महात्मा गांधी की बात को काट कर, क्यों बनाया गया भारत का झंडा?

क्या आपने कभी ये सोचा है कि ये तिरंगा किसने बनाया? तिरंगे को बनाने में कितने बदलाव हुए? और तिरंगे की कहानी क्या है?

बात उस जमाने की है जब भारत में अंग्रेज़ों का शासन था। हर सरकारी इमारत पर यूनियन जैक लगा रहता था। यूनियन जैक अंग्रेज़ों के झंडे के साथ भारत की गुलामी का भी प्रतीक था। जैसे जैसे आज़ादी की लड़ाई तेज़ होती गई वैसे-वैसे एक राष्ट्रीय ध्वज की मांग भी उठने लगी। लेकिन ये आम ध्वज नहीं था। एक ऐसा झंडा चाहिए था जो पूरे देश का नेतृत्व कर सके।

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गुलामी की बेड़ियों में लिपटे भारत में कई झंडे बनाए गए। लेकिन इनमें अधिकतर झंडे किसी न किसी पार्टी से जुड़े थे। ऐसे में किसे भारतीय झंडे का दर्जा मिले ये सवाल काफी अहम था। चर्चाएं तो चल रही थीं लेकिन फैसला अब तक नहीं हुआ था। आखिरकार 31 मार्च 1921 को कांग्रेस के एक अधिवेशन में ये मुद्दा उठा। फैसला लिया गया कि भारत के लिए अलग झंडा बनाया जाए। लेकिन सवाल ये था कि झंडा बनाएगा कौन?

आखिर में एक नाम पर सहमति बनी। ये नाम था पिंगली वैंकेया का। पिंगली आज़ादी की लड़ाई में काफी सक्रिय थे और गांधी जी के पुराने मित्र भी। एंग्लो इंडियन वॉर के वक्त दक्षिण अफ्रीका में पिंगली वैंकेया की मुलाकात गांधी से हुई थी।

पिंगली वैंकेया

आंध्र प्रदेश के रहने वाले पिंगली को अब देश का झंडा बनाना था। इसके लिए उन्होंने विदेशों के कई झंड़ों का अध्ययन किया। आखिरकार उन्होंने एक झंडा बनाया जो केसरी और हरे रंग का था। पिंगली ने काफी मशक्कत के बाद इसे तैयार किया था। पिंगली की एक आदत थी कि जब भी वह कुछ नया काम करते थे तो महात्मा गांधी को जरूर बताया करते थे। झंडा बनाने के बाद पिंगली उसे लेकर गांधी जी के पास पहुंच गए।

गांधी जी काफी देर तक झंडे को देखते रहे। आखिर में बोले…इसमें सफेद रंग को भी शामिल करना चाहिए क्योंकि सफेद रंग शांति का प्रतीक है। इसके साथ ही गांधी जी ने झंडे के बीच में चरखे को भी शामिल करने को कहा। पिंगली ने वैसा ही किया।

अब देश का झंडा बनकर तैयार था। इसे पहली बार राष्ट्रीय ध्वज कह कर बुलाया गया। लेकिन जिस झंडे को महात्मा गांधी ने अंतिम रूप दिया था उसमें एक बड़ा बदलाव संविधान सभा की तरफ से किया गया।

अब तक देश आज़ाद हो चुका था। चारों तरफ खुशियां मनाई जा रही थीं। कहीं बंटवारे का गम था तो कहीं गुलामी से आज़ाद होने की खुशियां। इस सब के बीच संविधान सभा देश के भविष्य के निर्माण में लगी हुई थी।

संविधान सभा में झंडे पर भी जमकर चर्चा हुई। संविधान सभा में मौजूद बहुत बड़ी संख्या का ये मानना था कि आज़ाद भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। ऐसे में हमारे देश के झंडे से ही ये बात साफ झलकनी चाहिए। इसके बाद झंडे में से चरखे को हटाकर अशोक चक्र को शामिल किया गया। अशोक चक्र में मौजूद तीलियां सभी धर्मों का प्रतीक मानी जाती हैं।

फिर वो तारीख भी आ गई 22 जुलाई 1947, इसी दिन जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय ध्वज को संसद में सभी लोगों के सामने लेकर पहुंचे। झंडे को सम्मान से एक थाली में रखा गया। जवाहर लाल नेहरू ने सम्मान के साथ झंडे की तय खोलकर सभी लोगों को झंडा दिखाया। भारत का राष्ट्रीय ध्वज मिल चुका था और इसी तरह तिरंगे की कहानी पूरी हुई।

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