसा को रोकने के लिए कोलकाता पहुंच चुके थे। बंगाल के पीएम सोहरावर्दी से उन्होंने वादा लिया था कि हिन्दुओं के साथ कोई अन्याय नहीं होगा और सोहरावर्दी के साथ गांधी झुग्गी में रहेंगे। वही से गांधी जी कोलकाता के हालातों को काबू करते थे।

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कोलकाता में कुछ समय के बाद गांधी हैदरी हाउस में शिफ्ट हो गए। हैदरी हाउस तक जाते-जाते गांधी पूरे रास्ते लोगों को एकता का पाठ पढ़ाते रहे। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान पहुंच चुके जिन्ना अपने पहले भाषण को तैयार करने में लगे थे।

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आखिरकार 14 अगस्त की रात आ गई। लोगों को खुशी थी लेकिन इस आजादी की क्या कीमत चुकानी होगी इस बात का भी डर था। उस रात दिल्ली में बारिश हो रही थी। रात को 12 बजे नेहरू ने अपना भाषण दिया और भारत के पीएम के तौर पर शपथ ली। पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा था लेकिन वो व्यक्ति जिसने पूरी जिंदगी आजादी के लिए लड़ाई लड़ी वह हैदरी हाउस में सो रहे थे। उस दिन देश भले ही अपने भविष्य के लिए जग गया था लेकिन बंटवारे के साथ मिली ये आजादी अधूरी ही थी।

15 अगस्त को गांधी ने उपवास रखकर आजादी का स्वागत किया। अंग्रेजी अखबार के एक पत्रकार पर गांधी ने कहा था कि मेरे अंदर की ताकत कमजोर पड़ गई है। ये बयान गांधी ने क्यों दिया इसके आज भी अलग-अलग मतलब निकाले जाते हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने आजादी के दौरान कहा था कि भारत टूट जाएगा। इसके टूकड़े होते रहेंगे। वह हिन्दुस्तान को आजाद नहीं करना चाहते थे। लेकिन आज भी हमारा देश चर्चिल की भविष्यवाणी को झूठला कर आगे बढ़ रहा है

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