त्रिपुरा

मोदी-शाह ने दिल्ली और गुजरात में ऐसा क्या सीखा जो त्रिपुरा में वामपंथ धराशायी हो गया?

त्रिपुरा के चुनाव में जो कुछ भी हुआ वो किसी अजूबे से कम नहीं था। 5 साल पहले जो पार्टी 1.5 वोट प्रतिशत के साथ अपने 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त करा चुकी थी, वो पार्टी 43 फीसदी से ज्यादा वोट प्रतिशत के साथ 35 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाने जा रही है, लेकिन ऐसा हुआ कैसे? अगर माणिक सरकार भारत के सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री हैं, तो उनकी सरकार को जनता ने चुनाव में क्यों हरा दिया? भाजपा ने कैसे 0-35 सीटों का सफर एक बार में ही तय कर लिया? क्या हिन्दुत्व की आंधी त्रिपुरा में काम की? इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए हमें 2014 लोकसभा चुनाव से लेकर दिल्ली, असम और गुजरात विधानसभा चुनाव की कुछ बारीकियों के बारे में समझना पड़ेगा। तो इन सभी पहलुओं को एक-एक कर समझते हैं।

क्यों हारी माणिक सरकार?

ज्यादातर सभी एक्जिट पोल ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि त्रिपुरा में सीपीआई(एम) का हारना तय हैं लेकिन भाजपा गठबंधन का भारी बहुमत से सरकार बनाना ये भविष्यवाणी किसी करिशमे से कम नहीं था। माणिक सरकार की हार के मुख्य कारण

  1. सिर्फ ईमानदार मुख्यमंत्री ही काफी नहीं है- माणिक सरकार के करीब 3 दशक के राज्य में भले ही उनपर कोई भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे लेकिन उनकी पार्टी पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। सरकार निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार पर चुप रही।

  2. मनमोहन सिंह बन गए माणिक सरकार- कई जानकारों का कहना है कि माणिक सरकार का अपने पार्टी के कई मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर चुप्पी साध लेना उनके और उनकी सरकार के खिलाफ चला गया। माणिक सरकार का पार्टी और सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार पर नरम रवैया उनकी व्यक्तिगत साख पर भारी पड़ गया।

  3. भाई-भतीजावाद- वामपंथी विचारधारा भले ही पुंजीवाद के खिलाफ और समाजवाद की वकालत करती हो लेकिन त्रिपुरा में माकपा पार्टी पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगे। नेता अपने काम के लिए कानून और व्यवस्था को अपने सुविधा अनुसार इस्तेमल करते रहे।

  4. रोजगार- त्रिपुरा में किसी भी बड़ी कंपनी और उद्योग का न होना बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण रहा। नौजवानों को शिक्षा और रोजगार के लिए अपने शहर को छोड़ना पड़ता है। बेरोजगारी को लेकर नोजवानों में गुस्सा सरकार के खिलाफ गया।

  5. हवा का रूख नहीं भांप पाए माणिक- माकपा की तरफ से चुनाव का एकमात्र मुद्दा माणिक सरकार की ईमानदार छवि रही, जबकि राज्य का युवा निचले स्तर पर चल रहे भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से नाराज हो चुका था। माणिक सरकार पार्टी विरोधी हवा को भांप ही नहीं पाए, वहीं कांग्रेस और टीएमसी माणिक सरकार विरोधी लहर का फायदा नहीं उठा पाई।

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क्या थी संग और मोदी सरकार की रणनीति?

  1. क्रिश्चिन मीशनरी के खिलाफ मुहीम- मुस्लिम तुष्टीकरण का विरोध करने वाली भाजपा त्रिपुरा में क्रिश्चिन मिशनरीज का सख्त विरोध करती रही। ईसाई धर्मातरण को लेकिर भाजपा और संघ ने कड़ा रूख अपनाया। संघ पिछले काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विरोध करती रही है। संघ और पार्टी की इस विरोध का नतीजा रहा कि त्रिपुरा में भी हिंदुत्व एक मुद्दा बन गया।

  2. भारत से अलग नहीं है नॉर्थ ईस्ट- मोदी सरकार लगातार नॉर्थ ईस्ट के लोगों में विश्वास पैदा करती रही है कि नॉर्थ इस्ट भारत का ही हिस्सा है। दरअसल नॉर्थ ईस्ट के लोगों की सालों से शिकायत रही है कि भारत के दूसरे राज्यों में उनकी उपेक्षा होती है। मोदी सरकार ने इसी उपेक्षा को लेकर काम किया। गृह मंत्रालय की तरफ से समय-समय पर नॉर्थ ईस्ट के लोगों को आश्वासन दिया जाता रहा है। भाजपा की तरफ से हर 15 दिन में एक बार किसी मंत्री को नॉर्थ ईस्ट भेजा जाता है। इससे नॉर्थ ईस्ट के लोगों का भाजपा से जुड़ाव दूसरे पार्टियों की तुलना कहीं ज्यादा बढ़ा है।

नरेन्द्र मोदी

कैसे जीती भाजपा?

  1. त्रिपुरा के चाणक्य की तलाश- 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान जब नरेन्द्र मोदी वाराणसी में रैली कर रहे थे तभी त्रिपुरा के चाणक्य की तलाश पुरी हो चुकी थी। दरअसल त्रिपुरा में भाजपा की जीत के पीछे जिस शख्श का नाम सामने आ रहा है वो है सुनील देवधर। सुनील देवधर 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी की रैली का मैनेजमेंट संभाल रहे थे। लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद अमीत शाह ने उन्हें त्रिपुरा जाने को कहा। दरअसल उनके शानदार मैनेजमेंट के चलते संघ और शाह की तरफ से उन्हें त्रिपुरा चुनाव की कमान शौंप दी गई थी।

  2. 20 सीटों के लिए गठबंधन- त्रिपुरा की 60 सीटों में से 20 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। इन 20 सीटों के लिए भाजपा ने आईपीएफटी से गठबंधन किया। भाजपा ने इन 20 सीटों पर अपने 11 उम्मीदवार खड़े किए।

  3. 72 फीसदी आबादी के लिए बदली रणनीति- त्रिपुरा में 72 फीसदी आबादी बंगालियों की है। कांग्रेस और टीमएसी की निगाहें इन्हीं 72 फीसदी आबादी पर टिकी थी लेकिन ये 72 फीसदी आबादी की एक बड़ी संख्या ने भाजपा के लिए वोट किया, इनमें नोजवान बड़ी संख्या में शामिल थे।

  4. ऐसा सिर्फ संघ और भाजपा ही कर सकती है- त्रिपुरा में 72 फीसदी बंगाली हैं, राज्य में ज्यादातर लोग बंगाली बोलते हैं। त्रिपुरा में भाजपा और संघ की तरफ से सुनील देवधर को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। महाराष्ट्र के रहने वाले सुनील देवधन ने लोगों से मिलने घुलने के लिए बंगाली सीखी। बंगाली में लोगों से संवाद करना शुरू किया। संघ के कई कार्यकर्ताओं ने भी त्रिपुरा में लोगों से जुड़ने के लिए बंगाली भाषा सीखी।

  5. मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों का तांता- भाजपा की तरफ से राज्य में चुनाव प्रचार का कमान प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्रियों तक को सौंपा गया। चुनाव को जंग की तरह लड़ा गया।

  6. नैजवानों को मिला मौका- भाजपा और संघ की तरफ से त्रिपुरा के नौजवानों को टारगेट किया गया। नौजवानों से प्रचार कराया गया और नौजवानों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया गया।

त्रिपुरा में भाजपा की जीत के चाणक्य सुनील देवधर

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दिल्ली से क्या सीखे मोदी और शाह?

दिल्ली चुनाव से ठीक पहले भाजपा और संघ के बीच बढ़ती दूरियों की खबर सामने आई। ये अफवाह और तेज हो गई जब अमित शाह की तरफ से किरण बेदी का नाम मुख्यमंत्री उम्मीदवार के लिए घोषित किया गया। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक शाह का फैसला संघ के फैसले के खिलाफ था। इस चलते संघ ने दिल्ली चुनाव में भाजपा का साथ छोड़ दिया। खबरें ये भी आई कि संघ के ज्यादा तर कार्यकर्ताओं ने भाजपा के खिलाफ वोट किया, जिसके चलते पार्टी 3 सीटों पर सिमट गई, यहां तक की किरण बेदी भी अपनी सीट नहीं बचा पाईं। माना गया कि संघ ने भाजपा को अपनी ताकत का अंदाजा कराने के लिए भाजपा को हराया। यही हाल बिहार चुनाव में भी कुछ हद तक देखने को मिला, जिसके बाद भाजपा और संघ दोनों साथ मिलकर काम करते नजर आए। इसका असर असम में देखने को मिला।

त्रिपुरा में संघ के करीब 50 हजार कार्यकर्ता सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे थे। संघ ने अपने कार्यकर्ताओं को आदिवासी इलाकों में भेजा, जिसका नतीजा चुनाव परिणाण में देखने को मिला।

गुजरात की सीख का क्या मिला फायदा?

पार्टीदारों और ग्रामीणों के गुस्से के बीच गुजरात चुनाव भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी। पार्टी को कई सीट पर भारी नुकसान का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी को संघ की बदौलत राज्य में जीत मिली। संघ ने गुजरात में रह रहे आदिवासियों के साथ मेलजोल बढ़ाया, मूलभूत सुविधाएं दी। इसका नतीजा ये रहा कि जिन आदीवासी वोटबैंक को कांग्रेस अपना मान रही थी वो वोटबैंक भाजपा के पाले में चला गया। इसके चलते भाजपा को जितना नुकसान पार्टीदारों से नहीं हुआ उससे ज्यादा फायदा आदिवासी वोटबैंक से हो गया।

नरेन्द्र मोदी

संघ और भाजपा ने इसी रणनीति को त्रिपुरा में भी लागू किया, जहां आदिवासी वोटबैंक को माकपा से तोड़ कर भाजपा की तरफ मोड़ दिया गया।

असम चुनाव का त्रिपुरा पर असर

असम में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी अल्पसंख्यकों की है, ऐसे में भाजपा का खुद के बल पर वहां सरकार बनाना किसी करिश्मे से कम नहीं था। असम की उस जीत ने संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगा दी। संघ और भाजपा की तरफ से त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, कैरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ा दी गई।

संघ संजीवनी है भाजपा की

त्रिपुरा की जीत कई चुनावों की सीख है। भाजपा ने त्रिपुरा में चुनाव जीत कर इतिहास रच दिया है। जीत का सहरा मोदी और शाह के सिर मढ़ा जा रहा है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है संघ की बदौलत भाजपा को असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में जीत मिली। दिल्ली और उसके बाद बिहार में मिली सीख को शाह और मोदी ने समय रहते समझ लिया। संघ के कार्यकर्ताओं की ही देन है जो केरल और कर्नाटक में कांग्रेस और लेफ्ट की सांसें फुलने लगी हैं।

संघ के कार्यकर्ता अब अपनी ताकत कर्नाटक में झोंक रहे हैं, ऐसे में पार्टी की निगाहें अब कर्नाटक पर टिक गई हैं, जहां जीत के लिए भाजपा और संघ ने सालों पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है।

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Shridhar Mishra

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