मेरे बारे में

मेरा नाम श्रीधर मिश्रा है। ‘श्रीधर’ शब्द वेदों से लिया गया है, जिसमें ‘श्री’ का मतलब लक्ष्मी और धर का मतलब उसका स्वामी है- यानी लक्ष्मीपति भगवान विष्णु। मेरे नाम के जितने मतलब हैं, उतने ही मेरी जिंदगी के पहलु भी, जहां बनारस में रह कर मैंने महसूस किया की ये शहर दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर है, जहां मौत का उत्सव मनाया जाता है, शायद यही वजह है की ये शहर दुनिया के बाकी शहरों से अलग और खास है। गंगा के किनारे आधे चांद की शकल में बसा ये शहर, जिंदगी और मौत के बीच की कड़ी को आध्यात्म के रूप में समझाता है। मैं भी समझने की कोशिश करता हूं और सोचता हूं की समय के साथ हमने क्या खोया और क्या पाया?, यही सोच हर रोज़ मुझे लिखने पर मजबूर करती है।

मैं क्यों लिखता हूं

गुस्से को काबू करने का एकमात्र रास्ता लिखना होता है। इसलिए मैं लिखता हूं। इतिहास गवाह है लिखे हुए सच को दुनिया ने भी माना है, चाहे फिर ‘गेलिलियो’ की थ्योरी हो, ‘रामानुजन’ का फार्मुला या फिर नेल्सन मंडेला का जेल में लिखा हुआ संविधान। यही कोशिश मेरी भी है की जब लिखूं तो न सिर्फ सच लिखूं बल्कि दुनिया उसको भी सच माने।

विचारधारा

सनातन धर्म में एक श्लोक है.... ॥ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ जिसका मतलब वास्तव में तो बहुत गहरा है लेकिन संक्षेप में अगर इसे समझें तो - पूरे में से पूरा गया, तो पूरा बचा। ये सुन कर अजीब लगेगा लेकिन इस श्लोक को समझने के लिए Law Of Conservation Of Energy की उस थ्योरी को समझना होगा जहां कहा गया है की ‘Energy Can neither be created nor destroyed; rather, it transforms from one form to another’ ( यानी ऊर्जा न बन सकती है और नहीं खत्म हो सकती, ये एक रूप से दूसर रूप में बदलती रहती है)। वापस अपनी बात पर आयें तो - पूरे में से पूरा गया तो पूरा बचा- तो फिर न कुछ मिला और न कुछ गया... यही जीवन का सूत्र है, जहां जब कुछ खोना नहीं तो डर किस बात का और जब कुछ मिलना नहीं तो लालच किस बात का। इसी को ‘शून्य’ कहते हैं और यही शून्य ‘मोक्ष’ है और यही मेरी जिदगी का एक मात्र सूत्र भी है, जिसका पालन करने की कोशिश करता हूं। लेकिन हर बार भटक जाता हूं फिर भी कोशिश अभी जारी है।

विजन

बरगद के पेड़ की सबसे बड़ी खासियत होती है कि उसके तने ज़मीं से जुड़ने के बाद खुद पेड़ बन जाते है और इस तरह बरगद का पेड़ समय के साथ बढ़ता ही जाता है.. इस घटना को अगर ध्यान से देखा जाए तो यही दुनिया का मूल मंत्र भी है और शायद इसी को अमर हो जाना कहते है। एक और उदाहरण देता हूं जैसे आदमी का डीएनए उसके बच्चे से होते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है, वैसे ही खुद की खुबियों को दूसरों को देने से आदमी मरने के बाद भी अमर हो जाता है और दूसरों की खासियत को खुद में लेकर उस आदमी को जीवित रखता है। यही मेरा भी लक्ष्य है, जहां मैं महान लोगों को खूद में जीवीत रखने की कोशिश करता हूं और अपनी खासियत को दूसरों तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं ताकि मरने के बाद भी मैं जिंदा रहूं किसी के अंदर अच्छाई के रुप में.....