संविधान

भारत के संविधान के लिए जब मोहम्मद अली जिन्ना से लड़ गया एक ‘मुसलमान’

अंग्रेजों से लंबी लड़ाई के बाद भारत की आज़ादी का सपना तो पूरा हो रहा था। लेकिन एक ऐसे मुल्क का क्या भविष्य होता जिसमें कोई नियम कानून ही न हों। इसलिए भारत का संविधान बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत की गई थी।

दरअसल साल 1857 में हुई क्रांति के दौरान संविधान बनाने की भी कोशिश की गई थी। बागी सिपाहियों ने जहां एक तरफ भारत को आज़ाद मुल्क बनाने की मुहिम छेड़ दी थी, तो वहीं भारत के भविष्य के लिए संविधान बनाने की भी प्रक्रिया को शुरू किया गया था। लेकिन अफसोस जिस तरह से वो क्रांति दबा दी गई उसी तरह से संविधान बनाने की उस मुहिम का भी अंत कर दिया गया।

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संविधान बनने की प्रक्रिया को भले ही दबा दिया गया हो लेकिन अब भारतीयों के दिल में संविधान की चाह जाग चुकी थी। हिन्दुस्तान के लोग एक ऐसा संविधान और ऐसा कानून चाहते थे, जो पूरे मुल्क के लिए एक समान हो। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो किसी भी कीमत पर इसे पूरा नहीं होने देना चाहते थे।

अंग्रेज़ों के हाथ से सत्ता जा रही थी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन काफी कमजोर पड़ चुका था। उसके पास इतना पैसा नहीं था कि भारत पर कब्ज़ा जारी रखा सके। ऐसे में वो भी भारत को जल्द से जल्द आज़ाद करना चाहता था। हालांकि लंबे समय से भारत पर राज करते हुए उन्हें इस देश से काफी फायदा हुआ था। इसलिए ब्रिटेन एकदम से पूरी सत्ता भारतीयों के हवाले नहीं करना चाहते था। अंग्रेज़ चाहते थे कि अब भी हिन्दुस्तान अंग्रेज़ों के मोहताज बना रहे।

1945 में ब्रिटेन में एक बड़ा बदलाव हुआ। ब्रिटेन विश्वयुद्ध भले ही जीत गया हो लेकिन प्रधानमंत्री रहे चर्चिल चुनाव हार गए। इसके बाद क्लेमेट एटली को ब्रिटेन का नया प्रधानमंत्री बनाना गया। एटली जानते थे कि अगर ज़रा सी भी ढील दी गई तो हिन्दुस्तानी सत्ता पर हावी होने के लिए नया पैतरा खोज लेंगे। इसलिए उन्होंने बिना किसी देरी के एक कमीशन भारत भेजा। इसमें अंग्रेज़ी सरकार के तीन नेताओं को हिन्दुस्तान भेजा गया ताकि भारतीय नेताओं से बातचीत कर कानून बनाया जा सके। कमीशन ने पहली बैठक शिमला में बुलाई। इस बैठक में कांग्रेस की तरफ से नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार वल्लभभाई पटेल मौजूद थे। वहीं मुस्लिम लीग से जिन्ना, सरदार निश्तर, नवाब इस्माल खान समेत दूसरे नेता भी मौजूद रहे। इस बैठक में कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि कानून हिन्दुस्तान के लोग ही बनाएं और पूरे देश के लिए एक ही कानून हो।

 

जैसे-जैसे मौलाना आज़ाद एक भारत के सपने को लेकर अपनी बात रख रहे थे, वैसे ही वैसे वो जिन्ना की आंखों में खटक रहे थे। जिन्ना को ये बात नगवार गुज़र रही थी कि कांग्रेस पार्टी जिसे वो हिन्दुओं की पार्टी मानते थे उसकी पैरवी एक मुस्लमान कैसे कर रहा है। इतना ही नहीं उन्हें ये देखकर भी काफी गुस्सा आ रहा था कि कांग्रेस का अध्यक्ष एक मुस्लमान है। मौलाना आज़ाद ने जब एक संविधान सभा के प्रस्ताव पर मोहम्मद अली जिन्ना के आगे हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया तो उन्होंने मुंह घुमा लिया। जिन्ना जो लंबे समय से पाकिस्तान बनाने का ख्वाब देख रहे थे उन्हें ये ख्वाब अब टूटता दिख रहा था।

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ये वो पहला मौका था जब अंग्रेज़ों को ये दिख गया था कि हिन्दू और मुस्लमान के मुद्दे को लेकर इस देश को अब भी बांटा जा सकता है। जिन्ना ने इसके बाद अंग्रेज़ों के सामने अपनी बात रखी। जिन्ना ने कहा कि कांग्रेस एक हिन्दू पार्टी है, ऐसे में उस पार्टी के लोगों को ये अधिकार नहीं देना चाहिए कि वह मुस्लमानों के लिए कानून बनाएं। इस बात को लेकर शिमला में हुई उस बैठक में माहौल गर्म हो गया। उस वक्त कांग्रेस की तरफ से चार लोग वहां मौजूद थे। चार में से दो मुस्लमान थे। ऐसे में जिन्ना ने उन दोनों को ही बिका हुआ मुस्लमान करार कर दिया।

बात बिगड़ती जा रही थी इस बीच में जवाहर लाल नेहरू को बोलना पड़ा। उन्होंने जिन्ना के उन अल्फाज़ों का सख्त विरोध किया। शिमला में जो ये बैठक हो रही थी उसका मकसद था कि एक देश को आज़ाद कर के सत्ता उनके हाथों दे दी जाए। शिमला की ठंड में भी उस दिन उस कमरे का माहौल गर्म हो गया। अंग्रेज़ जो काफी लंबे समय से इस बात का तोड़ निकालने की कोशिश कर रहे थे, अब जिन्ना ने उन्हें एक मौका दे दिया था। बैठक में मौजूद अंग्रेज़ मन ही मन मुस्कुरा रहे थे, उन्हें समझ आ गया था कि अगर इस देश में अब भी ब्रिटिश सरकार की धाक को जिंदा रखना है तो देश को हिन्दू और मुस्लमान के नाम पर बांटना होगा।

इसके बाद भी कमीशन की तरफ से दो बैठक आयोजित की गईं। लेकिन कुछ खास निष्कर्ष नहीं निकला। ब्रिटिश कमीशन जो लंबे समय से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिशों में लगा, था वह खाली हाथ अपने देश नहीं लौटना चाहता था। इसलिए उन्होंने फैसला किया कि हिन्दूओं के लिए अलग और मुस्लमानों के लिए अलग संविधान सभा का निर्माण किया जाए।

इसके बाद मुस्लिम लीग और कांग्रेस के रिश्ते बिगड़ते चले गए। अंग्रेज़ों ने अपनी चाल चल दी थी। भारत को बांटने का यह पहला कदम था। ये देश के नेताओं की हार थी लेकिन जिन्ना इसे अपनी जीत मान रहे थे क्योंकि वह लंबे समय से पाकिस्तान की मांग कर रहे थे। ऐसे में वह अपने सपने के बेहद करीब पहुंच चुके थे।

कुछ दिनों के बाद अंग्रेज़ी सरकार ने दोनों नेताओं के रिश्तों को सुधारने के लिए उन्हें लंदन आने को कहा। दोनों नेता वहां पहुंचे लेकिन वहां भी बात नहीं बनी। जिन्ना नेहरू के आगे झुकना नहीं चाहते थे और नेहरू भी जिन्ना को अपनी बराबरी का ओहदा देने के हक में नहीं थे।

जब कुछ भी निर्णय नहीं लिया जा सका तो नेहरू अंग्रेज़ों के घर में ही उन्हें एक धमकी देकर आ गए। उन्होंने साफ कहा कि सभी लोगों के लिए एक संविधान सभा का गठन नहीं किया गया, तो अंग्रेज़ों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू के भारत पहुंचते ही तीन दिन के अंदर संविधान सभा का गठन कर दिया गया।

इस सभा में सभी बड़े नेता मौजूद रहे। लेकिन जिन्ना और महात्मा गांधी इसमें नहीं पहुंचे। संविधान सभा का गठन तो हो गया था लेकिन जिन्ना को ये बात बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने इस सभा को हिन्दू सभा बताया और खुद इससे दूरी बनाए रखी। जहां कांग्रेसी नेता इस सभा को संविधान बनाने की तरफ पहला कदम मान रहे थे, तो वहीं जिन्ना इस सभा की मदद से देश को बांटने का सपना बुन रहे थे।

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