नरेन्द्र मोदी

यूपी लोकसभा उपचुनाव: योगी की हार से कहीं खुश तो नहीं हैं नरेन्द्र मोदी?

यूपी लोकसभा उपचुनाव में फूलपुर और गोरखपुर में भाजपा को मिली करारी हार के बाद विपक्षी एकता की बात उठने लगी है। माना जा रहा है कि इस चुनाव परिणाम का 2019 लोकसभा चुनाव पर असर पड़ेगा, जहां सारी विपक्षी पार्टियां भाजपा के खिलाफ एक हो सकती हैं। दो सीटों पर मिली जीत के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता खुशी मना रहे हैं, लेकिन क्या कोई और भी ऐसा है जो इन नतीजों से खुश हो सकता है? क्या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी को पहले से ही पता था कि इन चुनावों में भाजपा हारेगी? क्या वो जानतें थे कि योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या पार्टी को इन दो सीटों पर जीत नहीं दिला पाएंगे? ये सवाल सुनने में अजीब लग सकते हैं लेकिन राजनीति में कुछ भी अजीब नहीं होता, खासकर अगर वो पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हो। इन सवालों का मतलब समझने के लिए हमें कई पहलुओं पर गौर करना होगा।

भाजपा में कौन है नरेन्द्र मोदी का विकल्प?

2017 यूपी विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद मुख्यमंत्री को लेकर हर जगह कयास लगाए जा रहे थे। मीडिया के तमाम सूत्र एक के बाद एक कर के गलत साबित हो रहे थे, ऐसे में अचानक से एक नाम सामने आया योगी आदित्यनाथ। इससे पहले की विशेषज्ञ और मीडिया अपनी राय बनाती, योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे। तब से लेकर आज तक इस बात का कयास लगाया जा रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ नरेन्द्र मोदी के उत्तराधिकारी हैं? हालांकि, दोनों ही नेताओं की शैली में बड़ा अतंर है और सबसे बड़ा अंतर है मोदी का करिशमाई व्यक्तित्व और उनका जादूई भाषण। इन सब के बावजूद भी मोदी और योगी इन मायनों में एक लगते हैं,

  1. योगी और मोदी दोनों ही परिवार से अलग रहते हैं

  2. दोनों ही नेता ईमानदार छवि के हैं

  3. दोनों ही नेता हिंदू पोस्टर ब्वॉय हैं

  4. दोनों ही नेता अपने काम को बखूबी निभाते हैं

  5. योगी और मोदी दोनों को ही सख्त फैसलों के लिए जाना जाता है।

  6. दोनों ही संघ के चहेते हैं।

गोरखपुर हारने से क्या बदला है?

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से 4 बार सांसद रह चुके हैं। आदित्यनाथ ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ संघठन के संस्थापक भी है। गोरखपुर, योगी का किला रहा है और ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ उनकी ताकत, इन्ही दोनों के दम पर योगी को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनाया गया। खबरों के मुताबिक माना जा रहा था कि अगर योगी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता, तो वो और उनका संघठन पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल देता।

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मोदी-शाह ने दिल्ली और गुजरात में ऐसा क्या सीखा जो त्रिपुरा में वामपंथ धराशायी हो गया?

गोरखपुर में भाजपा की हार से योगी पर चौतरफा दबाव बढ़ गया है, बिल्कुल वैसा ही जैसा दिल्ली और बिहार चुनाव के बाद अमित शाह पर बढ़ गया था। योगी की बार्गेनिंग(तोलमोल) पॉवर में कमी आएगी। योगी के हार ये हो सकते हैं बदलाव,

  1. यूपी सरकार में केंद्र की भूमिका बढ़ सकती है।

  2. योगी को अपनी सरकार की काबिलियत साबित करनी पड़ेगी।

  3. युवा वाहिनी संघठन की ताकत पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

संघ के चहेते रहे हैं योगी

  1. माना जाता है कि यूपी उन राज्यों में से एक है, जहां सरकार दिल्ली से नहीं बल्कि लखनऊ से चलती है।

  2. ईमानदार छवि और सख्त तेवर के चलते संघ का योगी को लेकर नर्म रूख रहा है।

  3. कहा ये भी जाता है कि मोदी के बाद अगर कोई दूसरा नेता है जिसे संघ की तरफ से छूट मिली है, तो वो नेता कोई और नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ हैं।

  4. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक मोदी के बाद अगला प्रधानमंत्री कौन हो इसको लेकर संघ की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ हैं, जिसको लेकर अभी से ही योगी की इमेज बिल्डिंग शुरू कर दी गई है।

क्या इस चुनाव में योगी की चली है?

राजनीतिक जानकारों और खबरों के मुताबिक यूपी उपचुनाव का पूरा दारोमदार योगी और केशव प्रसाद मौर्य के ऊपर था। इन दोनों नेताओं के नाम पर ही पार्टी चुनाव में उतरी थी। योगी राज्य में 900 से ज्यादा एनकाउंटर हुए हैं, जिसके बाद पार्टी की छवि एक सख्त सरकार के रूप में बनी है। इस चुनाव में योगी, शाह और केशव प्रसाद की रणनीति पर काम किया गया था। पार्टी और संघ मोदी के नाम के बदले योगी के नाम पर चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन ये प्रयोग पार्टी को भारी पड़ा।

क्या योगी की हार से मजबूत हुए हैं मोदी?

यूपी लोकसभा उपचुनाव उन चुनावों में से एक था, जिसमें  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी ताकत नहीं लगाई थी। ये चुनाव मोदी के नाम पर नहीं बल्कि योगी के नाम पर लड़ा गया था। यूपी के 2 सीटों पर भाजपा की हार से भले ही विपक्ष खुश हो लेकिन ये भी एक पहलु है कि पार्टी में मोदी का कद और बढ़ गया है। मोदी विरोधी खेमा शांत हो गया है।

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योगी नहीं, शाह की रणनीति है सही?

नरेश अग्रवाल की भाजपा में सदस्यता को लेकर अमित शाह की चौतरफा आलोचना हो रही थी। कहा जा रहा था कि पार्टी को आने वाले समय में इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। राजनीतिक विशेषज्ञों का भी कहना था कि पार्टी योगी की ईमानदार छवि के बदले बाहरी लोगों को मौका देकर अपनी छवि खराब कर रही है। लेकिन यूपी लोकसभा उपचुनाव के नतीजे साबित कर रहे हैं कि क्यों यूपी में सरकार बनाने के लिए योगी नहीं बल्कि शाह की रणनीति चाहिए,

  1. महागठबंधन के लिए सब है जायज: 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर एक तस्वीर साफ होती जा रही है कि ये चुनाव भाजपा बनाम विपक्ष होगा। विपक्षी पार्टियां इस चुनाव में किसी विचारधारा के बदले भाजपा को हराने के लिए चुनाव लड़ेंगी। ऐसे में भाजपा के लिए जरूरी है कि वो जीतने के लिए सभी विकल्पों को खुला रखें।

  2. बड़े नेता दिलाएंगे जीत- कांग्रेस के जगदंबिका पाल हो या फिर राम विलास पासवान, सभी मोरी विरोधी नेताओं को पार्टी ने 2014 में अपनी तरफ से टिकट दिया। यहां तक कि रीता बहुगुणा जोशी को कांग्रेस से लाकर भाजपा ने यूपी में मंत्री तक बना दिया। मोदी का चेहरा और बड़े नेताओं की मौजूदगी के इस फॉर्मुले ने पार्टी को केंद्र से लेकर राज्यों तक में बहुमत दिला दी।

  3. नरेश अग्रवाल थे जरूरी- नरेश अग्रवाल रामगोपाल यादव के करीबियों में से माने जाते हैं। नरेश अग्रवाल उस समय भी अखिलेश खेमे में थे, जब 2017 विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश और मुलायम में टकराव चल रहा था। नरेश अग्रवाल पार्टी के बड़े नेता के साथ मास्टर माइंड भी थे। नरेश अग्रवाल के भाजपा में आने से सपा और अखिलेश तक में खलबली मच गई थी।

  4. सिर्फ काम नहीं बोलता- अखिलेश यादव ने कई काम किए थे लेकिन फिर भी पार्टी हार गई। यहीं हाल योगी आदित्यनाथ का भी हुआ, जहां बदमाशों और दबंगों के खिलाफ सख्त रूख के बाद भी सरकार जनता का भरोसा नहीं जीत पायी।

  5. ग्राउंड लेवल से दूर हो गई थी पार्टी- अमित शाह की रणनीति में सबसे पहला स्थान जमीनी हकीकत को लेकर रहता है। शाह हर एक कार्यकर्ता से मिली जानकारी को ध्यान में रखते हैं, लेकिन इन चुनावों में कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनकी तमाम नसीहतों को पार्टी के बड़े नेताओं ने अनसुना कर दिया।

BJP

यहां हुई योगी से गलती

गोरखपुर में अनदेखी- योगी गोखरपुर तो जाते रहे लेकिन वहीं कि परेशानियां कम नहीं हुई। योगी के राज्य में 100 से ज्यादा बच्चों की मस्तिष्क ज्वार से मौत हो गई, जिसके चलते लोगों को योगी से मोहभंग हो गया

  1. रूठों को नहीं मना पाए- गुजरात के मतदाता मोदी से नाराज थे, लेकिन मोदी की लगातार रैलियों के बाद कई नाराज मतदाताओं का गुस्सा कम हुआ और उनका वोट भाजपा को वापस मिला। ये कोशिश योगी की तरफ से नहीं की गई।

  2. अहंकार- योगी आदित्यनाथ ने हार के बाद माना कि पार्टी की हार अति आत्मविश्वास के कारण हुई। लोगों में नाराजगी थी कि सरकार अहंकारी हो गई है।

  3. जमीनी हकीकत से दूरी- योगी आदित्यनाथ को समय रहते उनकी टीम जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं दे पाई। इसके चलते योगी जीतने का दावा कर रहे थे और जनता भाजपा को हराने का मन बना चुकी थी।

  4. गठबंधन को हल्के में लेनाः सपा और बसपा के गठबंधन को योगी और पार्टी ने हल्के में लिया, जिसके चलते पार्टी की करारी हार हुई।

फूलपुर और गोरखपुर में भाजपा की हार के बाद विपक्ष और मीडिया मोदी और शाह पर भी सवाल खड़े कर रही है, जबकि हकीकत तो ये है कि इन 2 राज्यों में भाजपा की हार के बाद पार्टी के अंदर मोदी की ताकत और भी बढ़ी है। ऐसे में 2014 से लेकर अबतक सभी जीत के नायक रहे मोदी का किरदार 2019 में और भी बढ़ गया है, जहां अब पार्टी के अंदर उन्हें रोकने वाला कोई भी नहीं है।

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